संतति निरोध की मूर्खतापूर्ण नीतियां अपनाने का षडय़ंत्र, भाग-5

  • 2017-06-16 00:30:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

अत: पश्चिम का आज का भौतिकवाद जिस प्रकार की श्रंगारप्रिय सामग्री मानव को परोस रहा है उसमें कामचेष्टा बलवती होनी स्वाभाविक है। तेल, उबटन, स्नान, इत्र, माला, आभूषण, अट्टालिका आदि के मध्य रहकर कोई स्त्री प्रसंग का निषेध करेगा भी तो कुण्ठा और मानसिक तनाव की अन्य व्याधियों से ग्रसित होगा ही। जैसे-खाली मन इंसान का मंदिर है, शैतान का, उसी प्रकार श्रंगार और साज-सज्जा भी मंदिर है काम का। तो ज्ञात होता है कि भारतीय चिंतन और पश्चिम का चिंतन इस विषय में एक दूसरे के घोर विरोधी हैं। उनमें परस्पर कोई साम्य नहीं, कोई समझौता नहंी। कहीं कोई सहमति नहीं, कोई सम्मति नहीं।


उनका अनुसरण करते हुए भारत का यौवन लुट रहा है और गृहस्थ कुण्ठित हो रहा है। कारण के मूल पर हमारे राजनीतिज्ञों का ध्यान नहीं है, क्योंकि उनका स्वयं का चिंतन भी दूषित और प्रदूषित है। जो स्वयं ही सन्मार्गगामी न हो भला वह दूसरों को क्या मार्ग बताएगा?

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा

देखिये मनु महाराज का कथन है कि-
काम की इच्छा भोग से शांत नहीं होती, प्रत्युत भोग से तो वह उसी प्रकार बढ़ती है, जिस प्रकार घृत से अग्नि बढ़ती है, इसलिए उसका त्याग ही उत्तम है। जबकि पश्चिमी जगत भोग से काम की संतुष्टि करना चाहता है।

भारतीय ऋषियों ने सारे सांसारिक ऐश्वर्यों और वसुधा की संपूर्ण प्राकृतिक संपदा पर प्रत्येक मनुष्य का समानाधिकार माना। हर व्यक्ति पर धर्म की यह नकेल लगायी गयी कि वह अर्थ की शुचिता पर विशेष ध्यान दे।

यह शुचितापूर्ण अर्थ, धर्म का आधार बना। इसलिए यहां पर प्राचीनकाल से ही अधिकारों की ओर नहीं अपितु कत्र्तव्यों की ओर मानव के द्वारा ध्यान दिया गया। जिससे दास बनाने या बलात् किसी से अपना कार्य कराने की भावना पश्चिमी जगत की अपेक्षा यहां नगण्य रही।

इस भावना का परिणाम जागतिक शांति के रूप में इतिहास के एक लंबे कालखण्ड में हमें देखने को मिलता है।

जब राजा पथभ्रष्ट हुआ
किंतु जब राजा पथभ्रष्ट हो गया तो जागतिक शांति का स्थान तो जागतिक कलह ने ले लिया। राजा ने जब राज्य सीमा का विस्तार कर सारे संसार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की बात सोची अथवा कुछ लोगों को अपना सेवक बनाने के विचार को अपने राज्य का आधार बनाया तो राज्य की वह मर्यादा ही टूट गयी जो राज्योत्पत्ति का आधार थी अर्थात जागतिक शांति की स्थापना।

राज्योत्पत्ति सज्जनों की सुरक्षार्थ तथा धर्म की गति को ठीक बनाये रखने के लिए हुई थी किंतु अब स्थिति परिवर्तित हो गयी। वह लोग अपराधी थे, गुंडे थे, बदमाश थे जिन्होंने राज्यसत्ता का दुरूपयोग कर राज्य की सीमाओं का विस्तार तथा नागरिकों के अधिकारों का शोषण कर अपने वर्चस्व के नीचे सभी को शोषित किया। यह सत्ता का अपहरण था।

इतिहास के लंबे कालखण्ड में राजधर्म को उपेक्षित और पतित कर जहां भी राज्यसता का इस प्रकार दुरूपयोग किया गया वहीं पर आज की राजनीति के अपराधीकरण के समय के प्रारंभ होने की जड़ें खोजनी पड़ेंगी। इस प्रवृत्ति ने राज्य की, धर्म, अर्थ की और काम की शुचिता को भंग कर दिया। तब भारत सहित विश्व के अन्य सभी देशों में 'खाओ पियो और मौज उड़ाओ' की संस्कृति ने जन्म लिया, जहां चार्वाक जैसे लोगों ने कह दिया-यावज्जीवेत् सुखम् जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतम् पीवेत। अर्थात जब तक जीओ सुख से जीओ, ऋण ले लेकर घी पीओ और तो और उसने आगे यहां तक कह दिया कि-'भस्मी भूत होने के पश्चात पुन: इस शरीर में किसका आना और किसका जाना' आगमन संभव नहीं। इस कथन ने भारत के ऋषियों के पुनर्जन्म संबंधी विज्ञान को भी गहरी चोट पहुंचायी और साथ ही इससे कर्मफल व्यवस्था के भारतीय चिंतन के भवन की चूलें हिल गयीं।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715