अपनी फूट जगत की हंसी

  • 2016-10-26 03:30:08.0
  • राकेश कुमार आर्य

अपनी फूट जगत की हंसी

मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति की एक मजबूत कड़ी का नाम है। यदुकुल में पैदा हुए इस नेता ने शून्य से उठकर ऊंचाइयां प्राप्त की हैं। पर आज वृद्घावस्था में इस कृष्णवंशी नायक को अपने आगे ही अपना बगीचा उजड़ता देखना पड़ रहा है? ऐसा क्या हो गया कि इतनी जल्दी बढ़ी एक पार्टी आज पतन के गर्त में जा रही है? राजनीति की चौपड़ को बड़ी सावधानी से खेलने वाले मुलायम सिंह यादव को निश्चय ही इस समय यह यक्ष प्रश्न घेर रहा होगा?


इस समय नेताजी क्रोध में हैं और यह सत्य है कि रोग में, शोक में और क्रोध में विवेक मर जाता है, उसमें भावुकता प्रभावी हो जाती है। सारे 'समाजवादी परिवार' में इस समय भावुकता हावी है। इसलिए नेताजी से यह अपेक्षा नही की जा सकती कि वे किसी सही निष्कर्ष पर पहुंच पाएंगे।

हमारा मानना है कि सपा सरकार ने एक वर्ग विशेष के तुष्टीकरण के लिए प्रदेश के बहुसंख्यक समाज के हितों की कदम-कदम पर अनदेखी की है। थोड़ा पीछे जाकर प्रसंग को समझने का प्रयास करेंगे। बात नवंबर 1966 की है, जब इंदिरा गांधी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में गौरक्षा के लिए आंदोलन कर रहे साधु संतों पर निर्मम गोलीकाण्ड कराया था, और सैकड़ों गौभक्तों की हत्या करा दी थी। उस दिन गोपाष्टमी थी। बाद में संजय गांधी की दर्दनाक मृत्यु हुई तो उस दिन भी गोपाष्टमी थी, इंदिरा गांधी भी दर्दनाक मृत्यु की शिकार बनीं तो उस दिन भी गोपाष्टमी थी और जब ऐसी ही दर्दनाक मृत्यु का शिकार राजीव गांधी बने तो उस दिन भी गोपाष्टमी ही थी? श्राप दूर तक जाता है, और विमान भेदी मिसाइल की तरह 'विमान' को गिराकर ही दम लेता है। आज 7 नवंबर 2016 के आते-आते गांधी परिवार का वारिस 'पप्पू' बनकर रह गया है और देश के किसानों को सलाह दे रहा है कि 'आलू की फेेक्टरी लगाओ' बड़ा मुनाफा होगा? अपने व्यापार (राजनीति) को चौपट कर बैठा एक 'व्यापारी' क्या मार्के की सलाह दे रहा है? इस 'व्यापारी' की बुद्घि पर तरस खाने की आवश्यकता नही है, वास्तव में हमें कर्मफल को देखना चाहिए कि वह कितना प्रबल है-
''गूंजते थे जिनके डंके से जमीं और आसमां,
चुप पड़े हैं कब्र में हूं ना हां कुछ भी नही,
जिनके महलों में कभी हजारों रंग के फानूस थे,
झाड़ उनकी कब्र पे है इसके सिवा कुछ भी नही''

अब अपने विषय पर आते हैं। मुलायम सिंह यादव जिस वंश परंपरा के वारिस हैं उसका इस देश के इतिहास में सम्मानपूर्ण स्थान है। उस वंश को लोग गौपालकों का वंश कहकर सम्मानित करते हैं। पर सपा सरकार के रहते बिसाहड़ा में जो कुछ हुआ उसका 'सच' सामने नही आने दिया गया। गलत निर्णय ने सरकार को 'अधर्मी' बनाकर रख दिया। महाभारत में अधर्म के विषय में कहा गया है कि लोभ से, बुद्घि के मोह से, अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए अथवा पापियों के संसर्ग में आने से मनुष्यों की अधर्म में रूचि हो जाती है। बात यह है कि एक 'गौपालक परिवार' का व्यक्ति जिन 'पापियों' के संसर्ग में आकर गोकशी को भी पुण्य मान बैठा वह अपने कर्म का फल तो भोगेगा ही। इसमें ना भाजपा का दोष है, ना बसपा का दोष है और ना ही कांग्रेस का दोष है? अपने कर्म का फल अपने आप ही भोगना पड़ता है, यह प्रकृति का अटल सत्य है। जब पाप के शिकंजे में कसा व्यक्ति तड़पता है तो उसे कोई भी बचा नही पाता है।

अखिलेश यादव प्रदेश के लिए हमने पूर्व में भी एक अच्छे मुख्यमंत्री माने हैं, लिखे हैं और आज भी हम कहते हैं कि यदि इस युवक को इसके मन की भावना के अनुसार कार्य करने दिया जाता तो यह आज इतनी छोटी ही उम्र में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में होता। पर दुख की बात रही कि इस युवक को 'अभिमन्यु' बना दिया गया और अपने लोगों को 'चाचा' के रूप में 'महारथी' बनकर खड़ा कर दिया गया। एक नहीं कई 'चाचा' अपने ही 'अभिमन्यु' को घेरने के लिए खड़े हो गये। यह कौन सी महाभारत दोहरा दी गयी कलयुग में-जिसमें गोद खिलाने वाले ही गोद में खेलने वाले का शिकार करने के लिए टूट पड़े?

बृहस्पति जी युधिष्ठिर को समझाते हैं कि जो मनुष्य पापकर्म करके अधर्म के वशीभूत हो जाता है उसका मन धर्म के विपरीत मार्ग में जाने लगता है, इसलिए वह नरक (दु:ख सागर) में पड़ता है। नेताजी को इस प्रदेश की जनता मुख्यमंत्री के रूप में पसंद कर सकती थी, परंतु अखिलेश के जितने भी 'चाचा' बनाये या बताये गये उन्हें चाहे पार्टी थोप देती-मुख्यमंत्री के रूप में, पर प्रदेश की जनता का बहुमत उनके साथ नहीं होता। प्रदेश की जनता का बहुमत तो अखिलेश के साथ था, फिर उस बहुमत के मुख्यमंत्री को उत्पीडि़त करने के लिए यह 'चाचाओं' की फौज क्यों खड़ी की गयी? राजनीति में ही नही घरों में भी जब किसी का अवैधानिक, अनुचित और अतार्किक हस्तक्षेप बढ़ता है तो उसका परिणाम 'विस्फोट' के रूप में ही देखने को मिलता है। बड़ों की भूमिका, छोटों को काम करने की अनुमति और स्वतंत्रता देने तक उचित होती है। मुलायम परिवार यहीं चूक कर गया। परिवार के बड़े 'बाबा' (संन्यस्त व्यक्ति की न्यायपूर्ण भूमिका) की भूमिका नहीं निभा पाए-परिणाम सामने है। 'अपनी फूट जगत की हांसी' वाली बात हो गयी।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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