ऐसे पिता को नमन

  • 2017-03-12 14:30:46.0
  • राकेश कुमार आर्य

ऐसे पिता को नमन

आई.एस. आतंकी सैफुल्लाह की लाश को उसके पिता सरताज ने यह कहकर लेने से इंकार कर दिया है कि वह एक गद्दार बेटे की लाश नहीं लेंगे। एक पिता के लिए ऐसा निर्णय लेना सचमुच बहुत बड़ी बात है। क्योंकिजब बेटे की लाश सामने हो तो उस समय सामान्यतया विवेक मर जाता है और व्यक्ति की भावनाएं उस पर हावी हो जाती हैं। पिता का पितृत्व उससे कहता है कि कुछ भी हो अंतत: था तो बेटा ही, इसलिए शव ले लिया जाए। पर जिस पिता ने पिता की ऐसी भावनाओं को पीछे धकेलकर अपने विवेक के जीवित होने का प्रमाण दिया हो उसकी देशभक्ति असंदिग्ध है और उसकी भावनाओं को नमन करना आज हर देशवासी का कत्र्तव्य है। इसलिए देश की संसद ने ऐसे पिता को नमन करके उचित ही किया है। आतंकी का कोई मजहब नहीं होता, लोग अक्सर ऐसा कहते हैं। परंतु हमारा मानना है कि आतंकी ने तो जो कुछ किया वह किसी विशेष मजहब के कुछ लोगों की भावनाओं के लिए किया, परंतु पिता ने जो कुछ किया वह राष्ट्र के लिए किया। पिता ने संप्रदाय के लिए न करके राष्ट्र के लिए एक उदाहरण स्थापित कर यह भी सिद्घ किया है कि विवेक का कोई मजहब नहीं होता वह तो न्यायसंगत बोलता है और न्यायसंगत ही तोलता है।


सरताज भारत के सरताज हो गये-एक वाक्य बोलकर। पर कांग्रेस के पीसी चाको हैं कि इस आतंकी घटना में भी आई.एस. के सम्मिलित होने के प्रमाण मांग रहे हैं। उनकी पार्टी की दृष्टि में आतंकी अभी भी आतंकी नहीं है। जबकि आतंकी के पिता जनाब सरताज ने सैफुल्लाह को अपने एकवाक्य से ही आतंकी घोषित कर दिया। वैसे पीसी चाको की पार्टी कांग्रेस ने अब से पूर्व ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी कहकर तथा बाटला हाउस मुठभेड़ को गलत ढंग से व्याख्यायित करके अपने ृदृष्टिकोण से पूर्व में भी कई बार स्पष्ट किया है कि वह आतंकियों के विषय में क्या सोचती है?

अब आईएस ने स्वयं संदेश दे दिया है कि 'नाऊ वी.आर. इन इंडिया' अर्थात अब हम भारत में घुस चुके हैं। कल तक भारत के गृहमंत्री राजनाथसिंह भी कह रहे थे कि भारत में आई.एस. का कोई भी सदस्य नहीं है निश्चित रूप से उनका यह कथन असत्य सिद्घ हो चुका है। देश के संजीदा लोगों को तो राजनाथसिंह का यह बयान कभी भी गले नहीं उतरा था। उन्होंने चाहे यह बयान जिस उद्देश्य से भी दिया था-पर इसके विषय में केवल एक ही सत्य था कि देश के गृहमंत्री के लिए ऐसा बयान देना अनावश्यक ही था। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी और ऐसे विषय पर गृहमंत्री को मौन ही रहना चाहिए था। अब आई.एस. ने भारत की ओर मुख करके और अपना संदेश भारत में प्रसारित करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वह भारत में घुस चुका है। हो सकता है कि उसे देश के गृहमंत्री के बयान से भी प्रेरणा मिली हो कि उसे भारत में घुसना चाहिए अन्यथा राजनाथसिंह को यह भूल बनी रहेगी कि भारत में आई.एस. का कोई सदस्य नहीं है?
आई.एस. के आतंकी सैफुल्लाह ने आत्महत्या करके स्पष्ट कर दिया है कि वह जीवित रहकर अपने संगठन की कोई सूचना भारतीय अधिकारियों या एजेंसियों को देना नहीं चाहता था। इससे आई.एस. एक दिन में ही भारत में प्रसिद्घि पा गया है और उसने एक आदमी को खोकर बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। हमारे नेताओं को बड़े दावों से बचना ही चाहिए। अनर्गल और अप्रासंगिक बातों पर बोलने से परिस्थितियां जटिल होती हैं और लोगों को अपनी नकारात्मक सोच के माध्यम से तथा अपनी विध्वंसक गतिविधियों को पूर्ण करके नेताओं के अनर्गल और अप्रासंगिक दावों को नकारने का अवसर मिलता है।

भारत की राजनीति में इस समय देशहित गौण है और तीसरी-चौथी या पांचवीं और छठी पंक्ति के लोग अपनी-अपनी पार्टियों के प्रवक्ता बनकर संवेदनशील विषयों पर भी अपना मत व्यक्त कर देते हैं। ऐसी स्थिति को निश्चय ही दुखद कहा जाएगा। इससे पता चलता है कि राजनीतिक दलों के नेताओं में परस्पर उचित समन्वय नहीं है। ये लोग अपनी नीति नियामक समितियों के दिशा निर्देशानुसार नहीं चलते हैं और जो मन में आ जाता है वही बोल देते हैं। जबकि राजनीति में एक 'पार्टी लाइन' पर काम किया जाता है। किस विषय पर क्या बोलना है और क्यों बोलना है? यह पहले ही स्पष्ट किया जाता है, इतना ही नहीं यह किसे बोलना है और कब बोलना है यह भी हर पार्टी की नीति नियामक समिति निर्धारित करके चलती है। माना कि आतंकी घटनाएं आकस्मिक होती हैं और उनकी पूर्व से कोई जानकारी नहीं होती-इसलिए व्यक्ति उन पर आकस्मिक रूप से कुछ भी बोल सकता है तो यह तर्क भी थोथा है। क्योंकि आतंकवाद इस समय एक वैश्विक समस्या है-भारत इससे लंबे समय से पीडि़त रहा है। ऐसे में हर राजनीतिक दल की नीति नियामक समिति को आतंकवाद पर और आतंकियों पर अपनी स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। इतना ही नहीं यह नीति आतंकवाद के प्रति देश की राष्ट्रीय नीति के अनुरूप भी होनी अपेक्षित है। आतंकवाद को लेकर एक राष्ट्रीय समिति हो जिसमें सारे राजनीतिक मतभेदों को दूर रखकर सारे राजनीतिक दल एक मत से एक दिशा में कार्य करने के लिए सहमत होते दिखायी दें। इस प्रकार की सोच से ही हम आतंकी घटनाओं पर लगाम लगाने में सफल हो पाएंगे।
आतंकवादियों को प्रोत्साहित करने के लिए किसी एक वर्ग या संप्रदाय को निशाना बनाना या उस पर अविश्वास करना भी गलत होगा। यदि कहीं सैफुल्लाह जैसा गद्दार बेटा छिपा है तो पता होना चाहिए कि उसका 'बाप तो आज भी सरताज है।' कहने का अभिप्राय है बाप आज भी बड़ा है। इसलिए 'सरताजों' को घायल ना किया जाए। वैसे शत्रु यही चाहता है कि हम देशभक्त 'सरताजों' पर टूट पड़ें और यह देश गृहयुद्घ जैसी आपदा में फंसकर नष्ट हो जाए। हमें सरताज से सीख लेनी चाहिए और हर स्थिति परिस्थिति में अपने विवेक को जीवित रखना चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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