'खाट' पकड़ती राहुल की कांग्रेस

  • 2016-10-08 08:15:50.0
  • राकेश कुमार आर्य

खाट पकड़ती राहुल की कांग्रेस

महाभारत का युद्घ हो चुका था। भीम ने जब दुर्योधन को गदा युद्घ में परास्त किया तो उसके धराशायी होते ही विलक्षण प्रकार की वायु बहने लगी, संसार का पटल ही पलटा हुआ दिखाई देने लगा। तब भीम ने गिरे हुए दुर्योधन के सिर को बांए पांव से ठोकर मारी।

उस समय की अधोगामी राजनीति के इस गिरे हुए चरित्र को देखकर पास में ही खड़े धर्मराज की आत्मा चीत्कार कर उठी। उन्होंने राजनीति और धर्म की मर्यादा को बांधते हुए तब भीम से बड़े पते की बात कही थी कि-''भीम! सुयोधन (दुर्योधन का वास्तविक नाम ) से अब वैर पूर्ण हो चुका है, तैंने प्रतिशोध ले लिया, अपनी प्रतिज्ञा भी पूर्ण कर ली, अब इसे पांव मत मारो। अंतत: यह राजा है, अपना सजातीय है, और इस सबके उपरांत इस समय मृतक समान है। ग्यारह अक्षौहिणियों का नेता, कौरवों का सम्राट सजाति मृतक हंसी के योग्य नही हो सकता, किंतु शोक के योग्य अवश्य है।'
भीम के इस कृत्य पर कृष्ण जी ने भी बुरा माना।

तब युधिष्ठिर ने सुयोधन की ओर मुंह करके कहा-'राजन! यह हम पर दैवी कोप हुआ जो आपस में ही लड़े अपने ही अपराध से अपनों को मार कर अपने को विपदा में डाल दिया, और अपनों की ही असहाय अवस्था पर अपने आप ही हंसने लगे।'

महाभारत का यह संवाद आज भी अधोगामी राजनीति को बहुत कुछ कहता-समझाता है। आज की राजनीति का 'भीम' तो किसी को भी नही देख रहा, वह हर किसी को लात मार रहा है। लत्तम-लत्ता का खेल बनकर रह गयी है-सारी राजनीति। इसके पतन का ज्वलंत उदाहरण है-'सर्जिकल स्ट्राइक' पर दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल, कांग्रेस के दिग्विजयसिंह सरीखे कई नेताओं के वे बेतुके बोल-जिनमें 'सर्जिकल स्ट्राइक' के प्रमाण मांगे गये। इन कई नेताओं ने देश को लात मार दी, लोगों को उम्मीद थी कि ये अपनी करनी पर पछताएंगे पर घोर निराशा उस समय हुई जब इनके 'धर्मराज' (राहुल गांधी) ने भी मोदी पर सैनिकों के खून पर दलाली करने की राजनीति करने का आरोप लगाकर मर्यादा की हर दीवार ही ढहा दी। 132 वर्ष पुरानी कांग्रेस के भावी अध्यक्ष के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर वास्तविक 'धर्मराज' की आत्म कराह उठी। कहने लगी ''तात! हमारा यह आपसी कलह हमें किधर ले जाएगा? लगता है सर्वनाश कहीं हमारी प्रतीक्षा कर रहा है, हम दल-दल में से बाहर निकलने के स्थान पर नीचे ही धंसते जा रहे हैं।''

कांग्रेस की वर्तमान ग्रहदशा लगता है सुधरने वाली नही है। यह पार्टी 1977 से लेकर अब तक जब भी सत्ता से बाहर रही है-इसने कभी भी एक अच्छे विपक्ष की भूमिका नही निभाई। इसने विपक्ष में बैठकर सरकारें गिराने का काम किया। क्योंकि यह सत्ता के बिना रह नही सकती थी। इसने कभी विपक्ष में बैठकर किसी प्रधानमंत्री को 'चंडी देवी' कहने का 'अटल साहस' व्यक्त नही किया। यह इसकी भूल रही है और यही कारण है कि इस पार्टी को गंभीर विपक्ष का कभी सम्मान नही मिला। यह ठीक है कि आज कांग्रेस के सांसदों की संख्या बहुत कम है और कई क्षेत्रीय दल संसद में उसकी सांसद संख्या जैसी ही स्थिति रखते हैं, परंतु इसके उपरांत भी वे क्षेत्रीय दल ही हंै और कांग्रेस राष्ट्रीय दल ही है। इसके नेता का सुर यदि क्षेत्रीय दल के ओच्छे नेताओं के साथ सुर मिलाएगा तो कांग्रेस की महान विरासत 'खाट' पर चली ही जाएगी। यह अदभुत संयोग है कि राहुल गांधी इस समय 'खाट' की राजनीति के लिए जाने जा रहे हैं और हम देख रहे हैं कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस बीमार होती जा रही है-अर्थात 'खाट' पकड़ती जा रही है।

राहुल गांधी को धैर्य, विवेक और संयम का परिचय देना चाहिए। मोदी नाम के तूफान को वह हल्के बयानों से राष्ट्रीय पटल से गायब नही कर सकते, न ही वह सेना को राजनीति का केन्द्र बनाकर ऐसा कर सकते हैं। निश्चय ही उन्हें सफल मनोरथ होने के लिए अपने 'शत्रु' से अधिक साधना संपन्न और साधन संपन्न होने की आवश्यकता है। अपने इस कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए उन्हें 'वाचिक तप' करने की आवश्यकता है। जिस दिन वह वाचिक तप वाले दिखने लगेंगे उसी दिन से मोदी का पराभव और उनका उद्भव आरंभ हो जाएगा और हम देखेंगे कि कांग्रेस 'खाट' से उठने लगेगी।
राजनीति बड़ा अजीब खेल है। इसमें प्यादे को वजीर और वजीर को प्यादा बनने में देर नहीं लगती। कल तक मोदी जिन लोगों को अपना आका मानते थे आज वे सब मोदी से मिलने के लिए भी तरसते हैं। समय का कुछ पता नहीं होता। राहुल गांधी भी कल तक अपने जिन सांसदों को आंख दिखा लिया करते थे-आज वे उल्टे राहुल को आंख दिखा रहे हैं। क्योंकि वह राहुल को अपना नेता नही मान रहे हैं। सचमुच राहुल ने बड़प्पन जैसे शब्द की इतनी किरकिरी कर दी है कि भारतीय राजनीति की हर मर्यादा पर वह लात मारते जा रहे हैं। उनसे उनके शुभचिंतकों को अपेक्षा थी कि वे समय को पलटा दिलाएंगे और आज के 'वजीर' को 'प्यादा' बना देंगे, पर उन्होंने कंाग्रेस को 'खाट' पर डालकर स्वयं को ही 'प्यादा' बना दिया है। हमें रोगी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करनी चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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