गड़े मुर्दों के बीच राहुल गांधी

  • 2016-09-03 06:45:46.0
  • राकेश कुमार आर्य

गड़े मुर्दों के बीच राहुल गांधी

जब देश आगे बढऩे की बात कर रहा है और 21वीं सदी की आसन्न चुनौतियों से जूझ रहा है तब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने लिए एक और काम में व्यस्त रखना उचित माना है और वह है-गड़े मुर्दों के बीच बैठने की उनकी जिद। सारा देश उनकी बचकानी 'पप्पू वाली' हरकत पर हंस रहा है, और राहुल हैं कि मानते ही नही हंै-जिद किये जा रहे हैं कि-'नही, मैं तो वहीं बैठूंगा।' अब उन्हें कौन

समझाये कि 'पीछे मुडक़र देखना' कितना नुकसानदायक होता है? यदि यह कोई अच्छी चीज होती तो राहुल के पिता के नाना पं. नेहरू अपने शासनकाल में इसी को खोदे बैठे रहते। पर उन्होंने इस पर अधिक देर नही लगायी और न्यायालयों ने जो निर्णय दिया उसे स्वीकार कर आगे बढ़ गये। उनके पश्चात नेहरूजी की बेटी इंदिरा और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने भी अपने शासनकाल में गड़े मुर्दों को गड़ा ही रहने
दिया। राजीव गांधी ने तो 21वीं सदी के आने से 16 वर्ष पूर्व देश को आगे बढऩे की सलाह देकर आगे देखने के लिए प्रेरित किया। पर आज देखिये क्या चमत्कार है कि उन्हीं राजीव गांधी का होनहार बेटा 21वीं सदी के 16 वर्ष गुजर जाने के बाद सारे देश को पीछे देखने के लिए जोर लगा रहा है-उनकी इस करतूत पर सारा देश हंस रहा है। पर राहुल तो राहुल ठहरे-आखिर उन्हें भी तो किसी किसी क्षेत्र में नाम
कमाना ही है, और सही तो 'बचकानापन' ही सही।

आर.एस.एस. को भी इस 'विराटपुत्र उत्तर कुमार' पर हथियार भांजने का अच्छा अवसर मिल गया है। अब देखने वाली बात ये होगी कि आर.एस.एस. गोडसे की विरासत पर अपना स्वामित्व सिद्घ करती है या उसे छोड़ती है? यदि वह गोडसे की विरासत पर अपना स्वामित्व सिद्घ करती है तो वह फंसती है और यदि इसे छोड़ती है तो देश का जागरूक हिंदू युवा अब अपनी आंखों से देखेगा कि इस संगठन का सच क्या है? उधर हिंदू महासभा है जिसके कई नेता गोडसे की मूत्र्ति स्थापना के लिए संघर्ष करते हुए जेल की यात्रा भी कर आये हैं। आर.एस.एस. को डर है कि इस बेमतलब की लड़ाई से जितना ही गोडसे का नाम उछलेगा उतनी ही हिंदू महासभा प्रचार में आएगी। इसलिए आर.एस.एस. भी पूरे मन से राहुल गांधी से लडऩे को तैयार नही था। पर अब वह ऐसी स्थिति में आ गया है कि उसे पीछे हटना भी अपमानजनक ही लग रहा है।

मुंबई की एक निचली अदालत राहुल गांधी पर आपराधिक मानहानि का मुकदमा कायम पर चुकी है और उन्हें सम्मन भी जारी कर दिया गया है। राहुल गांधी ने अब इस आपराधिक मुकदमे को लडऩे का मन बना लिया है, यद्यपि उन्होंने आरंभ में एक कदम आगे तो दो कदम पीछे हटने की हास्यास्पद कदमताल की थी। सुप्रीम कोर्ट में 'यूटर्न' लेते दिखाई दिये राहुल गांधी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कड़ी आलोचना की थी। संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने कहा था कि आखिर क्यों राहुल गांधी दो वर्षों से सुनवाई टाल रहे हैं, बहाने से या फिर कोई और बात है? उन्होंने आशंका व्यक्त की कि राहुल गांधी सच का सामना करने से डर रहे हैं? इसीलिए वह 'यूटर्न' ले रहे हैं। इससे पहले राहुल गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा था कि वह अपने बयान पर कायम हैं।

जब मैं राहुल गांधी को देखता हूं तो मुझे मुगलवंश के अंतिम उत्तराधिकारियों का इतिहास याद आने लगता है कि जैसे वे नाममात्र के शासक थे और अपनी-अपनी नादानियों से जैसे वे तरह-तरह की समस्याओं से घिरते चले गये थे वैसे ही राहुल गांधी हैं। आज वह भी लालकिले (10 जनपथ) के भीतर के ही 'सम्राट' हैं। वैसे अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के साथ कई बार उनकी प्रिय बेगम जीनतमहल भी बदसलूकी करके यह अहसास करा दिया करती थी कि मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर लालकिले के भीतर का भी बादशाह नही है, वहां भी उसका हुक्म नही चलता, लिहाजा अब वह केवल 'वेषभूषा' का ही सम्राट है। जिसे पहनकर वह स्वयं खुश हो लेता है। क्या विडंबना है सोनिया गांधी की कि उन्होंने 3 वर्ष पूर्व अपने जिस बेटे को 'हिंदुस्तान का युवराज' बनाने की तैयारी की थी उसे 2014 के चुनावों में देश की जनता ने 'कांग्रेस का युवराज' बनाकर रख दिया और अब खबर है कि कांग्रेस के एक सांसद भी सीधे-सीधे राहुल से कह रहे हैं-'मेरे नेता आप नही सोनिया गांधी हैं।' कुछ लोगों का मानना है कि अब राहुल '10 जनपथ' के 'युवराज' बनकर रह गये हैं। राहुल की कोई 'जीनतमहल' 10 जनपथ में नही रहती है पर मां सोनिया के सामने जब बेटी प्रियंका और बेटा राहुल दोनों साथ बैठे हों, तो उन्हें प्रियंका की बातों में कुछ अधिक आनंद आता है। यदि यही स्थिति रही तो 'गोडसे की यादों की धमक' कांग्रेस के इस दूसरे गांधी को भी विदा कर देगी। ...और 'मुगल साम्राज्य' ढह जाएगा।