पाकिस्तान को सजा

  • 2016-09-22 03:30:50.0
  • राकेश कुमार आर्य

पाकिस्तान को सजा

भारत ने अपने पास अपनी प्राचीन सटीक विदेशनीति के होते हुए भी केवल मरने के लिए या बलिदान होने के लिए बहुत युद्घ किये हैं। जैसे ही किसी शासक के आक्रमण की सूचना हमारे हिन्दू शासकों को मिलती तो उनमें से अधिकांश ने उस विदेशी शासक का सामना कूटनीति से न करके सीधे मरने के लिए किया। उनकी यह देशभक्ति की भावना निश्चय ही वंदनीय अभिनंदनीय थी पर यहां जिस प्रसंग की बात चल रही है वहां उनकी इस वीरता पर भी टिप्पणी करनी आवश्यक है, कि यदि वे भारतीय राजा लोग शत्रु का सामना करने के लिए अन्य शासकों के साथ मिलकर उससे युद्घ करते तो परिणाम अच्छे आते। हमारे राजाओं ने कई बार संघ बनाकर भी युद्घ किये, पर वहां कमी यह रही कि शत्रु की शक्ति का अनुमान न लगाकर उससे सीधे भिड़ गये। जिससे कितनी ही बार तो परिणाम अनुकूल आये पर कई बार परिणाम विपरीत भी आये थे। जो लोग आज पाकिस्तान को यथाशीघ्र नष्ट कराने के लिए मोदी सरकार से युद्घ छेडऩे की अपील कर रहे हैं उन्हें तनिक ठंडे दिमाग से यह भी सोचना चाहिए कि हड़बड़ी का परिणाम क्या होता है? विशेषत: तब जबकि विश्व समुदाय इस समय भारत का साथ दे रहा है और हर स्थिति में साथ देने के लिए देश भारत के साथ जुड़ रहे हैं, उन्हें भारत की ओर से अपनी गंभीरता का परिचय दिया ही जाना चाहिए, पर इस गंभीरता से हमारा अभिप्राय मनमोहन सरकार जैसी ढुलमुल विदेशनीति से कतई भी नही है।


मनु की विदेशनीति का उद्देश्य है कि शत्रु की शक्ति का पूर्ण आंकलन करके ही उस पर आक्रमण किया जाना चाहिए। यदि आपने शत्रु की शक्ति का आंकलन किये बिना और उसे मित्र विहीन किये बिना उससे बिना किसी ठोस योजना के युद्घ करना आरंभ कर दिया तो आपकी पराजय भी संभव है। अत: मनु महाराज का स्पष्ट मानना था कि संधि, विग्रह (शत्रु पक्ष में तोडफ़ोड़) यान (युद्घ के लिए चढ़ाई करना) आसन (शत्रु को घेरकर पड़े रहना या अपनी शक्ति की क्षीणता के कारण शत्रु राजाओं से छेड़छाड़ किये बिना चुपचाप भावी आक्रमण की ताक में पड़े रहना) द्वैधीभाव (अपनी विजय के लिए अपनी सेना को दो भागों में विभक्त कर देना, या शत्रु सेना में विभाजन कर देना) सश्रय (किसी बलवान राजा का आश्रय ग्रहण कर लेना) इन छह उपायों से शत्रु को परास्त करने के लिए ही उसके विरूद्घ युद्घ छेडऩा चाहिए। यदि आपने शत्रु के विरूद्घ केवल मरने के लिए युद्घ छेड़ा तो यह नीति विरूद्घ होगा। युद्घ हर स्थिति में जीतने के लिए लड़ा जाना चाहिए। विदेश नीति में इस तथ्य को सदा ही ध्यान में रखकर निर्णय लिऐ जाने चाहिएं। विदेशनीति में कूटनीति और कूटनीति में राजनीति यह नीति का खेल है। जो राष्ट्रनायक इस खेल का कुशल खिलाड़ी होता है, उसे एकांत की आवश्यकता होती ही है क्योंकि राजनीति में एकांत की योगसाधना से ही यह खेल सरलता से संपन्न होता जाता है। राष्ट्रनायक से भोगी, विलासी, या कामी ना होने की अपेक्षा इसीलिए की जाती है कि यदि वह भोगी, विलासी और कामी होकर रह गया तो राजसाधना के लिए और राष्ट्र आराधना के लिए वह कभी समय नही निकाल पाएगा। दूसरे राजनीति में विष कन्याओं का प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है, ये अक्सर दूसरे राजा का राज जानने के लिए प्रयोग की जाती थीं, इस कारण से भी राजा को कामातुरता से दूर रहने की अपेक्षा की जाती थी कि पता नही कौन रूपसी उससे कब अपने रूप का चमत्कार दिखाकर देश की कौन सी मुख्य सूचना को ले जाए या लीक कर दे? जैसा कि हमने अपने आधुनिक कई 'राजाओं' के द्वारा देश की सूचनाएं लीक होते रहने के किस्से सुने हैं, उन किस्सों में उनको किसी रूपसी ने ही अपने जाल में फंसाकर प्रयोग किया था।

पाकिस्तान ने आज तक मानवता के हित में कुछ भी नही किया, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रकृति सब कुछ देखती है और उसका नियम भी सीधा सा है कि जो प्रकृति के अनुकूल चलता है-प्रकृति उसी के अनुकूल चलती है और जो प्रकृति के प्रतिकूल चलता है-प्रकृति उसके विपरीत जाकर उसका विनाश कर डालती है। यह नियम वैसा ही है जैसा कि धर्म के विषय में कहा जाता है कि धर्म उसी की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है और जो धर्म का हनन करता है-धर्म उसका हनन कर डालता है।

पाकिस्तान ने धर्म का हनन किया है और संसार में हिंसाचार को बढ़ावा देकर प्रकृति को भी अपने विरूद्घ किया है। अत: उसे अपने किये की सजा देने में प्रकृति भी भारत का साथ देगी। भारत धर्म का युद्घ लडऩे वाला देश है, जिसका अभिप्राय होता है कि विश्व में नैतिकतावाद को प्रोत्साहित किया जाए और दुष्टता का अंत किया जाए। भारत यह भली प्रकार जानता है कि यदि वह अपना कलेजा काटकर पाकिस्तान को दे सकता है तो समय आने पर अपने कलेजा का सारा हिसाब भी चुकता किया जा सकता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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