महामहिम का दर्द और विपक्ष की चिल्लाहट

  • 2016-12-13 03:30:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

महामहिम का दर्द और विपक्ष की चिल्लाहट

भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने एक बार फिर सिद्घ कर दिया है कि इस समय देश के राष्ट्रपति भवन में एक सुलझा हुआ राष्ट्रप्रमुख बैठा है। जिसके लिए साफ सुथरी राजनीतिकरना प्राथमिकता है, और दलगत राजनीति के छलने वाले ओच्छे हथकण्डे उसके लिए सर्वथा त्याज्य हैं।
कांग्रेस सहित सारा विपक्ष इस समय देश की संसद को चलने नहीं दे रहा है। कल परसों तक जो दल एक दूसरे के पास बैठना तक उचित नहीं मानते थे आज समय का फेर तो देखिए कि वे 'चोर-चोर मौसेरे भाई' बने बैठे हैं। एक का इशारा होते ही मोदी सरकार को घेरने के लिए दूसरा साथ देने को तुरंत आता है। अब यह अलग बात है कि संसद में सरकार को घेरने की बजाय ये अक्ल के मारे बेचारे सभी राजनीतिक दल (अर्थात सारा विपक्ष) लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के आसन को ही घेरने लगते हैं।

सारा देश इस समय नौटंकी से उत्पन्न स्थिति के कारण लाइनों में लगकर इतना दुखी नहीं है जितना राजनीति की इस नौटंकी से दुखी है कि जिन्हें हमने गलत कामों पर सरकार को घेरने का काम दिया था वे संसद में लोकसभाध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को घेरने का असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक कार्य कर रहे हैं। वैसे देखा जाए तो लोकसभाध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के साथ ऐसा व्यवहार देश के राष्ट्रपति के साथ किया जाने वाला व्यवहार माना जाना चाहिए। कारण कि लोकसभा और राज्यसभा से ही मिलकर देश की संसद का निर्माण नहीं हो जाता है, अपितु इनके साथ राष्ट्रपति के मिल जाने पर ही देश की संसद पूर्ण होती है। लोकसभाध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रपति का ही प्रतिरूप मानना चाहिए। ये दोनों अलग-अलग अपने सदनों का संचालन करते हैं और हर उस विधायी कार्य को पूर्णत: न्यायसंगत ढंग से संपन्न कराने में अपने पूर्ण कौशल और सत्यनिष्ठापूर्ण विवेकशक्ति का प्रयोग करते हैं, जो देश के राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर विधि या कानून बन जाता है। ऐसे में देश के राष्ट्रपति का इस बात पर खिन्न होना स्वाभाविक है कि देश का विपक्ष विधायी कार्यों के संपादन में सहयोग ना देकर संवैधानिक प्रतिष्ठानों की गरिमा को ही चोट पहुंचाने का कार्य कर रहा है। यह बात तब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जब देश के अब तक के लोकसभा अध्यक्षों और राज्यसभा के सभापतियों का आचरण सदा ही निष्पक्ष रहा हो। उनकी कार्यशैली की निष्पक्षता का एक प्रमाण यह भी है कि आज तक के किसी भी लोकसभा अध्यक्ष का राज्यसभा के सभापति को हटाने के लिए कभी किसी भी सांसद ने मांग नहीं की है। तब कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी को उन सभी बातों से परहेज करना चाहिए जिनसे संसद की गरिमा को चोट पहुंचती हो और देश के राष्ट्रपति को जिन्हें देखकर आत्मिक कष्टानुभूति होती हो।

यह संभव है कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के परिणाम उतना लाभ देश को ना पहुंचा पायें जितना उनका शोर मच रहा है। वैसे भी हम नेहरू काल से ही ऐसे शोर शराबे को देखते आ रहे हैं जब किसी पार्टी ने अपने नायक को युग निर्माता बनाकर प्रस्तुत किया हो, यह भी संभव है कि मोदी सरकार ने नोटबंदी से पूर्व कुछ अपने लोगों को लाभ पहुंचा दिया हो और अपने लिए चुनाव लडऩे की सारी जुगाड़बंदी कर ली हो, यह भी संभव है कि नोटबंदी से कुछ उद्योगपतियों को भाजपा ने कुछ विशेष लाभ पहुंचा दिया हो, ऐसे में देश की जनता यही चाहती है कि देश का विपक्ष मोदी सरकार की उन सभी गुप्त जुगाड़बंदियों और जुगलबंदियों को उजागर करे जो देश के लिए घातक होने जा रही हैं? देश के उत्तरदायी विपक्ष का दायित्व है कि वह देश को 'मोदी फोबिया' से मुक्त कराये। इसके लिए देश की जनता ने विपक्ष के नेताओं को देश की संसद का मंच इसलिए उपलब्ध कराया है कि वह इस मंच पर खड़े होकर देश की जनता के सामने देश की सरकार को नंगा करे।
यह लोकतंत्र में ही संभव है कि यहां देश की सरकार का गिरेबान पकडऩे के लिए देश की जनता विपक्ष का भी निर्माण करती है। देश के अन्य मंचों से मोदी अकेले देश की जनता को संबोधित करते हुए अपनी और अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना सकते हैं, परंतु देश की संसद का मंच ऐसा है जहां से वह अकेले अपनी पीठ अपने आप नहीं थपथपा सकते। इस देश का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि यहां कोई भी नेता देश की संसद का मनमाना प्रयोग नहीं कर सकता। तब विपक्ष को भी अपनी शक्तियों का और अपने अधिकारों का दुरूपयोग करने से बचना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वह अभी तक नोटबंदी के देशघाती परिणामों को संसद में उचित ढंग से उठा नहीं पाया है। इसके विपरीत उसने देश की संसद का कीमती समय अवश्य नष्ट कर दिया है। जिससे सारा विपक्ष देश की जनता की नजरों में नौटंकीबाज बनकर रह गया है। तब प्रणव दा का विपक्ष को लताडऩा बहुत अर्थपूर्ण है। एक प्रकार से राष्ट्रपति ने विपक्ष को बातों बातों में समझा दिया है कि वर्ष 2019 में देश के लोगों के सामने क्या लेकर जाओगे? जब देश अपने लोकसभा चुनावों का सामना कर रहा होगा।
हमारे देश का यह सौभाग्य है कि इस समय देश के राष्ट्रपति भवन में सचमुच एक 'संवैधानिक प्रमुख' अर्थात संविधान का संरक्षक राष्ट्रपति बैठा है। जिसके लिए पक्ष और विपक्ष दोनों ही समान हैं। इसीलिए उन्होंने क्रोध और प्रतिशोध की ज्वालाओं में तपते झुलसते भारत के लोकतंत्र को राजनीति के नौसिखिये 'राहुलों से बचाने के लिए वही कह दिया है जो उनकी अन्तरात्मा ने उनसे कहलवाना उचित माना है।

यह बहुत बड़ी बात है कि जब देश में नोटबंदी के चलते बैंकों के मैनेजरों और बड़े लोगों की धांधली के सारे किस्सों को जानकर भी देश के लोग मोदी को इसके लिए अपराधी नहीं मान रहे हैं, जबकि इसमें मोदी सरकार की असफलता झलकती है और उसका कुप्रबंधन स्पष्ट करता है कि देश के नौकरशाहों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है, इस सबके उपरांत भी देश की जनता 'हठीले विपक्ष' को अपराधी मान रही है, यद्यपि वह स्वहित में हठकर कर रहा है। देश की जनता देश के विपक्ष को बता रही है कि मर्म पर चोट करने की बजाए बहाने बनाकर बहस से भागो मत। मोदी सरकार के 'कुप्रबंधन' को उजागर करो और स्वयं कुप्रबंधन से बचो। देश के महामहिम भी विपक्ष से यही चाहते हैं, अच्छा हो कि विपक्ष महामहिम की बात के मर्म को समझे।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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