भाषा विज्ञानी और राजभाषा हिन्दी-भाग-2

  • 2016-12-07 09:30:49.0
  • राकेश कुमार आर्य

भाषा विज्ञानी और राजभाषा हिन्दी-भाग-2

हमारे संविधान की मान्यता रही है कि हमारे देश की राजभाषा हिन्दी के लिए अधिकाधिक शब्द संस्कृत से लिये जाएं। संविधान की यह मान्यता हमारे संविधान निर्माताओं की संस्कृत के प्रति निष्ठा और उसकी वैज्ञानिकता को स्वीकार करने का प्रमाण है। संविधान की धाराओं के प्रति निष्ठा रखने वाले लोग और बात-बात पर संविधान की सौगंध उठाकर उसके अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा लेने वाले लोगों को तनिक यह भी विचार करना चाहिए कि हमारा संविधान अपनी राजभाषा के प्रति कितना सम्मान व्यक्त करता है और हम उसके प्रति कितने निष्ठावान हैं?

हम पूर्व में उल्लेख कर चुके हैं कि भारत में हिंदी के स्थान पर 'हिन्दुस्तानी' को स्थापित करने वाले गांधीजी थे। उनकी विचारधारा के लोगों ने भारत में हिंदी और उर्दू का मिला-जुला व्याकरण लिखा। इससे उन लोगों ने भारत में धर्मनिरपेक्षता और हिंदू मुस्लिम एकता की रक्षा होने का भ्रम पाला। ऐसे लोगों ने 'हिंदुस्तानी' को बड़ी प्रबलता से लागू कराने का प्रयास किया। इन लोगों ने यह भ्रम प्रचारित किया कि 'हिन्दुस्तानी' जब नागरी लिपि में लिखी जाती है, तब हिंदी और जब फारसी-अरबी में लिखी जाती है तब वही उर्दू कही जाती है। राष्ट्रवादी हिंदी लेखकों के लिए यह स्थिति सदा ही अस्वीकार्य रही है, उन्होंने उर्दू हिंदी को अलग-अलग माना है और उर्दू की जहां तक बात है तो वह अपने आप में भाषा न होकर एक बोली है। जिसमें अरबी फारसी के अधिकांश और अन्य भाषाओं के बहुत से शब्द मिलते हैं।

डा. केलाग का कहना है-''उर्दू और हिन्दी का मुख्य अंतर ये है कि उर्दू में फारसी और अरबी के शब्द बड़ी मात्रा में मिलते हैं। उर्दू में फारसी तथा अरबी के शब्दों का प्रयोग बाहुल्य क्यों है? उर्दू को इतना महत्व क्यों प्राप्त हुआ? भारत में अंग्रेजी शासन के राजनीतिक प्रभाव और इस शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारकों की गतिविधियों से यह संभव हुआ। उर्दू वह बोली है, जिसमें शासन ही नहीं अधिकांश अंग्रेज तथा अमेरिकी धर्म प्रचारकों ने हिन्दी पुस्तकें प्रकाशित कीं। हिंदी भाषी जनता के साथ पत्राचार भी उर्दू में किया जाता रहा। असंख्य हिन्दी भाषी लोग उर्दू समझते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि इन दोनों के घरों में कहीं भी उर्दू का प्रयोग नहीं होता। अंग्रेजी की प्रेरणा से अब वास्तविक हिंदी में साहित्य रचा जाने लगा। यदि कोई भविष्य बताने का साहस करे तो वह कह सकता है कि भविष्य में उत्तर भारत की जो भाषा राजकार्य या साहित्य की भाषा बनेगी वह ऐसी भाषा होगी जो उर्दू की भांति अरबी, फारसी से कम प्रभावित होगी और साथ ही उसमें वर्तमान हिंदी की अपेक्षा संस्कृत तथा प्राकृत शब्द भी कम रहेंगे।''

हमें भाषाओं को लेकर क्या भूलना चाहिए और क्या नहीं? यह बात भी विचारणीय है। भाषाओं को लेकर लडऩा-झगडऩा भूलने वाली बात है, पर भाषाओं का वैज्ञानिक आधार पर तुलनात्मक अध्ययन सदा ही स्मरण रखने योग्य तथ्य है। भाषा के वैयाकरिणक वैज्ञानिक स्वरूप की रक्षा करना और उसमें घुस गये अवैयाकरिणक और अवैज्ञानिक शब्दों को चुन-चुनकर बाहर निकालना सदा ही स्मरण रखने योग्य बात है। इस आधार पर यदि हिंदी की रक्षा होती हो और उर्दू का भी उद्घार कोई करना चाहे तो उसका स्वागत है। उर्दू के उन शब्दों का विलोपीकरण किया जाना उचित होगा जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, या जो व्याकरण के अनुसार ठीक नहीं है। ऐसी काट छांट के बाद यदि देश में कोई 'हिंदुस्तानी' विकसित हो सके तो हम उसे भी समृद्घ हिन्दी ही मानकर उसका स्वागत करेंगे। जो लोग भविष्य में उर्दू हिंदी के एकीकरण से बनने वाली किसी एक भाषा या लिपि का सपना देखते हैं उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए ऐसा एकीकरण हिंदी के सम्मान को खोकर किया जाना कदापि संभव नहीं होना चाहिए। भाषा विज्ञान, तर्क, वैयाकरणिक शुद्घता आदि को ध्यान में रखकर ही किसी भाषा के दूसरी भाषा के साथ विलीनीकरण की प्रक्रिया को पूर्ण किया जाना उचित होता है।
हिंदी अपनी वैज्ञानिकता के कारण तथा अपने वैज्ञानिक स्वरूप के कारण निरंतर अपने देशवासियों में ही नहीं विदेशों में भी लोकप्रिय होती जा रही है। देश में ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे स्थानों या क्षेत्रों में जहां कि खड़ी बोली का प्रचलन है-लोग अब खड़ी बोली के स्थान पर मानक हिंदी का प्रयोग करने लगे हैं। बड़ी तेजी से अवैज्ञानिक और अवैयाकरणिक शब्दों को अपनाने के प्रति लोगों का रूझान समाप्त होता जा रहा है। सरकारी स्तर पर हिंदी को शिक्षा माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया जा रहा है। शिक्षा संस्थानों में अध्यापकों को हिंदी का सम्मान करते देखा जा सकता है। यद्यपि अभी भी हिंदी को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। परंतु उच्च शिक्षा संस्थानों में हिंदी को तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दावलियों का निर्माण कराके केन्द्र सरकार भी इस भाषा के उन्नयन के विशेष उपाय कर रही है। यह भी एकशुभ संकेत है कि बहुत से स्थानों पर संस्कृत के शब्दों को ही हिंदी में अपना लिया गया है। जैसे इंजीनियर को अभियंता, वकील को अधिवक्ता, डॉक्टर को चिकित्सक कहे जाने का प्रचलन बढ़ा है। ऐसे में संपर्क भाषा के रूप में भी हिंदी का प्रचलन बढ़ा है। दक्षिणी भारत की जनता संस्कृतनिष्ठ हिंदी को हिंदुस्तानी की खिचड़ी भाषा की अपेक्षा शीघ्र समझ लेती है। अत: वे अभियांत्रिकी वैज्ञानिक, विमानिकी, तकनीकी, शिल्पविद्या आदि संस्कृतनिष्ठ शब्दों को अपनाने में सहजता का अनुभव करते हैं। यद्यपि दक्षिण में हिंदी विरोध के स्वर भी यदाकदा सुनने को मिलते हैं, परंतु शिक्षणार्थी बड़े ही मनोयोग से हिंदी को अपनाते जा रहे हैं।
भाषाई आधार पर बने प्रांतों ने हिंदी की गरिमा को ठेस पहुंचाने का कार्य किया है। हमारा मानना है कि सरकारी स्तर पर यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के सत्यनिष्ठा से कार्य किया जाए तो हिन्दी बहुत ही शीघ्र अपने गौरवरूपी स्थान को प्राप्त कर सकती है।

हमारे चलचित्र, समाचार पत्र, आकाशवाणी और दूरदर्शन वाले लोग यदि हिंदी के मानक स्तर को स्वीकार कर लें और उसे लागू करने का संकल्प ले लें तो बहुत ही अच्छे परिणाम हमें हिंदी के उन्नयन को लेकर आते दिखाई देंगे। एक शुभ संकेत यह है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार जगत में भी अब हिंदी को प्रयोग के लिए सर्वाधिक उपयोगी होना माना जाना है। शुकदेव शास्त्रीजी लिखते हैं-''हिंदी आधुनिक भारतीय भाषाओं के मध्य सर्वोत्कृष्ट एवं समृद्घ भाषा के रूप में स्वीकृत है और भारत में ही नहीं विश्व में वह शिक्षा और अध्ययन-अध्यापन का माध्यम बन चुकी है। किंतु ऐतिहासिक कारणों से हिंदी के संबंध में अभी भी बहुत करना शेष है जबकि संस्कृत की परंपरा में विकसित होने के कारण हिंदी को बहुत सीमा तक आगे बढऩे की सुविधाएं प्राप्त हैं। इस दिशा में हिंदी व्याकरणों की नितांत उपयोगिता है। परंतु जितनी अपेक्षा थी वह नहीं हो पायी है। इसलिए हिंदी व्याकरण को अधिक व्यावहारिक तथा उपयोगी बनाना समय की मांग है।
बात साफ है कि संघर्ष पथ कुछ सहज तो हुआ है-पर अभी उसकी प्रशस्ति पूर्ण हो गयी हो यह नही कहा जा सकता है। अपने लक्ष्य से निश्चय ही हम अभी दूर हैं। पर यदि सही दिशा का निर्धारण हो जाए तो एक दिन लक्ष्य भी बेध लिया जाता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.