भाषा विज्ञानी और राजभाषा हिन्दी

  • 2016-12-05 06:30:32.0
  • राकेश कुमार आर्य

भाषा विज्ञानी और राजभाषा हिन्दी

भारत में भाषा विज्ञान का सिद्घांत अति प्राचीन है। परंतु आधुनिक भाषाशास्त्री इसे ढाई तीन सौ वर्ष पुराना ही मानते हैं। जैसा कि 'भाषाविज्ञान का इतिहास' पृष्ठ 19 में कहा गया है कि व्याकरण, भाषाशास्त्र एवं भाषाविज्ञान ये तीनों शब्द बहुत सीमा तक एक दूसरे के पर्याय हैं, किंतु आधुनिक चिंतकों के अनुसार पुराने भाषा विवेचनों को भाषा विज्ञान नहीं कहा जा सकता। उनका कथन है कि विद्वानों का भाषा विज्ञान और आधुनिक भाषा विज्ञान के संबंध में अभी भी किंचित मतभेद है। सोलहवीं शताब्दी तक के भाषा अध्यापन को कई भाषा विज्ञानी भाषाविज्ञान नहीं मानते। ये पिछले ढाई सौ वर्षों के अध्ययन को ही वैज्ञानिक शोध के अंतर्गत स्वीकार करते हैं और प्राचीन एवं मध्य युगीन परंपराओं पर किये गये शोधकार्य को भी वे केवल भाषा सामान्य का आकृतिमूलक अध्ययन ही मानते हैं। यह विशेष रूप से भाषा के लिखित रूपों की शास्त्रीय व्याख्या मात्र होती है, जिसे वाक मीमांसा अथवा फिलोलॉजी कहा गया है। शेष वैज्ञानिक अध्ययन को भाषा विज्ञान माना गया है। यदि इस उक्ति को स्वीकार कर लिया जाए तो भाषा विज्ञान का इतिहास मात्र ढाई तीन सौ वर्षों पूर्व प्रारंभ होता है।


जिन लोगों ने 16वीं शताब्दी तक के भाषा अध्ययन को भाषा विज्ञान न मानने की बात कही है, उनकी इस मान्यता का आधार अंग्रेजी और उसके परिवार की भाषाओं का अध्ययन रहा है। ये भाषाएं किसी वैज्ञानिक आधार पर नहीं टिकी हैं और इन पर यह बात आज भी वैसे ही लागू होती है जैसे 16वीं शताब्दी में होती थी। परंतु यह बात संस्कृत पर या हिंदी पर लागू नहीं होती। इनका अपना वैज्ञानिक आधार है, जिसे या तो भाषा विज्ञानियों ने देर तक जाना नहीं या जान कर भी उसे वैज्ञानिक मान्यता देने में जान बूझकर देरी की। पर फिर भी यदि ये लोग ऐसा मानते हैं कि 16वीं शताब्दी तक भी भाषाओं का कोई भाषाविज्ञान नहीं था तो जो लोग अंग्रेजी को सभ्यता की और विज्ञान की भाषा मानते हैं, उन्हें अपनी मान्यता पर विचार करना चाहिए और सोचना चाहिए कि यह भाषा भी प्रारंभ से ही वैज्ञानिक नहीं रही है। वास्तव में 16वीं शताब्दी के आगे ही भाषाविज्ञान को मानने से एक और समस्या खड़ी हो गयी कि विश्व में ही नहीं, अपितु कभी-कभी तो भारत जैसे बड़े देशों में भी अनेकों भाषाओं के मानने की मिथ्या अवधारणाएं खड़ी हो गयीं। होना तो यह चाहिए था कि विश्व में प्रचलित 'बोलियों' की 'एक जड़' (संस्कृत) को खोजा जाता और उसके वैज्ञानिक स्वरूप को अवस्थापित कर भाषाओं को उसकी शाखाएं स्वीकार किया जाता, पर यहां उल्टा ही हो गया। भाषा विज्ञानियों ने फलकों को जड़ मान लिया और सारी फलकों का या शाखाओं का अलग-अलग इतिहास खोजने या बनाने में लग गये। बस भाषा विज्ञानियों की यह उल्टी सोच ही आज के भाषाई विवादों की जड़ है।

विवादों की जनक या विवादों को थोपने वाली विद्वत्ता विद्वत्ता नहीं होती, वह तो मानव की विनाशकारी सोच का प्रतीक होती है। उसके निष्कर्ष निश्चय ही पूर्वाग्रह ग्रस्त होते हैं। विद्वत्ता तो उसी को कहा जाता है जो विवादों का विनाश करे और अनेकता को एकता में विलीन कर दे। अनेकता में एकता का रहस्य समझना चाहिए ना कि अनेकताओं का महिमामंडन कर एकता पर उन्हें हावी करना चाहिए। हिंदी के उन्नयन में इस सिद्घांत का पालन किया जाना अपेक्षित है।

हिंदी की जड़ संस्कृत है इस पर पहली बार पंडित श्रीलाल ने 'हिंदी व्याकरण' की रचना की। इन्हीं की बात की पुष्टि अंग्रेज विद्वान एथरिंगटन ने की। उनकी मान्यता थी कि हिंदी संस्कृत से उद्भूत भाषा है। उनका यह भी कहना था कि संस्कृत के साथ जितनी समानता हिंदी की है उतनी किसी अन्य भाषा की नहीं है। वह चाहते थे कि हिंदी को समृद्घ और परिष्कृत करने की दिशा में अभी और भी अधिक कार्य करने की आवश्यकता है। एथरिंगटन के इसी प्रयास को जॉन बीक्स ने आगे बढ़ाया। उन्होंने आर्यभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया और देखा कि संस्कृत ने सभी आर्यभाषाओं को किस प्रकार ज्ञान का अथाह स्रोत उपलब्ध करा दिया है?

एक अन्य वैयाकरण डा. सैमुअल हेनरी केलाग ने भारत की बहुत सी बोलियों का भी तुलनात्मक अध्ययन किया और सभी बोलियों को किसी एक ही भाषा संस्कृत की संतान माना। इस सबके उपरांत भी इन विद्वानों के प्रयास भारत की तत्कालीन सरकार को हिला नहीं पाये। उनका प्रयास हिंदी के लिए तो वंदनीय रहा, परंतु सरकार ने उनके प्रयास को कोई महत्व नहीं दिया। फलस्वरूप हिंदी घोर उपेक्षा का शिकार बनी रही, क्या ही अच्छा होता कि ब्रिटिश सरकार अपने विद्वानों के निष्कर्षों को उचित मानती और अपनी सहृदयता का परिचय देते हुए हिंदी को भारत के न्यायालयों की भाषा बना देती। पर यह कार्य तो अंग्रेजों को तो छोडिय़े हम स्वतंत्र होने पर भी नहीं करा पाये। सरकारी कार्यालयों और न्यायालयों में हिंदी भाषा और नागरी लिपि को प्रवेश दिलाने के लिए लोगों को बड़े-बड़े संघर्ष करने पड़े हैं और तब जाकर सरकारों ने उनकी बात पर थोड़ा बहुत अमल किया है।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी का भी हिंदी भाषा के उन्नयन में विशेष और महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी 'प्रथम हिंदी व्याकरण' नामक पुस्तक छपी। इससे समकालीन विद्यार्थियों को विद्यालयों में हिंदी की शिक्षा प्राप्त करने में सुविधा मिली। भारतेन्दु जी की भांति ही बाबू श्यामसुंदरदास ने हिंदी और उर्दू का संयुक्त व्याकरण लिखा। उसका नाम उन्होंने 'एन. ऐलिमेंटरी ग्रामर ऑफ हिन्दी एण्ड उर्दू' रखा। इनके पश्चात पंडित कामता प्रसाद गुरू का नाम आता है, जिन्होंने हिंदी की अनन्यतम सेवा की। उन्होंने इस भाषा के वैज्ञानिक महत्व को समझा और इस देश के लिए इसे सर्वाधिक उपयोगी मानते हुए कई हिंदी ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों में 'हिंदी व्याकरण' तो प्रमुख है ही उससे भी पूर्व उन्होंने लिखा-'भाषा वाक्य पृथक्करण', 'हिन्दी बाल बोध व्याकरण' और 'सहज हिन्दी रचना।'
इन उपरोक्त वर्णित विद्वानों के वंदनीय प्रयासों का परिणाम यह निकला कि हिन्दी देश के विद्वानों की दृष्टि में कुछ प्रभावशाली बनी। देश की संविधानसभा के अनेकों सदस्यों और विद्वानों ने भी इस भाषा के महत्व और वैज्ञानिक स्वरूप को स्वीकार किया। यही कारण रहा कि जब देश का संविधान अपने निर्माण के अंतिम चरण में था, तब देश की राजभाषा बनाने का प्रश्न उपस्थित हुआ। उस प्रश्न पर यद्यपि देर तक बहस चली, परंतु 14 सितंबर 1949 को संविधानसभा के विद्वान सदस्यों ने अपनी सम्मति से हिन्दी को देश की राजभाषा तथ देवनागरी को देश की भाषा लिपि बनाने का निर्णय लिया। भारत के संविधान का अनुच्छेद 351 इस बात की पुष्टि करता है कि हिन्दी भारतीय संघ की राजभाषा है।

वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय राजभाषा हिंदी को केवल इसके वैज्ञानिक स्वरूप के कारण दिया था। उन्होंने इस बात को समझा था कि यदि हिन्दी को भारतीय की राजभाषा बनाया जाता है तो भारत वैज्ञानिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक तीनों क्षेत्रों में उन्नति करेगा। इन तीनों क्षेत्रों में कोई देश तभी उन्नति करता है जब वह अपनी भाषा में सोचना, बोलना और लिखना जानता हो। इस प्रकार कोई भी राजभाषा अपने देश के स्वाभिमान का प्रतीक होती है। हमें प्रसन्नता होनी चाहिए कि भारत की राजभाषा हिन्दी के भीतर ऐसे गुण हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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