नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र, भाग-तीन

  • 2016-10-01 04:30:48.0
  • राकेश कुमार आर्य

नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र, भाग-तीन

पिछले 50-60 वर्षों का अवलोकन किया जाए तो अपने राजा का अनुकरण करते हुए कितने ही नौकरशाह, उद्योगपति, धन्नासेठ, मंत्री, सांसद, विधायक, सरकारी नौकर, ऊंची पहुंच वाले लोग, विभिन्न पार्टियों के पदाधिकारी, कार्यकर्ता और इन सबके मित्र, परिचित, संबंधी और चाटुकार इस चोर दरवाजे से निकल चुके हैं। अपराधियों के ऊपर से इन सबके कारण कानून का शिकंजा ढीला पड़ता चला गया है, राष्ट्रीय चरित्र नाम की

वस्तु पनपी ही नही। पनपने से पहले ही वह मसल दी गयी।

बिजली चोर, टैक्स चोर जैसे कितने ही लोग यहां पैदा हो गये या हो जाने दिये गये। यदि 'राजा' ये जानता कि तेरा व्यक्तित्व जनसाधारण के लिए अनुकरणीय होता है इसलिए तू संभलकर अनुकरणीय कार्य कर, तो यह स्थिति आती। क्योंकि तब किसी अपराधी को पुलिस से छुड़ाने के लिए किसी मंत्री, सांसद या विधायक का फोन नही जाता और ही न्यायालयों में

अन्याय को प्रोत्साहन देने के लिए कोई सहानुभूति पत्र लिखे जाते। तब भ्रष्टाचार से राष्ट्र मुक्त होता, व्यभिचार का कहीं नामो-निशान तक होता, और अनाचार कहीं जेलों में पड़ा हुआ सड़ रहा होता।

'सत्यमेव जयते' व्यवहार में लायें

हमने अपनी राजनीतिक व्यवस्था का आदर्श वाक्य बनाया 'सत्यमेव जयते' लेकिन ये भूल गये कि व्यक्तिगत जीवन भी सत्य पर आधारित होना अपेक्षित है-सत्य की जीत के लिए।

क्योंकि अनृत (अन+ऋत-असत्य) पर आधारित सत्य की जय नही हो सकती। इसलिए जीवन का सत्य पर आधारित होना नितांत आवश्यक है। तभी सत्य महिमामंडित होगा, तभी उसकी जय होगी और तभी असत्य (भ्रष्टाचार, व्यभिचार, पापाचार और अनाचार) वहां से दुम दबाकर भागेगा।

भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लें

आज समय गया है जबकि देश की जनता को इन घोटालेबाजों, भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों से मुक्ति पाने के लिए

कमर कसनी है। ये सभी (अपवाद स्वरूप कुछ गणमान्य व्यक्तियों से क्षमा याचना सहित) राष्ट्र के साथ छल कर रहे हैं। नये-नये मिथक गढ़ रहे हैं और हमारा ध्यान उन मिथकों में भटकाकर स्वयं राष्ट्र की लहलहाती फसल को बड़े मजे के साथ खा रहे हैं।

जानवरों का चारा खाने वालों को इस राष्ट्र रूपी खेत से बाहर निकाल भगाने का समय गया है। इनके व्यक्तिगत जीवन के जलवों के कारण राष्ट्र अब और 'तंदूर

कांड' नही देख सकता और ही राष्ट्र को मिथकों के भ्रमजाल में फंसाकर उसकी संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों से इन्हें खिलवाड़ करने देगा।

समय की दस्तक को पहचानकर राष्ट्र को आज वर्तमान राजनीति के इस षडय़ंत्रकारी मिथक से अपने आपको ऊपर उठाना है कि व्यक्ति का व्यक्तिगत और सार्वजनिक दो प्रकार का जीवन होता है। अपितु इस सत्य को इसके स्थान पर स्थापित करना है कि व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन

ही उसके सार्वजनिक जीवन का आधार है। यदि व्यक्तिगत जीवन की उपेक्षा की गयी तो अनर्थ हो जाएगा। सत्य की उपेक्षा की जाए और फिर भी सत्य की जीत की प्रत्याशा की जाए यह कितना बड़ा झूठ है। जनता इस सत्य को समझे कि इसी प्रकार के मिथक के सहारे उसे कितना ठगा गया है, कितना छला गया है और उसको कितना मूर्ख बनाया गया है?

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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