नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र, भाग-चार

  • 2016-10-04 06:30:19.0
  • राकेश कुमार आर्य

नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र, भाग-चार

भारत एक विविधताओं का देश है। इसके विषय में एक मिथ्या और भ्रामक धारणा यह भी स्थापित की गयी है कि यहां 'अनेकता में एकता' का वास है। विश्व के किसी अन्य देश में ऐसी भ्रामक और मिथ्या बातें नही मिल सकतीं। इन सब मिथ्यावादी बातों को केवल भारत ही सहन कर सकता है। इसीलिए इसे विविध धर्मों, भाषाओं, जातियों, वर्गों और संप्रदायों का देश माना जाता है।
यह दुखद है कि इन सब मिथ्यावादी और भ्रामक धारणाओं का अस्तित्व बनाये रखकर भी हम भारत में एकता की बातें करते हैं। सचमुच हम अभी बच्चे हैं। खिलौनों के झूठ से अपना मन बहला रहे हैं। इन सब छद्म मान्यताओं का मूल है-हमें ये समझाना कि हमें स्वतंत्रता मिली थी-'बिना खड्ग बिना ढाल' जिन्होंने स्वतंत्रता को इतना आसान समझ लिया, उनके वश की बात नही थी कि वे विभिन्न संप्रदायों, वर्णों, जातियों, धर्मों, भाषाओं और क्षेत्रों में विभाजित भारत को एक कर सकते थे। क्योंकि 'एक' करने के लिए जिस साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी वह उनके पास नही थी।

समस्याओं के नाग का पिटारा न खोलें
अत: ऊपरी बातों मन बहलाकर छद्म अहिंसावादियों ने भारत का और स्वयं अपना मन भ्रमित करना आरंभ किया। स्थिति की भयंकरता को एक ओर रखकर उन्होंने नाग के सामने बीन बजानी आरंभ कर दी। वे बीन बजाते रहे और समस्याओं का नाग बीन के समक्ष नाचता रहा।
परिणाम क्या निकला? यही कि नाग आज भी जीवित है। सारे नाग यथा क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, जातिवाद, भाषावाद आदि बड़ा भयंकर रूप धारे देश में स्वच्छंद होकर नाच रहे हैं और उधर हमारे कुछ नेता, कुछ बुद्घिजीवी और कुछ कलम के सिपाही राग अलाप रहे हैं कि भारत में 'विविधता में एकता' है। पता नहीं ये लोग क्यों भूल गये कि 'विविधता में एकता' तो घर तक में भी स्थापित नहीं हो सकती।

विविधता वैचारिक भेद को उत्पन्न करती है और वैचारिक भेद से मन में सीमा रेखाएं बनती चली जाती हैं। पुन: देर-सवेर ये सीमा रेखाएं ही राष्ट्रों का विभाजन कराने में सहायक बनती हैं। आज संसार में विभिन्न राष्ट्र दिखलाई पड़ते हैं। इन सबका इतिहास और उत्पत्ति इसी क्रम की परिणति है। सारा संसार कभी एक चक्रवर्ती सम्राट से भी शासित रहा है, और कभी संपूर्ण वसुधा को एक परिवार भी माना गया है।
किंतु उस 'एक परिवार' का विखण्डन आज विभिन्न 'परिवारों' अर्थात राष्ट्रों के अस्तित्व के रूप में देखने को मिल रहा है। इसका कारण एक ही रहा-विविधताओं का अपने स्वरूप को राष्ट्र के रूप में परिवर्तित करने हेतु व्यग्र हो उठना।
एक समय पिता के चार बेटे एक ही छत के नीचे रह लेते हैं, किंतु जब अपनी छाप समाज में अलग दिखाने की होड़ उनमें जन्म ले लेती है तो फिर छत का भी विभाजन होता है और चल-अचल सारी संपत्ति का भी विभाजन होता है। परिणामस्वरूप एक-अनेक में विभाजित हो जाता है।
पिता के चारों पुत्र तभी एक थे जब तक विचार एक था, भाव एक था, कार्य में भी समानता और समरूपता थी, जब विचार दूषित हुआ तो उनके कृतित्व का लोक भी दूषित हो गया।

राष्ट्रीय एकता अमोघ अस्त्र है
अत: निष्कर्ष निकलता है कि 'एकता में अनेकता' राष्ट्र में विखण्डन और विघटन को जन्म लेती है। इसलिए अनेकता में एकता हो ही नही सकती। अनेकता का होना विचारों की विभिन्नता और कृतित्व की दिशाहीनता को दर्शाता है।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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