देश के लोगों को है दूरबीन की आवश्यकता

  • 2016-11-22 04:30:49.0
  • राकेश कुमार आर्य

देश के लोगों को है दूरबीन की आवश्यकता

एक व्यक्ति दूरबीन लिए लोगों को तमाशा दिखा रहा था। दो जिज्ञासु व्यक्ति उसके पास पहुंचे और बोले, ''हम भी तमाशा देखना चाहते हैं?'' ''बोलिये, क्या देखना चाहते हैं?'' दूरबीन वाला बोला। पहला बोला-''मैं स्वर्गलोक देखना चाहता हूं।'' दूसरा बोला-''मैं पृथ्वी देखना चाहता हूं।''
दूरबीन स्वर्गलोक देखने वाले की आंखों के सामने रखते ही उसे स्वर्गलोक दिखने लगा। दूरबीन वाला बोला-''कुछ दिख रहा है?'' हां, स्वर्गलोक दिखाई दे रहा है। भगवान अत्यंत व्यस्त हैं।'' ''अच्छा, वे क्या कर रहे हैं?''
''अपनी आकृति के अनुसार मनुष्यों का निर्माण कर रहे हैं?''
दूरबीन दूसरे जिज्ञासु के हाथों में थमा दी गयी। वह पृथ्वी की ओर देखने लगा। ''कुछ दिख रहा है?'' दूरबीन वाले ने पूछा। ''अरे वाह! मुझे तो पृथ्वी के सारे मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरूद्वारे दिखाई पड़ रहे हैं। इनमें ढेर सारे व्यक्ति बैठे हैं।'' पहले वाले जिज्ञासु से पूछा-''तुम्हें स्वर्गलोक में कितने भगवान दिखे?''
पहला जिज्ञासु बोला-'भगवान तो एक ही था-बनाने वाला, पर मनुष्य की आकृतियां अनेक थीं।'' फिर उसने दूसरे जिज्ञासु से पूछा-'तुमने क्या देखा?' 'मैंने देखा कि वहां तरह-तरह के मनुष्य हैं और सब अपने जैसे तरह-तरह के भगवान बना रहे हैं।'
''बस दुनिया के सभी झगड़ों की वास्तविक जड़ यही है। इस पृथ्वी पर व्यक्ति अपने-अपने भगवान बना लेता है, और फिर ये भगवान परस्पर लड़ते रहते हैं, भगवानों को लड़ते देखकर मनुष्य लड़ते रहते हैं।'' दूरबीन वाला बोला।

दूरबीन वाले की बात में बल है। अब इसी बात को तनिक भारत के लोकतंत्र पर आजमाकर देखते हैं। इसकी अन्तश्चेतना का देवता एक है-भारत देश। इसकी अन्तश्चेतना की देवी एक है-'भारत माता।' ना भारत देश अलग है और ना भारतमाता अलग है। दोनों का अर्थ एक ही है। दोनों भारत देश में देवनिर्माण-अर्थात नर से नारायण बनाने के कार्य में लगे हैं। जब कोई अन्तर्दृष्टा इस भारत देश की इस अन्तश्चेतना को समझता है या दूरबीन से देखता है तो उसे पता चलता है कि मां भारती विधाता का रूप धारण किये बड़े मनोयोग से ध्यानपूर्वक देवनिर्माण के कार्य में लगी है। ऐसे तत्वदर्शी को मां भारती की इस साधना को देखकर बड़ा आनंद आता है। पर जब एक दूसरा व्यक्ति भारत के नेताओं को देखता है तो वह कह उठता है कि ये लोग देश में अपने-अपने ढंग के मनुष्य बना रहे हैं। ये स्वयं में पूर्ण नहीं है, इनकी साधना तनिक भी नहीं है, इनका कोई तप भी नहीं है, परंतु फिर भी ये अपने आपको धरती का भगवान मान बैठे हैं, और लोगों को अपने-अपने मुखौटे प्रदान कर देश में उपद्रव करा रहे हैं। दूरबीन वाले ने दोनों की बातों को सुनकर कहा कि बस ये दूसरे वाले हैं ना ये ही झगड़े की जड़ हैं। मां भारती तो साधना की देवी हैं, पर ये जो नेता हैं-ये झगड़े की जड़ हैं।

भारत के लिए कौन बोलता है? निश्चित रूप से वही जो भारत की अन्तश्चेतना को जानता है, जो मां भारती का साधक उपासक है। जिसका लक्ष्य मां भारती को विश्व भारती के उच्चतम पद पर आसीन करना है। अभी एक कम्युनिस्ट नेता का बयान आया है कि 2000 के नोट पर अंतर्राष्ट्रीय अंकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वह हिन्दी अंकों को प्रयोग में लाना 'पाप' मानते हैं, ये ही लोग हैं जो भारत में संस्कृत और संस्कृति की बात करना 'पाप' मानते हैं। ये ही लोग हैं जो भारत में 'हिंदी, हिंदू, हिन्दुस्तान' की बात करना 'पाप' मानते हैं और ये ही लोग हैं जो भारत में आर्य, आर्यभाषा, आर्यावर्त की बात करना अपराध मानते हैं। सारे कम्युनिस्टों की मंडी में जाइये सारा चिंतन यही मिलेगा कि ये 'पाप' हो गया और ये 'पाप' हो गया। इन्हीं के सुर में सुर मिलाती देश की पुरानी पार्टी कांग्रेस है और अब इनसे दस कदम आगे जाने का मन बना चुकी 'आप' है। उसकी मण्डी में इतने 'सड़े टमाटर' हैं कि उन्हें आपस में एक दूसरे पर फेंक फेंककर सारे बच्चों की तरह खेल रहे हैं। कभी-कभी टमाटर फेंकने की घटना अखबारों में आ जाए तो पार्टी का मुखिया ही कह देता है कि 'नहीं-हम तो ऐसे ही खेल रहे थे।'

लोकतंत्र में मतभिन्नता का सम्मान होता है, और होना भी चाहिए। पर यह मतभिन्नता केवल इसलिए होती है कि हम किसी एक ठोस मत पर एक हो सकें। कहने का अभिप्राय है 'राष्ट्रहित' कैसे साधा जाए-यह हम सबका सांझा लक्ष्य होता है। जैसे कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, वैसे ही कोई पार्टी भी पूर्ण नही ंहोती। पूर्ण की प्राप्ति के लिए जनता सबको जनादेश देती है कि जाओ और 'एक रूपया' बनाओ। जनता 543 सांसद चुनकर एक रूपया बना देती है, जैसे भगवान स्वर्ग में 'एक' को बनाने में में व्यस्त हैं, वैसे ही जनता तो 'एक' बना देती है पर नेता उस 'एक' को 'अनेक' में बांट देते हैं, जब संसद में जाते ही भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट आदि में ये बंट जाते हैं और फिर लग जाते हैं, एक दूसरे के कपड़े फाडऩे में। स्पष्ट है कि नेताओं से अधिक समझदार तो देश का मतदाता है।
देश के नेता जनादेश को बांट कर देखते है, कहते हैं मेरे साथ इतने लोग हैं मेरे साथ इतने लोग हैं? तब कैसे कहा जा सकता है कि हमारे नेता साम्प्रदायिकता से लड़ सकते हैं? जो लोग देश की संसद को ही वर्गीय संघर्ष में बदल देना चाहते हैं उनसे देश के भले की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

देश की जनता देश के झगड़ों की जड़ को समझे और ऐसे लोगों को ही आगे भेजें जो मां भारती के सच्चे साधक हों, जो देश की बात करते हों और द्वेष की बातों को मिट्टी में मिलाने की कला जानते हों। ऐसे महानायकों को ढूंढऩे के लिए भी 'दूरबीन' की आवश्यकता है। वैसे, यह दूरबीन मां भारती की साधना के हर साधक के पास है।