माता-पिता और संतान

  • 2016-07-29 04:30:54.0
  • राकेश कुमार आर्य

माता-पिता और संतान

नीतिकारों के ये ऐसे आशीष वचन हैं जो हर 'समुदाय' अपने-अपने अनुयायियों को देता है। यथा-

-माता-पिता की सेवा करनी चाहिए।

-बड़ों का कहना मानना चाहिए।

-माता-पिता की सेवा से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्घि होती है।

यही कारण है कि कुछ लोगों ने धर्म की इन बातों के 'मजहब' में भी घुली-मिली होने के कारण धर्म और मजहब को एक ही मान लिया। ऐसे बहुत लोग हैं जो ये कहते हैं कि हर मजहब नैतिक उपदेश तो एक जैसे ही देता है

, इसलिए सब धर्मों के रास्ते तो अलग-अलग हो सकते हैं, किंतु लक्ष्य तो सबका एक ही है, अर्थात साधनों की भिन्नता के उपरांत भी साध्य तो एक ही है।

धर्म और मजहब को एक करके देखने की इस सामंजस्य पूर्ण व्याख्या के कारण लोगों का मन तो कथित विद्वानों और व्याख्यारों ने बहलाया किंतु उनकी आत्मिक तृप्ति नही कर पाये।

मन की तृप्ति के उपाय

हमें देखना होगा कि मजहब यदि धर्म ही होता तो समाज में पायी जाने वाली विभिन्न जीवन व्यवस्थाएं

, मान्यताएं, बहुसंख्यक- अल्पसंख्यक का रोना-धोना, निर्बल पर सबल का अत्याचार और अनाचार आदि सभी समाप्त हो गया होता। क्योंकि मजहब और धर्म एक न्यूनतम सांझा कार्यक्रम पर कार्य करते-करते एकाकार होकर मात्र उन्हीं बिंदुओं तक सिमट कर रह जाते जिनसे न केवल मानवता का अपितु प्राणिमात्र का भी भला होता। इस प्रकार मजहब पर धर्म हावी हो जाता और मजहब (सम्प्रदाय) अपनी आभा को खो बैठता।

माता-पिता के प्रति सम्मान का समान भाव सभी मजहबों या संप्रदायों ने समान रूप से माना है किंतु इसके उपरांत भी सभी की जीवन जीने की व्यवस्थाएं तो भिन्न हैं ही। जब तक जीवन जीने की व्यवस्था में भिन्नता है तब तक मानवता का पूर्ण विकास होना संसार में संभव ही नही है।

ईसाइयत की मान्यताएं

ईसाइयत ने अपने अनुयायियों को जो जीने की कला और ढंग सिखाया है उसके विषय में आज के ईसाई जगत की वर्तमान दशा को देख लेना मात्र ही पर्याप्त है।

'सैक्स की खुली छूट और भौतिकवाद की खुली लूट' इन दो बातों में ही ईसाइयत का जीवन व्यवहार सिमट कर रह गया है। पश्चिम की चकाचौंध भौतिक विज्ञान में उसके द्वारा की गयी उन्नति का परिणाम है। यह चकाचौंध किसी 'विज्ञान' की तो परिचायक है किंतु इसमें ज्ञान नही है। ज्ञान के अभाव में ईसाइयत का वास्तविक दृश्य 'छूट और लूट' में हमारे सामने स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। यहां ज्ञान से हमारा अभिप्राय 'अध्यात्म ज्ञान

' से है।

ईसाइयत सैक्स में इतना आगे बढ़ गयी कि बहन-भाई और माता-पुत्र और पिता और पुत्री तक के पवित्र संबंधों को इसने कलंकित कर दिया है। समाचार पत्रों में ऐसे समाचार आते रहते हैं, जो हमारे इस कथन की पुष्टि करते हैं। जहां तक भौतिकवाद का पश्चिमी समाज पर प्रभाव पडऩे का प्रश्न है तो उनके समाज को, उनकी भागदौड़ को, आपाधापी, खींचतान व पैसे के लिए हत्या आदि सारी गतिविधियों को देखकर लगता है कि जिसे ये लोग सभ्य समाज कहते हैं वह सभ्य न होकर असभ्य और पाशविक हो गया है। पैसे ने इन्हें पागल या उन्मादी कर दिया है।

भौतिकवाद के दुष्परिणाम

परिणाम सामने हैं। समाचार पत्र बता रहे हैं, पत्रिकाएं बता रही हैं, सर्वेक्षण एजेंसियां बता रही हैं कि भौतिकवाद की अंतिम स्थिति वहां आ चुकी है। अंतिम स्थिति वह स्थिति है जिसमें पागल हुए व्यक्ति का मन सांसारिक संबंधों से भर जाता है। पश्चिमी जगत ने पहले भारतीय समाज के विपरीत संयुक्त परिवारों की प्रथा को तोड़ा

, फिर पति-पत्नी बच्चे से कटकर और घटकर बच्चे हॉस्टल में और पति-पत्नी ऑफिस में या 'बैडरूम' में या क्लबों में होने की प्रथा का अनुकरण किया।

अंत में अब स्थिति यह आ गयी है कि वहां विवाह की आवश्यकता ही अनुभव नही की जा रही है। कुंआरी मां बनने का शौक लड़कियों में लग गया है, चौकाने वाले समाचार ये भी हैं कि अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन जैसे देशों में लड़कियां अब मां बनना ही नही चाह रही हैं। आखिर क्यों

? पहले हास्टल के भीतर पलने-पढऩे वाले बच्चे का मन माता पिता से भरा। माता-पिता का मन फिर उस संतान से भरा जिसने उसे वृद्घावस्था में उठाकर दूर पटक दिया।

माता-पिता ने जो दृष्टिकोण अपने बच्चे के बचपन के उन दिनों में उससे रखा-जबकि उसे मां के प्रेम की अति आवश्यकता थी उससे संबंध इतना भर रखा कि फीस ले ले, खर्च चाहे जितना करा ले, पर हमें छोड़ दे-अपनी मस्ती के लिए और धन कमाने के लिए।

जब बच्चे बड़े हो गये

एक दिन बच्चा बड़ा हुआ। माता-पिता वृद्घ हुए। अपनी-अपनी सेवाओं से सेवानिवृत्त हुए तो बच्चे से युवक बने बेटे ने माता-पिता से कह दिया कि तुम वृद्घाश्रम में जाओ। पैसे ले लो, सेवादार ले लो, खर्च चाहे जितना करा लो। पर हमें छोड़ दो, अपनी मौज मस्ती और धन कमाने के लिए। बच्चे को माता-पिता का पैसा सारी सुविधाएं उपलब्ध कराकर भी माता-पिता न दे सका। वह तड़पता रहा, रोता रहा,

कुंठित होता रहा-अपने माता-पिता के लिए।

ऐसे ही एक दिन वह आया जब माता-पिता को उनके बच्चों को पैसा और सेवादार वह 'बेटा' नही दे सका जो देना चाहिए था। अत: दोनों एक दूसरे के प्रति नीरस हो गये। ऐसी स्थिति में कोई युवती मां क्यों बनना चाहेगी? जब वृद्घावस्था वृद्घाश्रमों में ही कटनी है तो फिर मां बनने का झमेला कोई क्यों उठाएगा? ईसाइयत की इसी व्यवस्था ने संसार की दशा को दुर्दशा में परिवर्तित कर दिया है। आज न तो बचपन के चेहरे पर प्रसन्नता है और न ही वृद्घ की झुर्रियों पर कोई तेज है। दोनों का कुछ खो गया है उसे पाने की चाह में

, संसार की राह में टकटकी लगाये बैठे हैं, कौन देगा इनका खोया हुआ मोती खोजकर इन्हें-यह गंभीर प्रश्न है?

इस्लाम की मान्यताएं

संसार में इस मजहब को मानने वाले पर्याप्त लोग हैं। हर संप्रदाय की भांति इस्लाम के भीतर भी कुछ अच्छी बातें हैं। माता-पिता के प्रति सेवा का भाव बरतना यह मजहब भी सिखाता है। लेकिन

, वहां भी आज कितने ही 'औरंगजेब' उत्पन्न हो चुके हैं जिनके कारण माता-पिता के चेहरों पर फीकापन और रूखापन स्पष्ट दिखाई देता है।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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