पाक-'खुद मियां फजीहत औरों को नसीहत'

  • 2016-10-22 03:30:50.0
  • राकेश कुमार आर्य

पाक-खुद मियां फजीहत औरों को नसीहत

वैसे तो चाहे पाकिस्तान हो चाहे बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान हों और चाहे कोई अन्य 'स्थान' या स्तान हों वे सभी कभी न कभी भारत के भाग रहे हैं, 'मजहब' के नाम पर ये हमसे दूर होते गये और भारत बंटता चला गया। बहुत लोग हैं इस देश में जो आज भी इतिहास को अतीत की कब्र मानकर लोगों को आगे बढऩे के उपदेश देते हैं, उन्हें नही पता कि इतिहास की इसी कब्र में से हर बार एक मजहबी उन्मादी भूत बाहर निकलता है और हमें तोडक़र चला जाता है। इसका कारण शायद यही है कि हमने इस जिन्न का कभी 'अंतिम संस्कार' न करके इसे 'सुपुर्दे खाक' ही किया है। अब जो सुपुर्द किया गया है वह कभी न कभी वापस तो मिलेगा ही। अब कुछ भी हो, जब कई 'स्तान' विश्व के मानचित्र पर विद्यमान हों तब उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता।


इन 'स्तानों' में से पाकिस्तान नाम का 'स्तान' अपनी मूल प्रकृति में ही भारत का शत्रु है। इसकी सोच पहले दिन से ही यह रही कि अपने तथाकथित बड़े भाई भारत को जितना अपमानित किया जा सके और जितना पीछे छोड़ा जा सके, उतना ही उचित रहेगा। अपनी इस सोच के पीछे पाकिस्तान का उद्देश्य रहा कि ऐसा करके वह भारत को तोड़ डालेगा और फिर सारे भारत पर उसकी 'मुगलिया' हुकूमत चलेगी। ऐसा सोचते समय पाकिस्तान प्रकृति की न्यायव्यवस्था को भूल गया कि जो जैसा करता है वैसा भरता है। जैसी घृणित सोच आप दूसरों के प्रति रखते हो उसका परिणाम आप पहले भुगतते हैं, क्योंकि वह सोच लौटकर आती है और आपका ही अहित कर जाती है। परिणामस्वरूप पाकिस्तान स्वयं ही बंट गया और उससे अलग होकर एक नया देश बंगलादेश विश्व के मानचित्र पर उभर आया।
भारत क्यों नही बंटा? अब इस पर तनिक विचार करें। इसका कारण यह है कि भारत किन्हीं राज्य समूहों का ऐसा संघ नही है जो स्वतंत्रता पूर्व अलग-अलग देश रहे हों और जिन्होंने 1947 से एक साथ आकर रहना स्वीकार कर लिया हो। इसके विपरीत भारत अंगूर की भांति एकरस अखण्ड राष्ट्र रहा है, इसलिए विखण्डन इसकी प्रकृति में नही है-इसके धर्म में नही है। विखण्डन 'मजहबी' सोच होती है। मजहब जब भी विभाजन कराता है-तब तब ही धर्म रोता है। भारत के लोगों को और विशेषत: राष्ट्रवादी लोगों को भारत के धर्म के इस मर्म को समझना चाहिए और उसके प्रति समर्पित होना चाहिए, क्योंकि भारत अपने धर्म के कारण ही एक और अखण्ड रहा है, यही भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।

उधर पाकिस्तान है जिसने 'भानुमति का कुनबा' 1947 में एकत्र किया और अवैज्ञानिक अतार्किक और अप्राकृतिक ढंग से इस देश का विभाजन कराया, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान को अलग बहुत दूर स्थापित किया गया। यह कैसे संभव था कि इतनी दूर स्थित एक देश पर पाकिस्तान अपना शासन चलाता। परिणामस्वरूप पाकिस्तान टूट गया। अब फिर पाकिस्तान में विखण्डन का लावा दहक रहा है। सारा विश्व देख रहा है कि पाकिस्तानी सेना जो कि आतंकवाद की पोषक सेना के रूप में विश्व में अपनी पहचान बनाने में सफल रही है, किस प्रकार बलूचों का उत्पीडऩ, दलन, दमन और शोषण कर रही है? 15 अगस्त 1947 को कलात को एक अलग देश घोषित किया गया था। तब वहां के खान ने मस्जिद में बड़े गर्व से बलूची भाषा में लोगों को संबोधित करते हुए ईश्वर का धन्यवाद किया था कि वे आजाद हो गये थे। उन्होंने बलूची झण्डा उस समय फहराया और उपस्थित विशाल जनसमूह ने तब अपने नेता और अपने झण्डे का शानदार अभिवादन किया था। यह भी इतिहास का एक सच है कि यह 'कलात' नामक राज्य अंग्रेजों की गुलामी से बाहर था। आज के पाकिस्तान का 43 प्रतिशत भाग बलूचिस्तान का है। इसका सामरिक महत्व है। यही कारण है कि पाकिस्तान ने वहां अपने सैन्य ठिकाने बना रखे हैं। कुछ परिस्थितियां ऐसी बनी थीं कि कुछ समय के लिए बलूचिस्तान की भूमि का प्रयोग करने की अनुमति वहां के खान के अंग्रेजों को 19वीं शती के उत्तरार्ध में दे दी थी। जिसका ब्रिटिश सत्ताधीशों ने दुरूपयोग किया जब भारत के बंटवारे की बात आयी तो बलूचों को उम्मीद थी कि अब उन्हें भी स्वतंत्र देश घोषित कर दिया जाएगा। 19 जुलाई 1947 को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने ऐसा कहा भी था कि कलात एक स्वतंत्र देश है।

इस बात पर पाकिस्तान ने भी अपनी सहमति दी थी और खान ने जिन्ना से मुलाकात करके उसे अपनी स्थिति से अवगत कराया था। खान के तर्कों से जिन्नाह और लियाकत दोनों ही सहमत थे। कलात रक्षा संचार एवं विदेश मामलों में पाकिस्तान के साथ एक विशेष संधि कर अपनी स्वतंत्रता का पक्षधर था। तब पाकिस्तान की सरकार ने कलात को एक सम्प्रभु राज्य की मान्यता देने की बात कही थी, जिस कारण कलात के खान ने स्वयं को एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थापित करने की घोषणा की, पर पाकिस्तान ने कलात के साथ विश्वासघात किया और वह उसे जबरन अपने साथ मिलाने लगा। इस पर कलात के खान ने पाकिस्तान का सामना करने की चेष्टा की, परंतु ब्रिटेन ने उसे सैन्य सामग्री उपलब्ध नहीं करायी और इस प्रकार ब्रिटेन की इस दुष्टता के कारण बलूच लोग पाकिस्तान के गुलाम बने रह गये। आज वही बलूच अपनी स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं जो कि नितांत न्यायसंगत है। एक राष्ट्र को आप कब तक दबा कर रखेंगे? पिछले 70 वर्षों से पाक अपनी स्वतंत्रता की वर्षगांठ मना रहा है परंतु बलूचों की स्वतंत्रता को कुचलकर। कितना हास्यास्पद है कि जो पाकिस्तान स्वयं सत्तर वर्ष से किसी की स्वतंत्रता का खून करता आ रहा है वही हमें हमारे कश्मीर के विषय में उपदेश देता है। खुद मियां फजीहत औरों को नसीहत-इसी को कहते हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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