हमारी संसद और हमारे सांसद

  • 2017-04-01 03:30:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारी संसद और हमारे सांसद

भारत की संसद हो चाहे राज्यों के विधानमण्डल हों सभी में सांसदों या विधायकों की निरंतर अनुपस्थिति या बहुत कम संख्या में उपस्थिति चिंता का विषय बनी रही है। संसद और विधानमंडलों के प्रति हमारे जनप्रतिनिधियों की ऐसी उपेक्षा के कई कारण हैं। सर्वप्रथम तो हमारे जनप्रतिनिधि अब देश सेवा के लिए राजनीति में न आकर व्यापार के लिए इसे अपनाते हैं। जहां व्यापार आ जाता है वहां स्वहित अधिक हावी और प्रभावी हो जाते हैं और लोकहित वहां से खिसक जाता है। इसके अतिरिक्त हमारे जनप्रतिनिधियों को दलगत राजनीति और किसी भी प्रकार से अपनी कुर्सी को बचाये रखने की तिकड़मों में फंसे रहने की आदत सी पड़ गयी है, जिसके कारण इनकी अधिक ऊर्जा किसी भी प्रकार से अपने आपको बचाये रखने के लिए लगती रहती है-जिससे लोकहित गौण हो जाता है। तीसरे-हमारे जनप्रतिनिधियों की योग्यता और उनकी वैचारिक उच्चता का कोई ध्यान प्रचलित संविधान में नहीं रखा गया है। इनमें से अधिकतर ऐसे जनप्रतिनिधि होते हैं जो हमारी संसद या हमारी विधानमंडलों में केवल अपने नेता के पक्ष में हाथ उठाने के लिए ही जाते हैं-ये जनप्रतिनिधि सांसद या विधायक बनकर 'मोटे माल' के चक्कर में घूमते रहते हैं और 'डील' की युक्तियां खोजते रहते हैं। इनकी एक मानसिकता बन चुकी है कि संसद में या विधानमंडल में जिस दिन किसी विशेष विषय पर चर्चा हो रही होगी या पार्टी की ओर से जब अनिवार्य उपस्थिति के लिए 'व्हिप' जारी किया जाएगा-तब वहां बैठ लिया जाएगा। तब तक ये लोग अपने मुर्गों की खोज में घूमते रहते हैं। ऐसे में संसद और विधानमंडलों की गरिमा को सुरक्षित रखना सचमुच कठिन होता जा रहा है।



पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी के सांसदों को संसद में अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित रहने हेतु निर्देशित किया था। ऐसा प्रधानमंत्री ने केवल इसीलिए किया था कि संसद की गरिमा सांसदों की अधिकतम उपस्थिति से ही सुनिश्चित की जा सकती है। इतना ही नहीं सांसदों की अधिकतम उपस्थिति से संसद में चल रही बहस को एक भव्यता और उच्चता मिलती है जब उसमें अधिक से अधिक विद्वान सांसद अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं और सत्ता पक्ष या विपक्ष की बोलती बंद करने में अपनी सक्षमता का प्रदर्शन करते हैं। यदि अधिक से अधिक सांसद संसद में उपस्थित रहेंगे तो देश के लिए उसका एक लाभ यह भी होगा कि देश को एक परिमार्जित और सुलझा हुआ नेतृत्व मिलने की अधिकतम संभावना होगी। जब हमारे जनप्रतिनिधि किसी अपने एक नेता के पिछलग्गू बनकर रह जाते हैं या अपने आपको हाथ उठाने तक सीमित कर लेते हैं, या जब पार्टी का नेतृत्व अपने विधायकों या सांसदों को केवल हाथ उठाने तक के लिए ही प्रयोग करने का प्रयास करता है तब लोकतंत्र की मर्यादाओं का, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का और लोकतांत्रिक सिद्घांतों का हनन होता है।


ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही अपनी पार्टी सांसदों को संसद में अधिकतम समय देने के लिए प्रेरित किया हो इससे पूर्व सोनिया गांधी भी सांसदों की संसद के प्रति निरंतर बनती जा रही उपेक्षावृत्ति पर अपनी चिंता व्यक्त कर चुकी हैं, इसलिए उन्होंने भी संप्रग सरकार के समय सांसदों को संसद में अधिकतम समय देने के लिए प्रेरित किया था। 2009 में एक समय ऐसा भी आया था जब 60 मिनट के प्रश्नकाल को केवल 27 मिनट में ही स्थगित करना पड़ गया था। इसका कारण यही था कि संसद के प्रश्नकाल में अपने प्रश्नों के उत्तर पूछने के लिए सांसद उपस्थित नहीं थे। ऐसा कितनी ही बार हुआ है कि जब 'गणपूर्ति' का संकट भी संसद को झेलना पड़ा है। जब टीवी चैनलों पर संसद में लोकसभा या राज्यसभा की चल रही कार्यवाही के समय बड़ी संख्या में खाली पड़ी सीटें दिखाई देती हैं तो देश के हर संवेदनशील व्यक्ति को कष्टï होता है। यदि हमारे माननीय सांसद अपनी अधिकतम व्यवस्ताओं के कारण लोकतंत्र के पावन मंदिर अर्थात संसद में अनुपस्थित ही रहने को अच्छा समझते हैं और अपनी निजी कार्यों को संसद की कार्यवाही से अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं तो ऐसे में इन्हें सांसद बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। सांसद या विधायक बनने का अभिप्राय है कि हमारा हर जनप्रतिनिधि अपनी हर प्रकार की व्यस्तता को अलग रखकर संसद और राज्य विधानमंडलों के प्रति अपनी निष्ठा को अपने जीवन में और कार्य व्यवहार में सर्वोच्च प्राथमिकता देगा। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह दण्ड का पात्र होना चाहिए।


संसद में जितने भर भी सांसद उपस्थित रहकर देश की विकासपरक नीतियों के निर्धारण अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह करता है और उन पर अपने महत्वपूर्ण और मूल्यवान विचार भी व्यक्त करता है-ऐसे सांसद के विषय में समझना चाहिए कि वह वास्तव में राष्टरभक्त है। राष्टरभक्ति किसी पेड़ पर लगने वाली वस्तु का नाम नहीं है-अपितु उसका प्रदर्शन करना होता है और यह प्रदर्शन व्यक्ति के कार्य व्यवहार से ही झलकता है। यदि व्यक्ति के कार्य व्यवहार में देश के सम्मान के लिए और देश की समस्याओं के समाधान के लिए चिंता और चिंतन दोनों का समावेश है तो व्यक्ति को किसी से भी अपने लिए देशभक्ति का प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। हमें देश की समस्याओं के समाधान के लिए जागरूक नेतृत्व की तो आवश्यकता है ही साथ ही अपने जागरूक जनप्रतिनिधियों अर्थात विधायकों और सांसदों की भी आवश्यकता है, और यह तभी संभव है जब हमारे जनप्रतिनिधि देश की संसद और विधानमंडलों के प्रति अपनी गंभीरता का प्रदर्शन करने लगेंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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