जर, जोरू और जमीन, भाग-4

  • 2017-02-24 04:28:02.0
  • राकेश कुमार आर्य

जर, जोरू और जमीन, भाग-4

यह धारणा भी इण्डो अरब संस्कृति के कथित उपासकों की इस काल्पनिक संस्कृति की परिचायक है। यदि वास्तव में यह मान लिया जाए कि संसार में जितने भी युद्घ हुए हैं वे सभी अपने-अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए हुए हैं और ऐसा तो होता ही आया है और होता भी रहेगा, तो परिणाम क्या होगा?
परिणाम बड़ा भयंकर होगा जैसा कि हम झेल भी रहे हैं। यह धारणा रूढ़ करके कि संसार में जमीन के लिए तो युद्घ होते ही आये हैं, हमने अब तक के युद्घों के औचित्य पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी, अर्थात वर्चस्व स्थापित करने के लिए युद्घ लडऩा हमने मानवीय स्वभाव मान लिया। इसलिए इस स्वभाव के कारण संसार में किसी एक व्यक्ति ने अपनी महत्वाकांक्षा की पूत्र्ति के लिए जितना निर्दोष लोगों का रक्त बहाया वह सब सही था, उचित था यह हमने मान लिया।

मानवता के ऐसे हत्यारों को हम हत्यारा नहीं कह सके अपितु उसे लाभ दे दिया। इस मानवीय स्वभाव की दुर्बलता का कि हर व्यक्ति एक दूसरे पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता ही है। इस मूर्खतापूर्ण धारणा ने संसार में 'मत्स्य-राज' की स्थापना की। व्यक्तिवाद का जन्म हुआ। गरीब और निर्धनों को समाज का कोढ़ समझकर उन्हें या तो सामूहिक रूप से समाप्त कर दिया गया अथवा समुद्र में उठाकर फेंक दिया गया। ऐसे मर्मस्पर्शी उदाहरण भी संसार के इतिहास में उपलब्ध हैं। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हमने दुष्ट को दुष्ट कहना छोड़ दिया।
हमारे यहां मानव की तीन ऐषणाएं उसकी शत्रु मानी गयी हैं। ये हैं-''लौकैष्णा, पुत्रैष्णा, और वित्तेष्णा'' हर व्यक्ति इन तीनों ऐषणाओं से बंधा हुआ है। इन तीनों ऐषणाओं पर नियंत्रण रखने हेतु नीति और मर्यादा का अंकुश मानवीय स्वभाव पर कसा गया। उसे बताया गया कि 'सत्यम् वद् और धर्मम्चर' अर्थात सत्य बोल और धर्म का आचरण कर। अथवा धर्म पर चल। मानव का धर्म उसे बताया गया-श्रेष्ठता की प्राप्ति और उसका विस्तार। निर्बल की रक्षा और महात्मा सज्जनों का कल्याण और दुर्जनों का सफाया।
फलस्वरूप दो बातें हमारे प्राचीन भारतीय समाज में रूढ़ हो गयीं कि 'कृण्वन्तो-विश्वमाय्र्यम्' और गीता का ये आदेश कि-'परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्' हमारे यहां ये दोनों बातें उभर कर इसलिए सामने आयीं कि समाज में 'लोकैष्णा' के वशीभूत होकर जिन लोगों ने एक दूसरे के अधिकारों का यदि कही हनन कर रखा है तो उनके वर्चस्व स्थापन की इस अनाधिकार चेष्टा पर अंकुश लगे।

ऐसे व्यक्ति अनाड़ी हैं, अनार्य हैं, पापी हैं, दुष्ट हैं, दानव हैं, राक्षस हैं, नरपिशाच हैं और नीच हैं। इसलिए कंस को मारना कृष्णजी का धर्म था। उसका वर्चस्व स्थापना का कृत्य एक अपराध था जिसे समाप्त करना कृष्णजी का सबसे बड़ा कत्र्तव्य था। यदि उनकी यह लड़ाई केवल भूमि में किसी टुकड़े को लेकर होती है तो वह कंस वध के पश्चात उग्रसेन को गद्दी पर नहीं बैठाते। ऐसे आदर्श उदाहरण हमारे इतिहास में और भी मौजूद हैं। हमने मानवीय मूल्यों की प्रतिस्थापना की लड़ाई लड़ी। जिन लोगों ने मानवता का जहां-जहां गला घोटा वहीं-वहीं उसमें वर्चस्व को चुनौती दी और उसके ऐसे कुकृत्यों की सदा आलोचना ही नहीं की अपितु उसका समुचित प्रतिकार भी किया।
महाराणा प्रताप को देखें। वह एक ऐसी सत्ता और शासक का प्रतिकार कर रहे थे जो भारतीय धर्म, संस्कृति और राष्ट्र को मिटाने का कार्य कर रहा था। जिसे अपना वर्चस्व स्थापित करना था-भारतीय धर्म पर, भारतीय संस्कृति पर और भारतीय राष्ट्र पर। महाराणा उसे चुनौती दे रहे थे कि मैं तेरे 'मीना बाजार' को भारत में नहीं सजने दूंगा। मैं तेरी नीचता और अधर्मता का पूर्ण प्रतिकार करूंगा और उन्होंने ऐसा ही किया भी था।

शिवाजी के जीवन चरित्र की समीक्षा करें, वह भी एक आततायी दुष्ट और रक्तपिपासु सत्ता का प्रतिकार करते रहे। 'विनाशाय च दुष्कृताम्' का आदर्श उनके सम्मुख था। भारतीय इतिहास में ऐसे बहुत से महाराणा और छत्रपति हैं जो दुष्टों के विनाश के लिए लड़ते रहे। क्योंकि भारतीय आदर्शों का आह्वान यही था। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिन्होंने भारतीय धर्म को बचाने का प्रयास किया, उन्हें तो यहां पथभ्रष्ट माना गया और जिन्होंने भारतीय धर्म को मिटाना चाहा उन्हें महान कहा गया। अत: निष्कर्ष रूप में यह कहा जाता सकता है कि हमने भूमि के लिए भी लड़ाई नही ंलड़ी। साम्राज्य विस्तार कर दूसरे देश, उसकी संस्कृति और उसके धर्म को मिटाकर अपना वर्चस्व उस पर स्थापित करने के लिए हमारी चतुरंगिणी सेनाएं कभी मैदान में नहीं निकलीं। जबकि ईसाइयत और इस्लाम ने ऐसा किया। उनकी अमानुषिक अवधारणाओं की चपेट में हमें लाना या स्वयं हमारे द्वारा ही अपने आपको ऐसा देखना निरी अज्ञानता है। हमने युद्घ किये हैं उनके विरूद्घ जो रहे हैं-
मानवता के हत्यारे।
मानवीय धर्म के भक्षक।
मानवीय गरिमा और मानवीय मूल्यों के हन्ता।।
संसार में मानव समाज को अपनी काली करतूतों से छिन्न-भिन्न करने वाले, अत्याचारी लोग।
जो संसार में अपना वर्चस्व स्थापित कर पाश्विक संस्कृति को प्रोत्साहन्न देते हों।
सुबुद्घ पाठकवृन्द जरा विचार करें कि यदि हमने आज पुन: यही संकल्प ले लिया कि हमें युद्घ करना है, उनके विरूद्घ जो अनार्य हैं, दुष्ट हैं आतंकवादी हैं और राष्ट्रद्रोही हैं, तब ऐसा युद्घ करना हमारा धर्म है। हमारा पुनीत कत्र्तव्य है। किंतु यदि हम यही मानते रहे कि नहीं वर्चस्व स्थापना करना तो मानवीय स्वभाव है तो इस राष्ट्र के शत्रुओं को हम कभी भी चुनौती नहीं दे पाएंगे।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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