शाह, बादशाह और शाहजादे

  • 2017-02-06 09:15:27.0
  • राकेश कुमार आर्य

शाह, बादशाह और शाहजादे

आजकल जुमलों की राजनीति का दौर है। इस समय पांच प्रांतों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में हर राजनीतिक दल ने एक दूसरे पर जुमले उछाल-उछालकर हमला करने तेज कर दिये हैं। भाजपा में मोदी और अमित शाह की जोड़ी अपने विरोधियों पर तीखे वार करने के लिए जानी जाती हैं, उनकी देखा देखी विपक्ष ने भी अपनी धार पैनी कर ली है। अमितशाह ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और अखिलेश की जोड़ी को 'दो शाहजादों की जोड़ी' कहा है तो सपा के आजम खां प्रधानमंत्री मोदी को बादशाह कहते नहीं थकते। 'शाहों-बादशाहों व शाहजादों' की उपाधियों से नेताओं का एक दूसरे को नवाजना बताता है कि इनकी सोच में सामंती कीड़ा है। ये जनता के वोट लेकर शाह, बादशाह और शाहजादे ही बन जाते हैं। यही कारण है कि इन्हें सपने भी शाहों-बादशाहों व शाहजादों के ही आते हैं, और जैसे सपने आते हैं वैसे ही ये बोल बोलते हैं।
''न खिजा में है कोई तीरगी न बहार में है कोई रोशनी,
ये नजर नजर के चिराग हैं कहीं जल गये कहीं बुझ गये।''
आजमखान प्रधानमंत्री मोदी को बादशाह कहते हैं, और वह स्वयं एक ऐसे बादशाह हैं कि एक विश्वविद्यालय सरकारी पैसे से अपने लिए बनवा चुके हैं। उनकी अपनी बादशाहत है और उस बादशाहत के अलग ही किस्से हैं। विश्वविद्यालय बनवाने का उनका कार्य पूर्णत: अलोकतांत्रिक रहा, पर सामंती सोच के सामने लोकतंत्र क्या बेचता है? 'बादशाह' को जिद थी जो पूरी करनी ही थी और उसे पूरी करके ही 'बादशाह' ने दम लिया। अपनी महत्वाकांक्षा के साथ एक संप्रदाय की भावनाएं जोड़ लीं, जिससे कि जिद को पूरा कराने में सहायता मिल सके। अब जिस व्यक्ति ने रातों-रात अपनी जिद पूरी कराके अपनी शान का सिक्का चलाया हो उसको स्वयं को 'बादशाह' होने का घमण्ड हो ही जाता है, इसलिए वह 'बादशाह' जैसे जुमले ही उछालेगा।
अब आते हैं भाजपा के अमितशाह पर। ये ऐसे 'शाह' हैं कि अच्छे-अच्छे समर्पित कार्यकर्ता और पार्टी नेताओं का टिकट काट देते हैं। प्रदेशों में जहां-जहां इनकी पार्टी की सरकार हैं, वहां-वहां उस सरकार को ये 'मेरी सरकार' कहते हैं। पार्टी की सरकार न कहकर 'मेरी सरकार' कहने की यह प्रवृत्ति निश्चय ही उनके 'बादशाही अंदाज' को बताती है। इन्होंने भाजपा को चलाने की नहीं-अपितु हांकने की जिम्मेदारी ले ली है। सबको दण्डवत अपने सामने झुकाना इन्हें अच्छा लगता है। कितने ही भाजपाई इनके आने से हृदयरोगी हो गये हैं। क्योंकि इन लोगों ने पांच वर्ष जी तोड़ परिश्रम कर पार्टी के लिए कार्य किया, उनकी कोई बात न पूछकर भाजपा केे इस 'शाह' ने अपनी मर्जी से अपने व्यक्ति को टिकट दे दिये हैं। कुछ अनुभवी वृद्घों को वृद्घ कहकर बाहर कर दिया है। क्या अंदाज है-अमित शाह का? कहीं विनम्रता नहीं झलकती महोदय के अंदाज में। चौबीस घंटे 'अमित शाही' की बादशाहत के एक अदृश्य घेरे में रहते हैं-सत्ता सिर चढक़र बोल रही है। इन्हें भी 'बादशाहत' के सपने आने की अर्थात 'फीलगुड' की बीमारी है-तभी तो आजम की तरह ये भी 'बादशाह और शाह' के चिंतन में लगे रहते हैं। महोदय ने सपा के अखिलेश और कांग्रेस के राहुल को शाहजादों की जोड़ी कहा है। इन्हें अपनी पता नहीं है कि तैंने स्वयं 'अमितशाही' के नशे में रहकर कितनों का दिल तोड़ दिया है और उन्हें अपने शाही अंदाज से घायल करके रख दिया है। कांग्रेस के राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव की भी चर्चा कर ली जाए। इनमें एक की मां दुखी है कि बेटा सही कार्य नहीं कर रहा, जबकि दूसरे का पिता दुखी है कि बेटा ठीक कार्य नहीं कर रहा। अब जिनके 'गार्जियन' ही जिन्हें 'नलायक' मान रहे हों वे देश में स्वयं को सर्वाधिक 'लायक' मानकर पेश कर रहे हैं कि देखो हमारी जोड़ी कैसी लगती है? तो इससे पता चलता है कि इस जोड़ी को भी भ्रम हो गया है। 'फीलगुड' की बीमारी भाजपा से चलकर कांग्रेस और सपा में भी घुस गयी है। सोनिया गांधी ने अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने के लिए करोड़ों-अरबों रूपया व्यय कर लिया है-पर बेटा है कि अब भी यही बोलता है कि-'जो मैं बोला तो भूकंप आ जाएगा।' लोगों ने कहा-'बोलिए।' बेटा बोल गया-लोग अब तक हंस रहे हैं कि भूकंप तो छोडिय़े एक पत्ता भी नहीं हिला। क्या सोनिया ने अपने शाहजादे को राजनीति में स्थापित करने के लिए देश का करोड़ों-अरबों रूपया इसीलिए फूंका है कि वह बोले तो पत्ता भी न हिले? सचमुच एक लडक़े को स्थापित करने के लिए देश के इतने धन को नष्ट करना बताता है कि कांग्रेस में लोकतंत्र नहीं है वहां सामंती परंपरा है, मां के पश्चात बेटे को स्थापित करना ही है परिणाम चाहे जो हो पर 'राजहठ' पूरी करनी है। सचमुच राहुल गांधी शहजादे सिद्घ हो रहे हैं। यही स्थिति उनके साथी अखिलेश की है। उन्होंने बड़े शांत ढंग से मुलायमसिंह यादव की 'राजनीतिक हत्या' कर दी है, और गद्दी हथिया ली है। उनका यह आचरण शाही परंपरा की ओर संकेत करता है। अब जिस 'पापा' को शांत कर चुके हैं उसी की 'जिंदाबाद' मंचों पर बोल रहे हैं। राजनीति सचमुच चरित्रहीन होती है, इससे शर्म के लिए कोई स्थान नहीं होता। इस प्रकार की राजनीति को हमने मुगल परंपरा में पढ़ा है और हम उसे अपनी आंखों से सपा परिवार में देख रहे हैं। बात साफ है कि यह जोड़ी भी 'शाही जोड़ी' है, एक ऐसी जोड़ी कि जिसका लोकतांत्रिक मूल्यों में कोई विश्वास नहीं है।
ऐसी परिस्थितियों में भी प्रदेश के मतदाताओं के सामने सारी बुराईयों में से अपने लिए एक बुराई को चुनने का विकल्प है। अब मतदाता इन 'सामंतों, शाहों, बादशाहों व शाहजादों' में से किसे अपने लिए चुने? उसके यक्ष प्रश्न का उत्तर भला किसके पास है? जनता इनसे ऊब चुकी है। बासी भोजन को वह बार-बार परे हटाती है पर जब बार-बार वही थाली उसके सामने रखी जाती है तो भूख में थोड़ा बहुत खाना उसकी विवशता हे। लोकतंत्र भी यदि व्यक्ति को विवश कर रहा है और उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कार्य नहीं करने दे रहा है तो मानना पड़ेगा कि देश में लोकतंत्र अभी वास्तविक अर्थों में नहंीं आया है? जनता के कंधे लाशें ढ़ोते-ढ़ोते थक चुके हैं-अब तो किसी नये सूर्य की आशा की जानी चाहिए।