मूल कर्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-2

  • 2016-09-09 05:30:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

मूल कर्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-2

इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय 'समान संकल्प' है। सारे राष्ट्रवासियों का एक संकल्प हो जाना बहुत बड़ी बात है। जिस परिवार का भी 'एक संकल्प' हो जाता है उसके विषय में भी देखा जाता है कि वह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता है। इसलिए एक शिव संकल्प से भर जाना सारे राष्ट्रवासियों का परम कत्र्तव्य है, जब देश पराधीन हो रहा था तो उस समय सारे राष्ट्र में 'एक संकल्प' का ही तो अभाव था। जब वह 'एक संकल्प' इस बात को लेकर बनने लगा कि अब अंग्रेजों को भारत से भगाना ही है तो अंग्रेजों को भारत छोडऩा ही पड़ गया। इसलिए एक 'शिव संकल्प' से बँध जाना भी सभी राष्ट्रवासियों का परम कत्र्तव्य है।


4. चौथा वेद मन्त्र है :-
समानी प्रथा सहवोअन्नभाग समाने योक्त्रे सहवो युनज्मि।
समयञ्चो अग्निं सपर्यतारा नाभिमिवा मित:।
(यजु. 3-30-6)

''हे मनुष्यो! तुम्हारे जल पीने का स्थान एक हो और तुम्हारे अन्न का भाग भी साथ-साथ हो। मैं तुम सबको एक ही जुए में साथ-साथ जोड़ता हूँ। तुम सब मिलाकर ईश्वर की पूजा करो, जैसे पहिए के आरे केन्द्र स्थान में जुड़े रहते हैं, वैसे ही तुम भी अपने समाज में एक दूसरे के साथ मिलकर रहो।''

इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय हमारे द्वारा देश में 'सामाजिक समरसता' की स्थापना करना है। वेद का सभी राष्ट्रवासियों से आग्रह है कि वो देश में सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए अपने-अपने स्थान पर सक्रिय हों। बिना सामाजिक समरसता के कोई भी राष्ट्र उन्नति नही कर सकता। आज हमारी अवन्नति का कारण सामाजिक विषमताऐं हैं। सामाजिक समरसता का देश में नितान्त अभाव है। लोग अपने-अपने स्तर के अनुसार अलग-अलग कॉलोनियां बसाते जा रहे हैं। उनमें एक ही स्तर के लोग रहेंगे। दूसरों के लिए वहां प्रवेश तक निषिद्घ है। खाने-पीने और रहने-सहने के स्थान अलग-अलग हैं। इसलिए 'सामाजिक समरसता' हमारे लिए मृग मरीचिका बन गयी है। वेद कहता है कि सामाजिक समरसता की स्थापना कर समाज में आत्मीय भाव का विकास करो। इसे अपना जीवन व्रत बना लो।

5. पाँचवां वेद मन्त्र है :-
सहृदयं सामनस्यम् विद्वेषं कृणोमि व:।
अन्यो अन्यभाभिह्र्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या।।
(अथर्व. 3-30-1)

''हे मनुष्यो! तुम लोग हृदय के भाव प्रेमपूर्ण, मन में शुभ विचार और परस्पर निर्वैरता अपने मन में स्थिर करो। तुममें से हर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से प्रेमपूर्ण बर्ताव करे जिस प्रकार कि नवजात बछड़े से उसकी गौ माता प्यार करती है।''
'नि:स्वार्थ प्रेमपूर्ण व्यवहार' इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय है। वेद का आदेश है कि उत्तम राष्ट्र सृजन के लिए परस्पर प्रेमपूर्ण व्यवहार को अपने राष्ट्रीय चरित्र का एक आवश्यक अंग बना लो। इस प्रकार के व्यवहार से समस्त राष्ट्रवासी आपस में निर्वैरता और अहिंसा भाव से भर जायेंगे। गाँधीजी देश में लोकप्रिय इसलिए हुए कि उन्होंने नि:स्वार्थ प्रेम, अहिंसा और बन्धुत्व की बातें कीं। यह अलग बात है कि गाँधीजी की इन बातों को देश के एक वर्ग ने नही माना और गाँधी जी लोकप्रिय होकर अपने उद्देश्य में भी असफ ल सिद्घ हुए। क्योंकि एक वर्ग का संकल्प घृणा के आधार पर राष्ट्र का विभाजन कराना बन गया। गाँधीजी किसी एक वर्ग की इस घृणा को प्रेम में परिवत्र्तित नहीं कर पाये। इसलिए राष्ट्र का विभाजन हो गया। ये मंत्र हमें यह बताता है कि सभी राष्ट्रवासियों को परस्पर प्रेमपूर्ण बत्र्ताव करना चाहिए अन्यथा घृणा पाँव पसार लेगी और उसका परिणाम होगा विभाजन और केवल विभाजन।
(लेखक की पुस्तक 'वेद महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान' से)