मूल कत्र्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-3

  • 2016-09-11 07:00:33.0
  • राकेश कुमार आर्य

मूल कत्र्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-3

6. छठा वेद मंत्र है :-
सध्रीची नान्व: संमन सस्कृणोम्येक श्नुष्टीन्त्सं वनेन सर्वान्।
देवा इवामृतं रक्षमाणा: सामं प्रात: सौमनसौ वो अस्तु।।
(अथर्व. 3/30/7)
''हे मनुष्यो! तुम परस्पर सेवा भाव से सबके साथ मिलकर पुरूषार्थ करो। उत्तम ज्ञान प्राप्त करो। समान नेता की आज्ञा में कार्य करने वाले बनो। दृढ़ संकल्प से कार्य में दत्त चित्त हो तथा जिस प्रकार देव अमृत की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी सायं प्रात: अपने मन में शुभ संकल्पों की रक्षा करो।''

यहाँ हम वेद की अनूठी बात देखते हैं। यहाँ वेद कह रहा है कि तुम सब राष्ट्रवासियों का परम पुरूषार्थी हो जाना राष्ट्र का भाग्य (विधान) बदलने के लिए, उसके भाग्य की रेखाओं को अपने ढंग से लिखने के लिए सचेष्ट हो उठना है। वेद मंत्र का अगला भाग एक प्रधान (एक नेता) की बात कह रहा है। जबकि मन्त्र का अन्तिम भाग अपने मन के शुभ संकल्पों को जीवन की पताका बना लेना है। शिव-संकल्प व्यक्ति को उँची उड़ान उड़ाते हैं। इसलिए शुभ संकल्प पताका के ही समान हैं। राष्ट्रवासियों के लिए आवश्यक इस कत्र्तव्य को हमारे वत्र्तमान संविधान ने पूर्ण नही किया है। आज देश में एक नेता का अभाव है। एक पार्टी का नेता (नेहरू, इन्दिरा और राजीव गाँधी तक यह परम्परा रही) कभी इस देश का नेता माना जाता था। कुछ सीमा तक अटल जी ने भी इसे निभाया। पर अब तो जाति, सम्प्रदाय और क्षेत्र के नाम पर नेता बनकर लोग देश का नेता बनने का सपना संजो ही नहीं रहे हैं अपितु उसे हम साकार होता भी देख रहे हैं। परिणामस्वरूप राष्ट्र में सर्वत्र कोलाहल और अशान्ति है।

7. वेद का सातवाँ निर्दिष्ट कत्र्तव्य है :-
सं वो मनांसि सं व्रता समाकूती न मामसि।
अभी ये विव्रता स्थान तान्व: सं नयमामसि।।
(अथर्व. 3/8/5)
अर्थात् हे मनुष्यो! ''तुम अपने मन एक करो। तुम्हारे कर्म एकता के लिए हों, तुम्हारे संकल्प एक हों, जिससे तुम संघ शक्ति से युक्त हो जाओ। जो ये आपस में विरोध करने वाले हैं, उन सबको हम एक विचार से एकत्र हो झुका देते हैं।'' संघ शक्ति के प्रति समर्पण इस वेद मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय है। संघ शक्ति में विश्वास रखने वाला व्यक्ति कभी भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का शत्रु नही हो सकता।

8. आठवाँ मन्त्र है :-
अदार सृद भवतु सोमा स्मिन्यज्ञे मसतो मृअतान:।
मा नो विददभिमा मो अशस्तिमां नो विदद् वृजिना द्वेष्या या।।
(अथर्व. 1/20/1)

''हे सोमदेव! हम सबमें से परस्पर की फू ट हटाने वाला कार्य होता रहे। हे मरूतो! इस यज्ञ में हमें सुखी करो। पराभव या पराजय हमारे पास न आवे। कलंक हमारे पास न आवे और जो द्वेष भाव बढ़ाने वाले कुटिल कृत्य हैं, वे भी हमारे पास न आयें।''
इस मन्त्र का प्रतिपाद्य विषय ''हमारे मध्य पारस्परिक फू ट का नितान्त अभाव'' हो जाना है। पारस्परिक फू ट का नितान्त अभाव मनों की एकता से आता है। मानसिक धरातल पर उपजने और विकसित होने वाले विचार जब सर्वमंगल कामना से अभिभूत हो उठें तो उस समय यह मानना चाहिए कि वास्तव में पारस्परिक फू ट को विदा करने के लिए हम तत्पर हैं। यही वह अवस्था है जब दूसरे की पीड़ा को हम अपनी पीड़ा मानकर उसे दूर करने के लिए सक्रिय हो उठते हैं। जब मानसिक धरातल पर हम एक होने के विचारों से अभिभूत होंगे तो हमारे कर्म तो स्वयं ही एकता के लिए समर्पित हो जायेंगे। इसका अभिप्राय होगा कि हम राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की शत्रु शक्तियों को भी पहचानने लगेंगे और उनके हाथ की कठपुतली बनकर यहाँ पुन: 'राष्ट्रघाती' खेलों की परम्परा को चालू नही करेंगे।
(लेखक की पुस्तक 'वेद महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान' से)

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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