मूल कत्र्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-4

  • 2016-09-13 04:00:33.0
  • राकेश कुमार आर्य

मूल कत्र्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन, भाग-4

9. वेद का नवाँ मन्त्र है :-
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा।
सम्यमच: सव्रता भूत्वा वाचं वदति भद्रया।।
(अथर्व. 3/30/3)
''भाई भाई से द्वेष न करें, बहन बहन से द्वेष न करें। एक विचार वाले होकर और एक कर्म वाले होकर हम सब आपस में बातचीत एवम् व्यवहार करें।''
इस वेद मन्त्र की शिक्षा है कि यदि राष्ट्र में वास्तव में शान्ति स्थापित करना चाहते हो तो परस्पर द्वेषभाव की नीति को त्याग दो। परस्पर द्वेषभाव का सर्वथा अभाव कर लेना हमारा एक परम पावन कत्र्तव्य बन जाये, धर्म बन जाये। प्राचीन काल में रावण ने अहंकारवश अपने भाई विभीषण से द्वेष किया और उसे अपने राज्य से निकालकर बाहर कर दिया। विभीषण श्रीराम से जाकर मिला और परिणाम हुआ कि रावण का साम्राज्य ही समाप्त हो गया। इसी प्रकार दुर्योधन ने द्वेष भाव के कारण ही अपने भाईयों युधिष्ठर आदि को अपना भाई कभी नही माना। फ ल क्या हुआ सभी जानते हैं। इसलिए वेद ने सभी राष्ट्रवासियों के लिए मूल कत्र्तव्य प्रतिपादित किया कि परस्पर द्वेष भाव नहीं रखना है। ऐसी किसी भी सम्भावना को अपने पास फ टकने तक नही देना है जिससे कि परस्पर द्वेष भाव बढ़े।

10. वेद का दसवाँ मंत्र जो हमें अपने किसी मूल कत्र्तव्य का स्मरण
कराता है, वो ये है :-
दत्ते दहं मा मित्रास्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रास्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रास्य चक्षुषा समीक्षामहे।
(यजु. 36/18)
''सब व्यक्ति मुझे मित्र की दृष्टि से देखें। मैं भी सभी व्यक्तियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ। सभी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखा करें। हे दृढ़ता के देव प्रभो! इस प्रसंग में आप हमें दृढ़ता दीजिए।''
यह वेद मंत्र परस्पर मित्रतापूर्ण व्यवहार को लोक व्यवहार की मान्यता दिलाने के लिए प्रयत्नशील समाज का चित्रण कर रहा है। हमारी प्रार्थना भी ऐसी होनी चाहिए कि जिससे व्यक्ति व्यक्ति के मध्य ही नही अपितु प्राणिमात्र के मध्य भी-ऐसा ही लोकव्यवहार निष्पादित हो। इससे सभी प्राणियों के जीवन का सम्मान करना हमारा स्वभाव बन जायेगा। जिससे पर्यावरण सन्तुलन नही बिगड़ेगा। क्योंकि आज हमारे हृदयों में जीवों के प्रति दयाभाव का समाप्त होना ही पर्यावरण और प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाडऩे में सबसे अधिक भूमिका निभा रहा है।

संविधान और वेद के ये मन्त्र
हमारे संविधान के द्वारा जो मूल कत्र्तव्य हमारे लिए रखे गये है उनमें इतनी गम्भीरता नही झलकती जितनी इन वेद मंत्रों में निष्पादित मूल कत्र्तव्यों की भाषा में है। महर्षि दयानन्द की आस्था तो वेदों में अथाह थी, परन्तु संविधान निर्माताओं या बाद में अभी तक आयी सरकारों की उतनी आस्था वेदों में नही रही जितनी आस्था की अपेक्षा की जाती थी। यही कारण रहा कि देश के स्वातन्त्रय आन्दोलन पर अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की अमिट छाप छोडऩे वाले महर्षि दयानन्द के चिन्तन से प्रभावित लोग संविधान सभा में रहकर भी वेदों के गंभीर विद्यार्थी ना होने के कारण उतनी गहराई से चीजों को खोजकर लाने में असफ ल रहे, जितनी उनसे अपेक्षा की जाती थी। इसलिए बहुत से अनुच्छेद संविधान में या तो 'शो-पीस' बनकर रह गये या उन संवैधानिक अनुच्छेदों की मूल भावना के अनुकूल यहाँ कार्य नही किया गया।

वेद की भाषा की अपेक्षा कम गम्भीर होकर भी संविधान में डाले गये मूल कत्र्तव्यों का बहुत महत्व है। ये हमारे धर्म का और राष्ट्रीय चरित्रा का निर्धारण करते हैं। इसलिए होना ये चाहिए कि वेद जिस प्रकार अपने मंत्रों को प्रार्थना के साथ जोड़ता है, कत्र्तव्य कर्म की पूर्ति के लिए सर्व समाज को स्फ ूर्तिमान बनाने का प्रयास करता है, वह प्रयास संविधान का यह अनुच्छेद भी करे। परंतु दुर्भाग्यवश यह अनुच्छेद 51 (क) ऐसा नहीं करता। इसलिए ये मूल कत्र्तव्य संविधान के 'शो पीस' बनकर रह गये हैं। इसके अतिरिक्त वेद ने अपने कत्र्तव्यों को एक ईकाई से अर्थात् व्यक्ति से आरम्भ किया है और उसे वह राष्ट्र तक ले गया है। वेद पहले व्यष्टि को सुधारना चाहता है, फि र समष्टि की ओर य मूल कत्र्तव्य और वेद का राष्ट्र संगठन/49 50/वेद, महर्षि दयानन्द और भारतीय संविधान चलता है। संविधान का यह अनुच्छेद व्यष्टि से समष्टि की बात तो करता है, परन्तु व्यष्टि के द्वारा खड़े किये गये कृत्रिम विभाजनों भाषा, सम्प्रदाय, क्षेत्र, जाति आदि को समाप्त करने का ठोस उपाय नही दे पाया है, इसलिए इस संवैधानिक अनुच्छेद के माध्यम से देश में समष्टिवादी मानस के निर्माण की ओर विशेष कदम नही उठाये जा सके हैं। मूल रूप से भारतीय संस्कृति समष्टिवादी है, परन्तु यहां हम देख रहे हैं कि अब देश में व्यष्टिवाद बढ़ता जा रहा है।
वेद हमारे कर्म को धर्म के साथ जोड़ देना चाहता है। जबकि यह संवैधानिक अनुच्छेद कर्म से धर्म को अलग करके चलता है। हमने वेद और महर्षि के चिन्तन को इन कत्र्तव्यों में यथावत स्थान नही दिया और ना ही अपने वेदों के अनुकूल इनमें कर्म और धर्म का उचित समन्वय स्थापित किया।

वैदिक कालीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था और उसमें नागरिकों के कत्र्तव्य कर्म की चर्चा करते हुए लाला लाजपतराय अपनी पुस्तक 'युग प्रवर्तक: स्वामी दयानन्द' में लिखते हैं :-
''सचमुच उस समय का भारत स्वर्गोपम था। यह धरा कर्म भूमि के साथ-साथ धर्मभूमि भी थी। प्रत्येक मनुष्य-माता-पिता पुत्र या पुत्री, पति या पत्नी, राजा और प्रजा, गुरू और शिष्य सभी अपने कत्र्तव्यों को जानते थे और उन पर आचरण भी करते थे। सारे देश में आर्यों का राज्य था।----सभी वर्णों के लोग स्व स्व कत्र्तव्यों के पालन में लगे थे।''

वेद कत्र्तव्यों की जानकारी और उनको आचरण में लाने का प्रबल पक्षधर है। आचरणहीन व्यक्ति को वैदिक समाज हेय दृष्टि से देखता था। जबकि हमारे आज के संविधान ने मूल कत्र्तव्यों को किसी के द्वारा आचरण में न लाने पर उसे हेय दृष्टि से देखने या ऐसे ही किसी अन्य उपाय की चर्चा नही की है। जिससे इन कत्र्तव्यों को लोगों ने अपने लिए अनिवार्य नहीं माना है।
(लेखक की पुस्तक 'वेद महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान' से)

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राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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