मदर से संत बनीं टेरेसा

  • 2016-09-06 03:30:20.0
  • राकेश कुमार आर्य

मदर से संत बनीं टेरेसा

संसार में सत्य क्या है और क्या नही? इसका निर्धारण अभी तक नही हो पा रहा है-जो कुछ हमें अपनी आंखों से दिखता है या हमें दिखाया जाता है-कितनी ही बार हम उसे सत्य मान लेते हैं पर वास्तव में वह सत्य होता नही है। इतिहास के कई पृष्ठ भर लेने के पश्चात हमारे सामने जब पूर्ववत्र्ती घटनाओं के परिणाम आते हैं तो हमें पता चलता है कि जिसे हम सच मान रहे थे-वास्तव में तो वह निरा झूठ था, छल था, फरेब था और धोखा था। संसार के छली-कपटी, धोखेबाज एवं पाखण्डी लोग संसार के साधारण पुरूषों के लिए छल, कपट, और पाखण्ड की सर्वत्र हर कदम पर आकर्षक मण्डी सजाए बैठे रहते हैं और उसमें फंसाकर लोगों के जीवन का सत्यानाश कर देते हैं।


आप निष्पक्ष होकर आंकलन करें तनिक उन लोगों का जो धर्मांतरण के राष्ट्रघाती खेल में लोग रहते हैं, इनका ये खेल सदियों से चल रहा है। निर्धन वर्ग के लोगों को ये लोग धन के लालच में अपने जाल में फंसाते हैं, और धीरे-धीरे उन्हें धर्मांतरण के लिए तैयार कर लेते हैं। निर्धनता एक ऐसा अभिशाप है जिससे दुखी होकर व्यक्ति कोई भी गलत कार्य कर बैठता है, यहां तक कि अपनी आस्था और विश्वास का सौदा भी कर बैठता है। पर दुख की बात यह है कि आस्था और विश्वास बेचकर भी लोग निर्धन के निर्धन रह जाते हैं। पता नही हम इस ओर क्यों नही सोचते?

अभी हाल ही में मदर टेरेसा को मदर से संत बनाया गया है। जिससे मदर अब ईश्वर का अंश हो गयी हैं और अब वह भक्त और भगवान के बीच में एक मध्यस्थ की भूमिका का निर्वाह करेंगी। यदि मदर टेरेसा के जीवन को उनके प्रशंसकों की दृष्टि से देखें तो वह परम करूणामयी और गरीबों की मां थीं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गरीबों की सेवा और कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था। साथ ही उनको यदि उनके आलोचकों की दृष्टि से देखें तो जैसा कि तसलीमा नसरीन कहती हैं कि मदर टेरेसा का जीवन पूर्णत: पाखण्ड पर आधारित था, उन्होंने गरीबों की सेवा के नाम पर अपने लिए साधन बनाये और गरीबों के जीवन को और भी नारकीय बना गयीं।

तसलीमा नसरीन का यह बयान कि मदर टेरेसा का जीवन पाखण्ड पर आधारित था, सचमुच विवेचनीय है। इसलिए इस पर यहां थोड़ा सा विचार करना अपेक्षित है। प्रश्न है कि मदर टेरेसा की करूणा किन लोगों के लिए थी? उत्तर है कि जो लोग ईसाई बनने को तैयार हो जाते थे-यह मदर के जीवन का एक कठोर सच था। उनकी करूणा में वैश्विक मानवता का भाव नही था। यह दुख के साथ कहना पड़ता है कि वे हर निर्धन के लिए ममतामयी मां या करूणामयी मदर नही थीं। उनकी करूणा पाने के लिए आपको ईसाई बनना आवश्यक था। वास्तविक करूणा कभी भी किसी की आस्था या विश्वास का सौदा नही करती है, और ना ही किसी की आस्था या विश्वास को ठेस पहुंचाती है। पर मदर टेरेसा भारत में लोगोंकी आस्था या विश्वास का सौदा करती रहीं और धड़ाधड़ ईसाईयत का प्रचार-प्रसार कर लोगों को ईसाई बनाती गयीं। आज हम उनके कुत्सित प्रयासों का परिणाम देख रहे हैं कि संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत में ईसाइयत की बहुलता हो गयी है। हमारे ही लोगों को हमारे ही विरूद्घ हथियार उठाने के लिए तैयार कर दिया गया है जो हमारे ही विरूद्घ अलगाववाद की बातें करने लगे हैं। कहने का अभिप्राय है कि एक मदर की करूणा भारत मां के लिए खून के आंसू देने का सबब बन गयी है। पर फिर भी कुछ लोगों को इस देश में अलगाववाद का बीज बोकर जाने वाली एक महिला को मदर से संत बनाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे रहा है-अपेक्षाकृत उसी समय मां भारती के आंसुओं की ओर ध्यान देने के।
यदि मदर टेरेसा वास्तव में गरीबों की सेवा करके प्रसन्न होती थीं तो क्या वह गरीब लोगों की सेवा उनका बिना धर्मांतरण कराये नही कर सकती थीं? यदि वह ऐसा करतीं तो उनका यह कार्य ही मानवता की सेवा कहलाता। पर वह ऐसा कर नही सकती थीं। क्योंकि वे जिन लोगों का मोहरा थीं उन्हें उनसे भारत की सरकार की आंखों में धूल झोंककर लोगों का धर्मांतरण कराना था। जिसके लिए उन्हें पीछे से मोटी धनराशि मिलनी थी। इस मोटी धनराशि ने मदर को इतिहास में नाम कराने का अवसर प्रदान किया और मदर ने 'देवी' का रूप धारण कर हाथ में गंडासा ले लिया-मां भारती का खून करने के लिए। यदि वह ऐसा नही करतीं तो उन्हें पीछे से कोई धनराशि नही मिलनी थी। मदर टेरेसा के आलोचकों का यह भी कथन है कि उनके आश्रम में गरीब और अपंग लोगों को प्रदर्शन के लिए भरा जाता था, जिससे उनके नाम पर उन्हें चंदा मिल सके।

अंत में समाज के गरीब लोगों के लिए एक सवाल कि संसार में धर्मांतरण का खेल खेलने वाली संस्थाएं धर्मांतरण की प्रक्रिया को अपनाते समय जिस धन का लालच देती हैं, क्या उससे निर्धन लोगों का भला हो पाया है, या उनकी गरीबी दूर हो गयी है? नही, और हमारा मानना है कि ऐसे गरीबी दूर होगी भी नही। इस्लाम की स्थिति देख लीजिए-इसने भी गरीब लोगों का धर्मांतरण धन का लालच देकर कराया, उस समय उन गरीबों को लगा कि मुसलमान बनते ही तुम गरीब नही रहोगे-पर विश्व में सबसे अधिक गरीब इस्लाम के पास हैं। आप याद रखें कि तुम्हारा धर्मांतरण कराने वाली एक महिला तो मदर से संत हो सकती है पर तुम्हारी गरीबी का अंत नही हो सकता। फिर आस्था का सौदा क्यों करते हो?

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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