मनु की विदेश नीति

  • 2016-09-21 05:30:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की विदेश नीति

हमारे देश का 1947 में संप्रदाय के आधार पर विभाजन हुआ तो पाकिस्तान नाम का एक नया राज्य अस्तित्व में आया। इस देश ने अपने जन्मकाल से ही भारत को अपना शत्रु माना और वैसा ही व्यवहार भी किया है। हाल ही में उरी सेक्टर में जो कुछ हुआ है वह पाकिस्तान के इसी पारंपरिक शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण का ही परिणाम है। परंतु इसके उपरांत भी भारत की सरकारें इस शत्रु देश को अपना मित्र मानती रही हैं। विदेश नीति और कूटनीति में यह भारत की असफलता की नीति रही है। यही कारण है कि पाक पोषित आतंकवाद से जूझते भारत के पास इस बात के पर्याप्त प्रमाण होते हुए भी कि भारत की प्रत्येक आतंकी घटना के पीछे पाकिस्तान का हाथ है भारत पाकिस्तान को 'विशेष प्राथमिकता' वाले देश के रूप में मान्यता देता आया है।

इस क्षेत्र में मनु की विदेशनीति आज की राज्य-व्यवस्था का मार्गदर्शन कर सकती है। उनकी विदेशनीति बहुत ही व्यावहारिक और उचित है। वह कहते हैं :-
अनंतमरिं विद्यादरिसेविनमेव च।
अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनम् तयो: परम।।
।। 58।। (123)
अर्थात ''अपने राज्य के समीपवर्ती राजा को और शत्रु राजा की सेवा सहायता करने वाले राजा को शत्रु ही समझे, अरि से भिन्न अर्थात शत्रु से विपरीत आचरण करने वाले अर्थात सेवा सहायता करने वाले राजा को और शत्रु राजा की सीमा से लगे अगले राजा को मित्र और इन दोनों से भिन्न परवर्ती राजा को जो न सहायता करे न विरोध करे, उसे उदासीन (तटस्थ-न्यूट्रल) राजा समझना चाहिए।''
इस व्यावहारिक नीति के अनुसार पाकिस्तान का पड़ोसी अफगानिस्तान हमारे लिए किसी सीमा तक ठीक हो सकता है, जैसा उसे अब किया भी गया है। उससे आगे ईरान हमारा तटस्थ या उदासीन देश कहा जाएगा। माना जा सकता है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान तीनों ही इस्लामिक देश हैं-इसलिए तीनों को अपने लिए 'शत्रु' माना जाए। पर विदेशनीति में संप्रदाय बहुत कुछ सीमा तक पीछे रह जाता है। यदि ऐसा न होता तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंध पाकिस्तान और चीन से भी कहीं अधिक मिठास भरे होते और ये तीनों मिलकर एक संघ बना सकते थे-पर ऐसा नही हुआ। इसका अभिप्राय है कि विदेशनीति में संप्रदाय से अलग भी कुछ तत्व होते हैं जो उसका उचित निर्धारण करते हैं। चीन की पाकिस्तान के साथ मित्रता को लिया जा सकता है। चीन और पाकिस्तान की मित्रता केवल इसलिए है कि ये दोनों ही भारत के सीमावर्ती देश हैं, जिस कारण ये भारत के शत्रु हैं। विदेशनीति का यह भी एक सिद्घांत है कि शत्रु और शत्रु मिलकर मित्र हो जाते हैं। यदि इन दोनों की लंबी सीमाएं मिली होतीं तो चीन पाकिस्तान को तिब्बत की भांति कब का हड़प गया होता। अब भी उसने पाकिस्तान अधिकृत का कश्मीर का कुछ हिस्सा लेकर पाकिस्तान से भारत के विरूद्घ अपनी मित्रता की बहुत बड़ी धनराशि ले ली है।
शत्रु के विरूद्घ शक्ति प्रयोग उचित
शत्रु पाक का उद्देश्य सदा ही हमारी सीमाओं के साथ छेड़छाड़ करना, हमारी संप्रभुता और अखण्डता को नष्ट करना, या नष्ट करने की योजनाएं बनाना होता है। उसकी ऐसी गतिविधियों पर या उसके ऐसे किसी भी दुस्साहस पर जिससे हमारी क्षेत्रीय अखण्डता को कोई खतरा उत्पन्न हो या किसी भी प्रकार से हमारी संप्रभुता खतरे में पड़े तो उसके विरूद्घ हमें कोई भी कठोर कार्रवाई (जिससे सैन्य शक्ति का प्रयोग भी सम्मिलित है) करने का पूर्ण अधिकार होगा। इसके लिए मनु महाराज अगले श्लोक में ही राजा को या देश की सरकार को अधिकृत करते हैं कि अपने शत्रु देश से निपटने के लिए देश की सरकार साम, दाम, दण्ड और भेद में से किसी एक का या सबका एक साथ जैसा उचित समझे प्रयोग करके शत्रु को वश में रखें। सफल 'राजा' या राष्ट्रनायक वही होता है जो अपने शत्रु देश को उसकी भीतरी समस्याओं में उलझाये रखे। ऐसे में पाकिस्तान जैसे शत्रु देश को उसके ही जाल में उलझाये रखना भारत की विदेश नीति की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि शत्रु हमसे प्रबल है तो ऐसे शत्रु का सामना करने से बचकर देश, काल परिस्थिति के अनुसार उससे संधि कर लेना ही उचित है। इस कार्य के लिए यदि किसी अन्य देश का साथ भी लेना पड़े तो लिया जा सकता है। यदि ऐसा प्रबल पड़ोसी फिर भी हमारे अनुकूल ना हो तो उस स्थिति में ऐसे शत्रु राष्ट्र के विरूद्घ किसी अन्य देश से मिलकर उस पर आक्रमण करना चाहिए। आशा की जाती है कि देश का वर्तमान नेतृत्व कूटनीति के इसी विकल्प पर विचार कर पाकिस्तान को अक्ल सिखाएगा।