मनु और न्यायपूर्ण राजाज्ञा, भाग-3

  • 2016-08-28 12:45:08.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और न्यायपूर्ण राजाज्ञा, भाग-3

कुछ लोगों का तर्क होता है कि राजनीतिज्ञों को कुछ मामलों में विशेषाधिकार इसलिए दिये जाते हैं कि उनके सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग उनसे ईष्र्या-द्वेष पाल लेते हैं, जो उनके राजनीतिक जीवन को समाप्त करने के लिए फिर उन्हें अनर्थक मुकद्देबाजी में ही उलझाये रखेंगे। इस बात में बल हो सकता है, पर यदि ऐसा होता है तो यह क्यों होता है कि राजनीतिज्ञ का राजनीतिज्ञ ही शत्रु होता है और वह अपने प्रतिद्वंद्वी को झूठे मुकदमों में फंसा सकता है

? इस समस्या का समाधान यह है कि जो लोग अपने विरोधी को इस प्रकार झूठे आरोपों में फंसाते मिलें, उन्हें राजनीतिज्ञ न मानकर अपराधी माना जाए और यदि उनकी ओर से किसी अपने विरोधी के विरूद्घ झूठा मुकदमा लिखाया जाता है तो उस मुकदमे का सच सामने आने पर बिना किसी प्रक्रिया को अपनाये ऐसा झूठा मुकदमा लिखाने वाले व्यक्ति के विरूद्घ कठोर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। साथ ही झूठे मुकदमे ना लिखे जाएं इसके लिए भी विशेष प्रबंध किये जाएं। वैसे यदि ऐसे झूठे मुकदमे लिखे जाते हैं तो ऐसा करने वालों को प्रारंभ से ही अपराधी की भांति समझा जाए। कानून के समक्ष सबको समान समझने की आवश्यकता को बड़ी सुंदरता से मनु महाराज प्रकट करते हुए लिखते हैं :-
''देश , समय, शक्ति और विद्या अर्थात अपराध के अनुसार उचित दण्ड का ज्ञान, इन बातों को भली प्रकार ठीक-ठीक विचार कर अन्याय का आचरण करने वाले लोगों में उस दण्ड को यथायोग्य रूप में प्रयुक्त करे।
'' मनुजी की यह व्यवस्था समान कानून और कानून के समक्ष समानता दोनों को ही स्पष्ट करने वाली है। अगले श्लोक में इसे वह और भी स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-''जो दण्ड है, वही पुरूष राजा, वही न्याय का प्रचारकत्र्ता और सबका शासनकत्र्ता, वही चार वर्ण और चार आश्रमों के धर्म का प्रतिभू अर्थात जामिन है।''

लोकतंत्र के अनुकूल यही विधि व्यवस्था है कि 'दण्ड'

के डर से संसार को चोट पहुंचाने का साहस किसी को भी ना हो। 'कानून समान और दण्ड समान' हमें ऐसी व्यवस्था करनी होगी।

दण्ड विधान ही शासन करता है

मनु महाराज का मानना है कि ''वास्तव में दण्ड अर्थात दण्ड विधान ही सब प्रजाओं पर शासन रखता है, दण्ड ही प्रजाओं की सब ओर से रक्षा करता है, सोती हुई प्रजाओं में दण्ड ही जागता रहता है, अर्थात प्रमाद और एकांत में होने वाले अपराधों के समय दण्ड का ध्यान ही उन्हें भयभीत करके उन्हें अपराध करने से रोकता है

, दण्ड का भय एक ऐसा भय है जो सोते हुए भी बना रहता है, इसीलिए बुद्घिमान लोग दण्ड विधान को राजा का प्रमुख धर्म मानते हैं।''

राजा की न्यायपूर्ण विधि जब पक्षपात शून्य बर्ताव करती है तो वही सारी प्रजा में शासन और अनुशासन बनाये रखने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। विधि ऐसी होनी चाहिए जो प्रजा में शासन के माध्यम से अनुशासन स्थापित करे और जिसे लोग स्वाभाविक रूप से (अर्थात किसी भय के कारण नही) मानने वाले हों। जिस विधि को लोग राजा के भय के कारण मानते हैं। वह विधि लोगों में अनुशासन उत्पन्न न करके राजा के विरूद्घ विद्रोह उत्पन्न कराती है। तानाशाहों के विरूद्घ विद्रोह इसीलिए होते हैं कि उनके कानून को जनता स्वाभाविक रूप से नही मानती है। उनके कानून में पक्षपात और अन्याय होता है

, जिसके कारण समाज में अशांति व्याप्त रहती है। लोग ऐसे तानाशाह के शासन और कानून को अपनी स्वतंत्रता में बाधक मानते हैं। फलस्वरूप समाज में अनुशासनहीनता फैल जाती है। संसार के ज्ञात इतिहास में जितनी भर भी क्रांतियां हुई हैं उन सबके मूल में
'कठोर कानून' का अस्तित्व एक महत्वपूर्ण कारण रहा है।

मनु जिस दण्ड विधान की बात कर रहे हैं-वह बड़ा सरल है और साथ ही बड़ा कठोर भी। सरल तो वह इसलिए है कि लोग उसे सहज रूप में अपनाने के अभ्यासी हो जाते हैं। उसे वे अपने हित में और समाज में शांति-व्यवस्था स्थापित किये रखने हेतु मानने और मनवाने के अभ्यासी होते हैं। ऐसी स्थिति में राजा के कानून और प्रजा में कोई टकराव या विरोधाभास नही होता। दोनों एक दूसरे के लिए सहयोगी दृष्टिकोण अपनाते हैं। यह कानून कठोर इसलिए होता है कि इसके बने रहने से दुष्ट

और आततायी लोग अपने आपको संकट में घिरा अनुभव करते हैं। इसलिए मनु महाराज ने बड़ी सरलता से कह दिया है कि दण्ड विधान ही सब प्रजाओं पर शासन करता है और चूंकि दण्ड विधान के विद्यमान रहने से दुष्ट
और आततायी लोगों को कष्ट अनुभव होता है अर्थात वे अपराध करने का साहस नही कर पाते हैं तो मनु का यह कथन भी पूर्णत: सत्य ही प्रतीत होता है कि दण्ड ही प्रजाओं की सब ओर से रक्षा करता है। प्रजा आराम से सोये और दण्ड जागता रहे-यही कानून का राज होता है। आज के समाज में विधि शास्त्रियों ने 'कानून का राज' होने का ढिंढ़़ोरा तो बहुत पीटा है पर इन्हें यह नही पता कि
'कानून का राज' कहते किसे हैं? कानून बना देने का नाम 'कानून का राज' स्थापित कर देना नही है। कानून के राज का अभिप्राय तो यही है कि जनता आराम से सोये और कानून जागता रहे। कानून के जागते रहने का अभिप्राय है-कार्यपालिका का अपने कत्र्तव्य के प्रति समर्पित होना। जो लोग कानून को लागू करते हैं-वे अपने कत्र्तव्य को जानने समझने वाले हों। ऐसा दण्ड विधान करना राजा का प्रमुख धर्म है।

हमारा राजा स्वेच्छाचारी नही हो सकता

जो राजा ऐसी न्यायप्रिय विधि का निर्माण करता है वह कभी भी स्वेच्छाचारी या तानाशाह नही हो सकता, यही कारण है कि भारत में स्वेच्छाचारी और तानाशाह प्रवृत्ति के शासकों का कभी शासन नही रहा। ऐसा हम भारत के हिन्दू राजाओं के लिए कह रहे हैं। यहां 'कंस' को सत्ताच्युत करने का अधिकार जनता को इसीलिए है कि वह क्रूर तानाशाह बन गया था। इसके विपरीत विदेशों में एक से बढक़र एक क्रूर तानाशाहों के होने के प्रमाण मिलते हैं। विदेशों में राजा के विरूद्घ जनता इसीलिए विद्रोही हुई कि वे राजा न्यायप्रिय और लोकप्रिय न रह गये थे। भारत में मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों के साथ-साथ अंग्रेजों के विरूद्घ भारत की जनता इसलिए विद्रोही हुई कि ये शासक लोग भी न्यायप्रिय और लोकप्रिय नही रह गये थे। इनकी विधि अन्यायपरक और पक्षपाती हो गयी थी। इस प्रकार मनु इस श्लोक में बहुत बड़ी बात कह गये हैं कि विधि को इतना भय बनाकर रखना चाहिए कि दुष्ट

लोग अपराध करने का साहस ही न कर सकें। महर्षि दयानंद इस श्लोक की व्याख्या करते हुए सत्यार्थप्रकाश में कहते हैं-''वही दण्ड प्रजा का शासनकर्ता सब प्रजा का रक्षक है। सोते हुए प्रजास्थजनों में जागता है, इसीलिए बुद्घिमान लोग दण्ड को ही धर्म कहते हैं।'' (स.प्र.14) और जैसा विद्वान लोग दण्ड ही को धर्म जानते हैं वैसा सब लोग जानें। क्योंकि दण्ड ही प्रजा का शासन अर्थात नियम में रखने वाला
, दण्ड ही सबका सब ओर से रक्षक और दण्ड ही सोते हुओं में जागता है। चोरादि दुष्ट भी दण्ड ही के भय से पाप कर्म नही करते। (सं.विधि.152)''जो दण्ड (धर्म) अच्छे प्रकार विचार से धारण किया जाए तो वह सब प्रजा को आनंदित कर देता है और जो बिना विचारे चलाया जाए तो सब ओर से राजा का विनाश कर देता है।'' (स.प्र.141)

बिना दण्ड के अनर्थ हो जाता है : जिस समाज में दण्ड व्यवस्था शिथिल हो जाती है अथवा न्यायापालिका के न्यायाधीश घूस लेकर न्याय करने के अभ्यासी हो जाते हैं

, वहां न्याय के प्रति लोगों की आस्था समाप्त हो जाती है और लोग कई बार स्वयं ही न्याय लेने के लिए अपने विरोधी की हत्या कर बैठते हैं, इससे सभी वर्णों में दोष फैल जाते हैं। समाज की शांति व्यवस्था भंग हो जाती है। महर्षि दयानंद जी महाराज सत्याथप्रकाश (141) में कहते हैं-''बिना दण्ड के सब वर्ण दूषित और सब मर्यादाएं छिन्न-भिन्न हो जाएं दण्ड के यथापतन होने से सब लेागों का प्रकोप हो जाए।
'' इसी प्रसंग में महर्षि दयानंद आगे लिखते हैं-''जहां कृष्ण वर्ण, रक्तनेत्र भयंकर पुरूष के समान पापों का नाश करने हारा, दण्ड विचरता है, वहां प्रजामोह को प्राप्त न होके आनंदित होती है, परंतु जो दण्ड का चलाने वाला पक्षपातरहित विद्वान हो तो। महर्षि दयानंद जी महाराज ने उक्त कथन मनुजी की मनुस्मृति के श्लोकों की व्याख्या में ही कहे हैं। जिनके अनुशीलन के पश्चात कहा जा सकता है कि राजा का न्यायपूर्ण होना आवश्यक है। हमारे अपने संविधान में
'राजा' के लिए ऐसा कोई प्राविधान नही है, जो उसे न्यायपूर्ण होना अनिवार्य घोषित करे। 'राजा' से यह अपेक्षा क्यों समाप्त की गयी, और क्या हर 'राजा' को हमें दंडित करने का अधिकार हो सकता है? ये प्रश्न किये तो जा सकते हैं-पर लगता नही कि कहीं से हमें कोई उत्तर मिल जाएगा।

Tags:    मनु