मनु और वत्र्तमान राजनीति की विश्वसनीयता, भाग-5

  • 2016-08-25 07:00:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वत्र्तमान राजनीति की विश्वसनीयता, भाग-5

महर्षि मनु ने वेद को अपना आधार बनाया

महर्षि मनु वेद धर्म को अपना आदर्श मानते थे। उन्होंने राजा के उपरोक्त आठ गुणों की व्यवस्था करने में भी ऋग्वेद (मं.10-167-3) को अपना आधार बनाया है। जिसमें कहा गया है कि राजा=अग्नि, सोम=चंद्रमा, वरूणस्य=जल के धर्म में, तथा बृहस्पति=सूर्य, अनुमत्या=लक्ष्मी अर्थात वित्तेश या धरा के आश्रय में और हे इन्द्र! हे वायु! हे यम! मैंने तुम्हारी उपस्तुति=सान्निध्य में रहकर

, तुम्हारे गुणों का धारण करके ऐश्वर्य कलशों अर्थात राज्यैश्वर्यों का सेवन किया है। अभिप्राय यह है कि इन गुणों के अंशों को धारण करके तदनुसार आचरण से राज्य संचालन में सफलता प्राप्त की है।

लोक कल्याण राज्योत्पत्ति का मूलकारण

राजा के उपरोक्त 8 गुणों के निरूपण से एक बात पुन: सिद्घ होती है कि भारतीय ऋषियों ने लोककल्याण के लिए राज्योत्पत्ति की आवश्यकता अनुभव की। उनका चिंतन देखिये कि 'राजा

' पद के निर्माण के लिए उन्होंने प्रकृति की उन दिव्य शक्तियों को पहचाना और उन्हें पहचानकर अपने लिए आदर्श माना जो लोककल्याण के लिए कार्य कर रही है। जैसा जिसका आदर्श होता है वैसा ही उसका अभीष्ट होता है। हमारे राजा का आदर्श यदि लोककल्याणकारी शक्तियों से प्रेरणा लेना था तो उसका अभीष्ट भी लोककल्याण ही बनाया गया। जबकि पश्चिम के चिंतन से यह तथ्य पूर्णत: अनुपस्थित है। वह अभी तक भी यह निर्धारित नही कर पाये हैं कि राज्य की उत्पत्ति का वास्तविक कारण क्या रहा होगा
? उनका यह भी मानना है कि प्राचीनकाल में जब कुछ शक्तिशाली लोगों ने अपना समूह बनाया तो निर्बलों पर वह शासन करने लगे। इसको इन लोगों ने राज्योत्पत्ति का शक्ति सिद्घांत कहा है। इस प्रकार के चिंतन से स्पष्ट होता है कि इन लोगों ने राज्योत्पत्ति का शुभारंभ ही उत्पीडऩ, अत्याचार, दलन, शोषण और दमन से किया है। यही कारण है कि उनका राज्य आज तक लोक कल्याणकारी नही हो सका है। इसके विपरीत हमारे राज्य की उत्पत्ति का आधार लोककल्याण है। हमने प्रकृति की शक्तियों को दूसरों के कल्याणार्थ यज्ञ करते देखा और यज्ञमयी सृष्टि
के कल्याणार्थ यज्ञमयी राज्यव्यवस्था की स्थापना पर बल दिया, जबकि पश्चिम के मनीषियों ने प्रकृति में सर्वत्र 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली कहावत को चरितार्थ होते देखा, इसलिए उन्होंने राज्य को भी शक्तिशाली और तानाशाही लोगों के मस्तिष्क की उपज माना।

वास्तव में यह दृष्टिकोण का अंतर है। प्रकृति में नकारात्मक शक्तियां भी हैं और सकारात्मक शक्तियां भी हैं, अब यह आपके ऊपर है कि आप इनमें से कौन सी शक्ति का अनुकरण करते हैं। राज्यसंस्था कोई ऐसा मंच नही है जो लोगों का उत्पीडऩ करने के लिए कुछ लोगों ने बना लिया हो। इसके सर्वथा विपरीत वह कुछ ऐसे लोगों का मंच है जो स्वेच्छा से समाज और राष्ट्र की सेवा करना चाहते हैं और अपनी शक्ति का सदुपयोग राष्ट्र के लिए या समाज के कल्याण के लिए करना चाहते हैं।

हमारे राजा को दिव्य बने रहना चाहिए। यह स्पष्ट है कि राजा 'दिव्य' तभी बनेगा जब वह दिव्य शक्तियों का अनुकरण करेगा और दिव्य शक्तियां सदा लोककल्याण के यज्ञ में रत रहती हैं। अत: यज्ञमयी जीवन राजा को दिव्य बनाता है। भारत में राजा के दैवीय स्वरूप की जो परिकल्पना की गयी है उसका आधार यही चिंतन है। पश्चिम के राजनीतिक चिंतकों ने राज्योत्पत्ति के दैवीय सिद्घांत की जो परिकल्पना प्रस्तुत की है वह सर्वथा त्याज्य है। उस परिकल्पना से तानाशाही बढ़ती है और राजा अपने आपको स्वेच्छाचारी बना लेता है। वह अपने आपको हर प्रकार के कानून या विधि विधान से ऊपर मानता है। राजा के विषय में पश्चिम के संविधान निर्माताओं का यह चिंतन आज भी स्पष्ट

परिलक्षित होता है क्योंकि उन्होंने राजा की दिव्यता और उसके दैवीय गुणों की अनिवार्यता को अपने संविधानों में कहीं भी मान्यता नही दी है। यही कारण है कि आज के हजारों मनुओं (संविधान विदों) की अपेक्षा हमारा एक
'मनु' लाख दर्जे उत्तम है। जो स्पष्ट करता है-''क्योंकि इन शक्तिशाली इंद्र आदि दिव्य शक्तियों के सारभूत गुणरूपी अंश से राजापद को बनाया है, इसीलिए यह राजा अपने तेज=शक्तिशाली (राजा की यह दिव्यता उसका अजेय आभामंडल निर्मित करती है जिससे वह दिव्य तेज का स्वामी हो जाता है) से सब प्राणियों को वशीभूत एवं पराजित रखता है।
''

मनु महाराज राजा में तेजस्विता और प्रभावशालिता के गुणों को विकसित करना चाहते हैं इसलिए वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि-''जो (राजा) सूर्यवत प्रतापी सबके बाहर और भीतर मनों को अपने तेज से तपाने हारा है, जिसको पृथिवी में कड़ी दृष्टि से देखने को कोई भी समर्थ नही होता।''

(मनु. 6/6, स.प्र. 141)

राजा अपनी इस प्रभावशालिता को अपने तप से प्राप्त करता है यह भारतीय राजधर्म का गुण है, जबकि विदेशी लोगों की मान्यता रही है कि राजा अपनी प्रभावशालिता को बल से प्राप्त करता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि मनु से विमुख आज की राज्यव्यवस्था भी (लोकतंत्र में) राजा को तप की शिक्षा न देकर 'बल' की शिक्षा दे रही है जिससे राजनीति की विश्वसनीयता ही भंग हो गयी है।