मनु और न्यायपूर्ण राजाज्ञा, भाग-2

  • 2016-08-27 09:45:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और न्यायपूर्ण राजाज्ञा, भाग-2

विधि की जानकारी सबको होती है

कानून के क्षेत्र में विधि विशेषज्ञों या विधि व्यवसायियों द्वारा यह बात अक्सर कही जाती है कि कानून का निर्माण होने पर अर्थात उस पर राजा की या संसद की मुहर लगते ही उसके विषय में यह मान लिया जाता है कि अब उसकी जानकारी सबको हो गयी है। अंग्रेजों के काल से भारत में रूढ़ हुई विधि संबंधी इस धारणा का भारत और भारतीयता से गहरा संबंध है।

तनिक इस वाक्य को ऐसा कहकर देखने या समझने का प्रयास करें कि विधि नीति के अनुकूल होती है और नीति नैतिकता के अर्थात जनभावनाओं के अनुकूल होती है

, इसलिए विधि के विषय में यह सर्वमान्य सत्य है कि वह नीति और लोककल्याण या जनभावना के सम्मानार्थ ही बनायी जाएगी। अब जो है ही लोककल्याण या नैतिकता की रक्षार्थ उसके विषय में सबको जानकारी होना स्वाभाविक ही है। क्योंकि एक सामान्य सा व्यक्ति भी यह जानता है कि किसी के सामान की चोरी करना अनैतिकता है और लोककल्याण की भावना के विपरीत है
, तो इसका अभिप्राय हुआ कि सरकार चोरी रोकने पर चाहे जैसे कानून बना ले, उसकी जानकारी पूर्व से ही जनसामान्य को है कि चोरी अनैतिक होने से विधि विरूद्घ भी है।

इस प्रकार की नैतिकताओं की रक्षा हेतु ही राजा को विधि बनाने के लिए अधिकृत किया गया है। इसके लिए मनु महाराज का कथन है-

''उस राजा के लिए सृष्टि के प्रारंभ में ही ईश्वर ने सब प्राणियों की सुरक्षा करने वाले ब्रहमतेजोमय अर्थात शिक्षाप्रद और अपराधनाशक गुण वाले

, धर्मस्वरूपात्मक दण्ड को रचा अर्थात दण्ड देने की व्यवस्था का विधान किया।''

इस श्लोक से स्पष्ट है कि विधि का ब्रह्म तेजोमय अर्थात शिक्षाप्रद तथा अपराधनाशक गुण वाला धर्म स्वरूपात्मक होना आवश्यक है। विधि शिक्षाप्रद तभी हो सकती है जब वह सुधारवादी हो। जैसे एक अध्यापक अपने शिष्य को मुर्गा बनाकर शिक्षा भी देता है और दण्ड भी। जब बच्चा मुर्गा बनने की स्थिति में होता है तो उस समय उसके शरीर के रक्त का संचार तेजी से मस्तिष्क की ओर होता है जिससे मस्तिष्क के स्मृति भण्डार को बल मिलता है

, याददाश्त बढ़ती है। ऐसे में मुर्गा बनाना बच्चे को स्मृति बढ़ाने का एक आसन सिखाना है जो कि बच्चे के लिए प्रत्यक्षत: तो एक दण्ड है पर वास्तव में वह सुधारवादी और शिक्षाप्रद भी है। वास्तव में विधि ऐसी ही होनी चाहिए। उसका अंतिम उद्देश्य सुधार होना चाहिए। कदाचित इसीलिए महात्मा गांधी जी ने भी जेलों को
'सुधारगृह' की संज्ञा दी थी। उनका मानना था कि इन 'सुधारगृहों' में भी अपराधियों को एक 'श्रेष्ठ मानव' बनाने के लिए हर प्रकार का उपाय अपनाना चाहिए।

आज तो व्यवस्था ही अपराधी हो गयी है

यदि आज की परिस्थितियों और परिवेश पर विचार किया जाए तो सारी व्यवस्था ही दोषी हो गयी है। इसका कारण ये है कि हमारे विधि निर्माताओं ने पश्चिम की विधि निर्माण की उस प्रक्रिया को अपने अनुकूल माना है जिसमें विधि निर्माता मंडल (व्यवस्थापिका के सदस्यगण) अपने आपको विधि से ऊपर रखता है। अंग्रेजी काल में तो ये बात समझ में आती थी-जब शासक वर्ग या विधि निर्माता मण्डल तानाशाही प्रवृत्ति का होता था और उसे शोषण करने के लिए ही कानून बनाना होता था

, परंतु आजकल जब हमारा अपना शासन है तो यह बात समझ में नही आती कि आज हमारे विधि निर्माता मण्डल के सदस्य या शासक वर्ग स्वयं को कानून से ऊपर क्यों रखता है
? शासक वर्ग की ऐसी मानसिकता को देखकर तो यही लगता है कि अभी देश में वास्तविक 'स्वराज्य' नही आया। स्वराज्य तो वही होता है जिसमें देश की जनता को अपने भ्रष्ट और दोषी जननायकों को कान पकडक़र उठक-बैठक कराने का मौलिक अधिकार प्राप्त हो। किसी भी देश का शासक वर्ग जब तक स्वयं को कानून की पकड़ से बाहर रखने के लिए सचेष्ट रहेगा, तब तक उस देश में सच्चे अर्थों में लोकतंत्र की या स्वराज्य की स्थापना की अपेक्षा नही की जा सकती।

हमारे देश में पद पर रहते हुए कई नेताओं या मंत्रियों के विरूद्घ प्राथमिकी दर्ज नही हो सकती और ना ही कोई अभियोग चल सकता। इसी प्रकार सांसदों के कुछ विशेषाधिकार हैं, जो उन्हें अपराध से सुरक्षा प्रदान करते हैं। हमारे यहां अपराधियों की राजनीति में रूचि बढऩे का एक कारण यह भी है कि राजनीति में आकर और जनप्रतिनिधि बनकर उन्हें अपराध के लिए एक 'सुरक्षा कवच' मिल जाता है। प्रश्न ये है कि देश में यदि जनसाधारण की और उच्च वर्ग की या शासक वर्ग की निजता का सम्मान एक जैसा है तो जनप्रतिनिधियों के पास विशेषाधिकार क्यों है

?

निजता तो रिक्शा चालक की और देश चालक की समान है। इसलिए यदि अपराध के किसी मामले में फंसकर शासक वर्ग को विशेष छूट दी जाती है तो यह बात प्रारंभ से ही अनुचित मानी जाएगी। यदि एक साधारण व्यक्ति के विरूद्घ यथाशीघ्र किसी मामले में प्राथमिकी दर्ज हो सकती है तो यह व्यवस्था राजनीतिज्ञों के विरूद्घ भी होनी चाहिए। ऐसे बहुत से प्रकरण देश में आते हैं जिनमें एक भले व्यक्ति को झूठी प्राथमिकी में फंसाया जाता है और झूठे मुकदमों से जूझने और लडऩे में ऐसे लोगों को वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है। बाद में पता चलता है कि सारा मुकदमा ही झूठा था। अब यदि एक साधारण व्यक्ति वर्षों तक एक झूठे मुकदमे में स्वयं को निर्दोष सिद्घ कराने के लिए पापड़ बेल सकता है तो जनप्रतिनिधियों को भी ऐसे झूठे मुकदमों का सामना करने देना चाहिए, या फिर ऐसी व्यवस्था देश में हो जो झूठे मुकदमों को दर्ज करने कराने से रोकने में सहायता करे। कानून के समक्ष समानता का अभिप्राय है कि राजा और रंक के लिए एक जैसा कानून हो।

क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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