मनु और न्यायपूर्ण राजाज्ञा

  • 2016-08-26 04:00:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और न्यायपूर्ण राजाज्ञा

राजा के दैवीय उत्पत्ति के सिद्घांत की चाहे पश्चिम के राजनीतिक मनीषियों, विद्वानों या समीक्षकों ने जितनी आलोचना की है, वह उन्होंने अपने तानाशाह, निर्दयी और क्रूर शासकों को देखकर की है, जो अपनी प्रजा पर मनमाना अत्याचार करते थे, और उसे अपनी गुलाम समझते थे, जबकि स्वयं को ईश्वर का अवतार समझकर इस अहंकार में जीते थे कि उन्हें तो ईश्वर ने इस प्रजा पर शासन और अत्याचार करने के लिए विशेषाधिकारों से सुसज्जित कर धरती पर भेजा है। पश्चिम के इन राजनीतिक मनीषियों

, विद्वानों ने या समीक्षकों ने भारत के राज्योत्पत्ति के दैवीय सिद्वांत को नही समझा, और हमारा मानना है कि वे समझ भी नही सकते, क्योंकि भारत को समझने के लिए समय चाहिए जो उनके पास नही है। इसलिए वह चलती प्रतिक्रिया देते हैं, आलोचना करते हैं पर हमें इस प्रकार की आलोचना से घबराने की आवश्यकता नही होनी चाहिए। कोई दूसरा तुम्हारे 'सामान' को क्या कहता है
? महत्वपूर्ण यह नही है, अपितु महत्वपूर्ण ये है कि आप स्वयं अपने सामान को क्या समझते हैं और क्या कहकर उसे बेच रहे हैं?

हमारे 'राजा' को जनसेवक होना चाहिए। प्रजोत्पीडऩ की तो उससे कहीं कल्पना भी नही की जा सकती है। प्रजोत्पीडक़ शासकों को समूल नष्ट करने के लिए तो केवल भारत ही इस भूमंडल पर एक ऐसा देश है जो अपनी जनता को भी इस कार्य के लिए अधिकृत करता है। कहने का अभिप्राय है कि भारत ने 'राजा' को ईश्वर का अवतार न मानकर उसका प्रतिनिधि माना है और जैसे ईश्वर अपनी प्रजा के साथ पक्षपातशून्य न्यायपूर्ण व्यवहार करता है वैसी ही अपेक्षा राजा से की गयी है कि वह भी अपनी प्रजा के मध्य न्यायपूर्ण व्यवहार करेगा। हमारा

'राजा' अपने क्रूर अत्याचारों से दूसरों को या अपने प्रजाजनों को नही डराता है, अपितु उसके न्यायपूर्ण कार्य व्यवहार और पुण्यों के संचय से बने उसके आभामंडल में स्वयं ही इतना तेज व्यापक हो जाता है कि प्रजा के दुष्ट
लोग या उससे शत्रु भाव रखने वाले लोग स्वयं ही राजा से भयभीत होने लगते हैं। मनु महाराज कहते हैं-''जो राजा सूर्य के समान प्रतापी, सबके बाहर और भीतर मनों को अपने तेज से तपाने हारा है, ऐसे राजा को इस भूमंडल पर कोई भी कड़ी दृष्टि से देखने को समर्थ नही हो सकता।'' (स.प्र. 141)

'राजा' का तपरूपी प्रताप दुष्टों को भयभीत करता है और वही प्रताप पुण्यमयी लोगों के लिए 'ओज' बनकर उनको शक्ति प्रदान करता है। राजा का दैवीय गुण भी यही है कि उनकी उपस्थिति से दुष्ट

को भय लगे जबकि भले लोगों को उसकी उपस्थिति प्रसन्नतादायिनी हो। ''राजा में तेजस्विता, प्रभावशालिता आदि गुण होने चाहिए। इन गुणों से युक्त होकर राजा सफल एवं प्रजाओं पर प्रभावी रहता है।

मनु महाराज पुन: हमें अपने राजा के दिव्य गुणों से परिचित कराते हुए स्पष्ट करते हैं कि ''वह राजा अपने प्रभाव=सामथ्र्य के कारण अग्नि के समान दुष्टों=अपराधियों का विनाश करने वाला और वायु के समान गुप्तचरों द्वारा गतिशील होकर प्रत्येक स्थिति की जानकारी रखने वाला सूर्य द्वारा किरणों से जलग्रहण करने के समान कष्ट

रहित कर-टैक्स ग्रहण करने वाला, चंद्रमा के समान शांति प्रसन्नता प्रदान करने वाला, धर्मराट=न्यायानुसार दण्ड देने वाला, ऐश्वर्यप्रद परमेश्वर के समान समभाव से प्रजा का पालन करने वाला, जलीय तरंगों या भंवरों के समान अपराधियों और शत्रुओं को बंधनों या कारागार में डालने वाला और वही वर्षाकारक शक्ति इंद्र के समान सुख सुविधा का वर्षक=प्रदाता है।
''

राजाज्ञा का उल्लंघन दण्डनीय है

जिस राजा के भीतर ऐसे दिव्य गुण होंगे, वह कभी भी अन्यायपरक नीतियों पर चलने वाला नही हो सकता। उससे अपेक्षा की जाती है कि प्रजा का कल्याण करना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है, और अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह ऐसी नीतियों अर्थात निश्चित व्यवस्थाओं का पालन करेगा या ऐसी विधि का निर्माण करेगा जिससे प्रजा का अधिकतम लाभ हो। राजनीति में कुछ लोग उस विधि को उत्तम मानते हैं जो अधिकतम लोगों का अधिकतम लाभ कर सके

, परंतु यह बात भारतीय मनीषा में फिट नही बैठती। भारतीय संविधान या विधि विधान के निर्माण का उद्देश्य संपूर्ण प्रजाजनों का अधिकतम लाभ करना है। इसका अभिप्राय बड़ा व्यापक है। कहा जाता है कि यदि संपूर्ण प्रजाजनों का अधिकतम हित करना भारतीय विधि व्यवस्था का उद्देश्य है तो क्या वह चोर
, लुटेरे, डकैत, आदि अपराधियों का भी अधिकतम हित करना चाहती है? हमारा उत्तर है कि हां, भारत की विधि व्यवस्था इन अपराधियों का भी अधिकतम हित करना चाहती है।

अपनी बात को हम स्पष्ट करें, इसके लिए यह समझना अनिवार्य होगा कि भारत की विधि व्यवस्था में संस्कार आधारित शिक्षा प्रणाली भी सम्मिलित है। प्रजाजनों में से कोई भी अपराध के क्षेत्र में न जाये

, इसके लिए शिक्षा का संस्कार प्रदात्री होना अनिवार्य है। इस प्रकार राजा की विधि व्यवस्था एक नीति को अर्थात मानव को मानव बनाये रखने की उसकी निश्चित व्यवस्था की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। यह भारत की विधि व्यवस्था का मानवीय पक्ष है, जो राजा को सभी प्रजाजनों का विश्वसनीय बनाता है और उसके प्रति सभी लोगों के भीतर सम्मान भाव उत्पन्न करता है। इस विधि व्यवस्था को या नीति को लोक की सर्वानुमति प्राप्त होती है इसलिए इसके निर्माण से संपूर्ण प्रजा का अधिकतम लाभ होता है। इसके विपरीत पश्चिम का चिंतन शिक्षा को रोजगारप्रद बनाने पर रहा है
, उसने लोगों को संस्कारप्रद शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य नही माना। उसने व्यक्ति को पैसा कमाने की मशीन बनाकर रख दिया, और अपना सारा ध्यान भौतिकवाद पर केन्द्रित कर दिया। फलस्वरूप उसने लोगों के लिए चोर, लुटेरे, डकैत आदि बनने की गुंजाइश छोड़ी है और ऐसे लोगों से निपटने के लिए उसने कठोर कानूनों का निर्माण करना उचित माना है। जिससे उनके कानूनों में संवेदनशून्यता आ गयी
, यह उनके कानून का भावशून्य पक्ष है। पश्चिम के लोग ये भूल गये कि भावपक्ष के बिना किसी सभ्य मानव समाज का निर्माण किया जाना असंभव है। यही कारण है कि उनकी जीवनशैली में आज भी बेतहाशा भागदौड़ है और अनिश्ंिचतता है। जबकि भारत की जीवन शैली में आज की सभी कमियों के उपरांत भी निश्चिंतता है। हमारा मानना है कि निश्चिंतता का यह भाव हमारे मनु जैसे महामानवों की देन है
, जो सदियों से नही युगों से हमारा मार्गदर्शन करता आ रहा है।

मनु प्रजासेवी राजा के कानून का उल्लंघन करना दण्डनीय मानते हैं। वह कहते हैं :-

''वह अर्थात राजा जिस धर्म अर्थात कानून का पालनीय विषयों में निर्धारण करे और अपालनीय विषयों में जिसका निषेध करे उस धर्म अर्थात कानून का उल्लंघन न करें।'' (13)

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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