मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना

  • 2016-09-01 10:15:42.0
  • राकेश कुमार आर्य

मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना

राष्ट्रकवि इकबाल ने कहा था-'मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना।' पर हमारी मान्यता इसके प्रतिकूल है। हम चूंकि मजहब को धर्म का नही अपितु संप्रदाय का पर्यायवाची मानते हैं, इसलिए मानव मस्तिष्क में उठने वाले संपूर्ण साम्प्रदायिक विद्वेष भरे कुंठित विचारों, हिंसक वृत्ति और अमानवीय आचरण का जनक हम मजहब को मानते हैं। इसलिए हमारी तो दृढ़ धारणा है कि-

''मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना''

जिस कवि ने इन पंक्तियों को लिखा है कि

'मजहब नही सिखाता है आपस में बैर रखना' उन्होंने ही एक सत्य को (आश्चर्य भरे शब्दों में) निम्न प्रकार बयान किया-

यूनान, सिख, रोमां, सब मिट गये जहां से।

मगर बाकी है अब तक, नामोनिशां हमारा।।

इकबाल साहब को हमारे (वैदिक धर्म और इस पावन भारत देश के) अब तक बचे रहने पर आश्चर्य हुआ। क्योंकि यूनान, मिस्र और रोम मुस्लिम आक्रमण के समक्ष अपने स्वर्णिम अतीत और महान सांस्कृतिक विरासत को बचा नही सके।

हमारा प्रश्न है कि यूनान, मिस्र, रोमां को डसने वाला कौन था? किसने उनकी सभ्यता को मिटाया? किसने उनकी संस्कृति को, उनके धर्म को, उनकी निजता को उनके गौरवपूर्ण अतीत को और उनकी राष्ट्रीय पहचान को मिटाया?

उत्तर बिल्कुल साफ है-मजहब ने।

जिन लोगों के भी मस्तिष्क में इन महान देशों की सभ्यता को और संस्कृति को मिटाने का विचार आया था वो लोग मजहबी लोग थे। साम्प्रदायिक लोग थे।

इस सत्य को स्वीकार करके कि कुछ अत्यंत गौरवपूर्ण सभ्यताएं और संस्कृतियां संसार में नाम मात्र को शेष रह गयी हैं या समाप्त कर दी गयी हैं, आप यह नही समझ पाये कि इन्हें समाप्त करने की निविदा सिर्फ मजहबी नाम के ठेकेदारों के पास ही थी।

यह वह ठेकेदार हैं जिन्होंने सदा ही उन्माद का व्यापार किया है। इसकी मूल प्रवृत्ति को समझने में आप चूक कर गये-यह देखकर आश्चर्य होता है।

इकबाल साहब! आपकी लेखनी इस भेडिय़े को लताड़ती और इसे मानवता का प्रथम शत्रु घोषित कर इसके वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करती। तब संभव था इसके प्रति हमारे राजनैतिक नेतृत्व की सोच बदल जाती

, उसे इसकी वास्तविकता का बोध होता।

इतिहास और मजहब

इतिहास को मानव रक्त के धब्बों से कलंकित करने में मजहब की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्तमान समय में उपलब्ध विश्व के ज्ञात इतिहास में जितने युद्घों का वर्णन हम पढ़ते हैं उनमें से

90 प्रतिशत मजहब के नाम पर लड़े गये युद्घ है। इतिहास में कहीं ईसाइयत अपना परचम लहराने के लिए किसी अन्य मजहब को खाती, डसती और निगलती दिखलाई पड़ती है, तो कहीं जेहाद के नाम पर इस्लाम की तलवार का कहर बरसाया जा रहा है। बात जिहाद की आयी है, जिसका अर्थ होता है-''मजहब के प्रचार के लिए लड़ा जाने वाला युद्घ''

इस अर्थ का इस अवधारणा के साथ कि-'मजहब नही सिखाता है आपस में बैर रखना' के साथ कैसे तारतम्य स्थापित किया जाए

? वास्तव में यही जिहाद ही तो था जिसने विश्व की कितनी ही हंसती खेलती और खाती-पीती सभ्यताओं और संस्कृतियों को समूल नष्ट करा दिया।

पर्याप्त साक्ष्यों के उपलब्ध होते हुए भी यदि अपराधी को दोषमुक्त कर दिया जाता है तो न्यायालय की कार्यप्रणाली संदिग्ध बन जाया करती है इसलिए अपराधी को अपराधी कह कर घोषित किया जाए और उसे दंडित किया जाए। न्याय की यही मांग हुआ करती है। जिन लोगों ने भारत में अपराधी को अपराधी नही माना या नही मानने दिया वे स्वयं अपराधी हैं

, राष्ट्रघाती हैं और राष्ट्रद्रोही हैं। झूठी अवधारणाओं की प्रतिस्थापना राष्ट्र की दशा और दिशा को बिगाड़ दिया करती है। आज भारत में यही तो हो रहा है। इस राष्ट्र की दशा और दिशा दोनों बिगड़ी हुई हैं। क्योंकि हमने इतिहास से कोई सीख नही ली, अपितु अपराधी को दोषमुक्त कर खुला छोड़ दिया। आज यही अपराधी 'साम्प्रदायिकता' के रूप में एक दानव बनकर भारत की एकता
, अखण्डता और निजता को पुन: चुनौती प्रस्तुत कर रहा है और हम गाये जा रहे हैं इसका स्तुतिगान-

'मजहब नही सिखाता .........................।'

साम्प्रदायिक लोगों को नही अपितु देशभक्तों को आरोपित किया गया।

भारत के नेताओं के द्वारा इस भ्रमपूर्ण झूठी अवधारणा की प्रतिस्थापना से एक लाभ अवश्य हुआ है कि साम्प्रदायिक लोग साम्प्रदायिक नही रह गये हैं, उन्हें साम्प्रदायिक एकता का सूत्रधार होने का एक प्रमाणपत्र और थमा दिया गया इसलिए उनके अमानवीय कृत्यों पर इस प्रकार लीपापोती की गयी कि आततायी और दुष्ट

लोग भी भले लगने लगे।

जैसे भारत में मौहम्मद बिन कासिम का पहला आक्रमण सन 712 ई. में हुआ। उसके इस आक्रमण से लेकर सन 1857 ई. तक जब तक भारत में आधी-अधूरी मुस्लिम सत्ता रही तब तक एक मजहब के लोगों ने दूसरे संप्रदाय के लोगों पर जो अत्याचार ढाये, उन्हें पढक़र अच्छे-अच्छे शूरमाओं के रोंगटे भी खड़े हो जाएंगे। किंतु इन सभी आततायियों को साम्प्रदायिक या मजहबी शासक नही माना गया। क्योंकि मजहब तो आपस में बैर रखना सिखाता ही नही है। अब ऐसे विचारों के प्रतिपादकों से कौन पूछे कि यदि ऐसा था तो फिर किसके लिए ये लोग अत्याचार कर रहे थे

? किसके लिए खून बहा रहे थे? और किसके लिए लूटपाट कर रहे थे? हमने अपनी नग्न आंखों से इतिहास में देखा है-

-देवालयपुर (करांची) के मंदिरों को लुटते।

-राजा दाहिर की बेटियों के साथ दुव्र्यवहार होते।

-सोमनाथ के मंदिर को लुटते हुए और कितने ही मंदिरों से अपार धन संपदा को भारत से बाहर जाते हुए।

-कितने ही राजाओं, महान सेनानायकों, वीरों और भारतीय जनसाधारण के साथ अमानवीय अत्याचारों की अनवरत श्रंखला।

-कितनी ही बार के रक्तपात, हिंसा के खेल और जनसंहार को।

-अमानवीय ढंग से पाशविक अत्याचारों के साथ होने वाले धर्मांतरण और मर्मांतक रूप से दी जाने वाली पीड़ाओं को।

-नंगी तलवारों से निर्दयता के साथ बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं का कत्ल और उनके साथ निंदनीय और घृणित अपराध और अत्याचार एवं धर्मांतरण करते हुए। यह सारा खेल किसलिए और किसके द्वारा खेला गया? उत्तर है मजहब के द्वारा। अत: यह धारणा एक सिरे से ही अस्वीकार्य है कि-'मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना।' जो उदाहरण हमने ऊपर दिये हैं, अथवा तथ्य उद्घाटित किये हैं ये सबके सब आज भी घटित होते रहते हैं।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

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राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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