लूटतंत्रीय लोकतंत्र के रंग

  • 2016-09-26 03:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

लूटतंत्रीय लोकतंत्र के रंग

इस देश में कानूनों की भरमार है। लगभग 30 हजार से अधिक कानून ऐसे हैं जो इस देश में अंग्रेजों के समय से चले आते हैं। अंग्रेजों के अधिकतर कानून ऐसे थे जो उन्हें भारतवासियों पर अन्याय और अत्याचार करने के लिए खुली छूट देते थे। स्पष्ट है कि इन कानूनों को अंग्रेजों के साथ ही इस देश से विदा हो जाना चाहिए था, पर ऐसा हुआ नहीं। देश की लोकतांत्रिक सरकारों ने तानाशाही कानूनों से देश पर शासन को प्राथमिक दी। देश आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी इन्हीं कानूनों से शासित होने के लिए अभिशप्त है।


कानूनों के ढेर में विलुप्त हुई व्यवस्था खिसक रही है। हमें नही पता कि हम कौन सी और कैसी व्यवस्था में जी रहे हैं? बहुत कुछ बदलाव आ चुके हैं। पर जितने भर भी बदलाव आ रहे हैं वे सब हमारे जीवन के कष्टों को समाप्त करने में सहायक रहे हों-यह नही कहा जा सकता। आजकल का तो मरना भी कुछ अलग सा हो गया है। पहले जीवन की प्रकाश से उपमा दी जाती थी, उसे एक दीपक माना जाता था जो दूसरों को प्रकाश देता है। बत्ती जलती थी, तेल खर्च होता था तेल की समाप्ति पर दीपक झिलमिलाता, टिमटिमाता लौ बैठनी आरंभ होती थी (जीवन धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जाता था) और अंत में धीरे-धीरे ठंडा हो जाता था। अब दीपक की जिंदगी बिजली का लैंप हो गयी है। इधर बटन दबता है और उधर अंधेरा घुप्प (हार्टफेल) हो जाता है।

हमारी जीवन शैली में आये भारी बदलाव का परिणाम है-हमारी यह सुंदर उपलब्धि। हमने आजादी के बीते 70 वर्षों में यही उपलब्धि प्राप्त की है कि अंत में अंधेरा घुप्प कैसे हो? दूसरों के जीवन में प्रकाश भरने वाले हम लोगों ने अपने जीवन में अंधेरा कर लिया। इसे आप क्या कहेंगे-उपलब्धि या जो कुछ अपने पास था उसे भी खो देने की मूर्खता?

हमने क्या-क्या खोया है? इस पर कभी विस्तार से लिखूंगा। आज तो दो-तीन उदाहरण देकर ही अपनी बात को समाप्त करना चाहूंगा। अभी पिछले दिनों एक समाचार अखबारों में आया था कि वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि व्यक्ति के शरीर में पाये जाने वाला कॉलेस्ट्रॉल उसके शरीर या जीवन के लिए घातक नही होता अपितु वह उतना ही बनता है जितना शरीर के लिए आवश्यक होता है। इसलिए अभी तक विश्व के डॉक्टर्स ने कॉलेस्ट्रॉल के नाम पर खरबों डालर का जितना व्यापार किया था वह सब व्यर्थ की लूट थी। जिससे मानवता के इन पुजारियों ने रातों-रात बड़े-बड़े अस्पताल खड़े कर लिये कार-कोठी बंगलों की कोई गिनती सादगी और शराफत के इन दीवानों के पास नही रही। बड़े प्यार से खून करते रहे और साथ ही सम्मान भी पाते रहे। इनसे किसी ने नही पूछा कि तुम क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो? इसका कारण संभवत: यही था-
धनवती के कांटा लगा दौड़े लोग हजार।
निर्धन गिरा पहाड़ से कोई न आया कार।।
अर्थात धनवानों से कोई गलती नही होती, उनके छोटे से दर्द को भी लोग अपना दर्द मानते हैं। इसी प्रकार कानून भी संभवत: उनके लिए ना बनकर निर्धनों के लिए बनता है-जिन्हें छोटी सी बात पर 'भीतर' कर दिया जाता है। कॉलेस्ट्रोल के विषय में यदि वर्तमान निष्कर्ष सही है तो मानवता के हत्यारे रहे डॉक्टरों के अपराध को अपराध घोषित करना ही पड़ेगा और इनके कार्य व्यवहार पर अंकुश लगाना ही पड़ेगा।

अब दूसरा उदाहरण लीजिए। हमारे देश के लिए आस्टे्रलिया, अमेरिका, कनाडा जैसे देश कीटनाशक और यूरिया जैसे घातक खाद बनाकर भेजते रहे हैं, यद्यपि ये देश अपने यहां मानव जीवन के लिए घातक इन कीटनाशकों या खादों का उत्पादन बंद कर चुके हैं, पर भारत के कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों की आंखें नही खुलीं कि ये सब क्या हो रहा है? अब जब परिणाम सामने आ गये हैं और सब देख रहे हैं कि हमारी भूमि अनुर्वर होती जा रही है। उत्पादन घट रहा है, लागत बढ़ रही है, किसान आत्महत्या कर रहा है, कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से सांप, बिच्छू, मेंढक, केंचुआ आदि बड़ी संख्या में मर रहे हैं और उनकी दुर्गंधि से वातावरण प्रदूषित हो रहा है, जल और वायु प्रदूषित हो रहे हैं, जिससे देश में घातक बीमारियां फैल रही हैं , तो अब हमारे कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों की नींद खुली है। अब महोदय बता रहे हैं कि गलती कहां हो गयी थी? अब इनसे कौन पूछे कि आज तक तुम और तुम्हारे पूर्ववर्ती सरकारी कोष पर क्यों बोझ बने रहे? क्यों देश को लूट-लूटकर तुम अपनी कार-कोठियां खड़ी करते गये। केवल इस प्राणघातक स्थिति को लाने के लिए ही तुमने ऐसा किया था क्या? अरबों डॉलर का घपला है-यह भी। पर किसी की पकड़ में न तो आया है और ना आ पाएगा। क्योंकि यह 'कानूनी घपला' है अर्थात इन चोरों ने चोरी तो की है पर देश के कानून के अनुसार की है, इसलिए इन्हें कोई पकड़ नही सकता। देश की क्षति हो गयी-तो इसमें इनका क्या दोष इन्होंने वही किया जो कानून कहता है?

अब देश की सडक़ों को देखिए। विशेषत: गली मौहल्लों की सडक़ों को लें। अभी आरसीसी रोड बनती है तभी नगर पालिका को याद आता है कि अमुक-2 गली मौहल्लों में पानी की लाइन बिछानी है तो लग जाते हैं-आरसीसी को तोडऩे में। पानी की लाइन बिछकर समाप्त होती है तो बिजली वाले जाग जाते हैं। वे कहते हैं कि हम खंभा हटा रहे हैं और बिजली की लाइन अण्डर ग्राउंड करेंगे। इस लिए वे भी तोड़ डालते हैं-आरसीसी सडक़ को। गली वाले फिर पहले जैसी सडक़ वाले होकर रह जाते हैं। ये क्या मूर्खताएं हैं? क्यों चलती हैं ये? और कब तक चलेंगी? सारे लोकतंत्र को कत्र्तव्यविहीन लूटतंत्र में बदल कर रख दिया गया है-इन मूर्खताओं ने, और सारी व्यवस्था मौन है। जब व्यवस्था मौन हो जाए तो मानो कि लूट में उसकी भी सहमति है। हर वर्ष देश का मोटा, धन इन्हीं मूर्खताओं में व्यय हो जाता है। देखते हैं व्यवस्था कब जाएगी?