नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र

  • 2016-09-28 06:30:04.0
  • राकेश कुमार आर्य

नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अपने व्यक्तिगत जीवन में लेडी माउंटबेटन और कश्मीर के शेख अब्दुल्ला परिवार के प्रति क्यों इतने आकर्षित थे? अब ये बातें किसी से छिपी हुई नही रही हैं। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है कि नेहरू जी का व्यक्तिगत जीवन दुर्बलताओं से ग्रसित रहा। इसलिए नेहरूजी की व्यक्तिगत दुर्बलाओं के कारण राष्ट्र को कश्मीर की समस्या मिली। हमें अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी (पश्चिमी) मान्यताओं के प्रति भारतीय नेताओं का अनुचित लगाव देखने को मिला। इसके अतिरिक्त हमें ये काल्पनिक मान्यताएं मिलीं कि-

-आर्य विदेशी थे उन्हीं की हम सब संतानें हैं।
-भारत की सभ्यता पांच हजार वर्ष पुरानी ही है।
-मुस्लिम आक्रांताओं ने यहां आकर बड़े मानवीय ढंग से शासन किया।
-कितने ही किले, भवन और ऐतिहासिक इमारतें इन मुस्लिम शासकों ने यहां बनवाईं।
-महाराणा प्रताप, शिवाजी गुरू तेगबहादुर आदि राष्ट्रभक्त नही अपितु लुटेरे थे।
-सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि क्रांतिकारी नही अपितु उग्रवादी थे इत्यादि।
-हमें विचार करना चाहिए कि नेहरूजी के जीवन के व्यक्तिगत पक्ष ने हमारे राष्ट्रीय जीवन को कितना कुप्रभावित किया है? इस नेता ने हर व्यक्ति के चरित्र को दो भागों में बांटकर देखने का अनुचित प्रचलन भारत में प्रारंभ कर दिया। प्रथम-व्यक्तिगत और दूसरा-सार्वजनिक। इनकी मान्यता रही कि व्यक्तिगत जीवन गंदला, विषैला और घृणास्पद होकर भी सार्वजनिक जीवन के लिए किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के आंकलन के विषय में एक सही पैमाना नही हो सकता।

इस मान्यता का परिणाम ये निकला कि आज भारत की सर्वोच्च सभा अर्थात लोकसभा में चोर, गुण्डे, लफंगे और बदमाश तक पहुंच गये हैं। क्योंकि पिछले कई दशकों में ये बात एक संस्कार के रूप में हमारे भीतर बैठा दी गयी है कि व्यक्ति का 'व्यक्तिगत जीवन' और 'सार्वजनिक जीवन' दोनों ही भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं। इन्हें एक करके नही देखना चाहिए।

व्यक्तिगत और सामाजिक चरित्र
हम भूल गये हैं कि व्यक्ति के व्यक्तित्व और चरित्र के दो पक्ष नही हुआ करते। व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण उसके सारे गुण-अवगुण मिलकर किया करते हैं। कौन व्यक्ति किस व्यक्तित्व का स्वामी है? यह जांचने-परखने के लिए हम उसकी वेशभूषा बोलचाल, चालन-चलन, उठने-बैठने पर ही ध्यान नही देते हैं, अपितु उसके समस्त गुण-अवगुणों पर भी ध्यान देते हैं। उसके सारे गुणावगुणों को एकत्र कर उसी के समान स्तर के व्यक्ति से उनका मिलान करते हैं। अब यदि उस व्यक्ति के पल्ले गुण अधिक रहते हैं तो वह गुणी व्यक्तित्व का और यदि अवगुण अधिक रहते हैं तो हेय व्यक्तित्व का स्वामी संसार में माना जाता है।

लालबहादुर शास्त्री जी का धन्य जीवन
लालबहादुर शास्त्री जी के भीतर ईमानदारी, कत्र्तव्यनिष्ठा, साहस, राष्ट्रभक्ति, दृढ़निश्चय, चरित्र की दृढ़ता आदि कूट-कूटकर भरे थे। ये गुण उनकी व्यक्तिगत पूंजी नही थे, अपितु आज तक के सभी प्रधानमंत्रियों में इन गुणों में वह कई अर्थों में सबसे आगे थे। इसलिए उनका व्यक्तित्व भारत के जनसाधारण में आज भी पूजनीय है, अनुकरणीय है और प्रशंसनीय है। शास्त्रीजी का व्यक्तित्व इन गुणों के कारण ही महान हुआ। क्या ये गुण उनके निजी गुण थे या सार्वजनिक जीवन के गुण थे? निश्चित रूप से ये निजी गुण थे, जो उनके चरित्र का एक अंग थे। चरित्र से व्यक्ति का चाल-चलन, खान-पान, रहन-सहन, मित्रों, पड़ोसियों, संबंधियों और जनसाधारण के प्रति उसके दृष्टिकोण व सदाशयता आदि का बोध होता है। इसी से उसकी सार्वजनिक छवि बनती है। स्पष्ट है कि छवि की पृष्ठभूमि में व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन ही खड़ा होता है जिसकी उपेक्षा नही की जा सकती।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)