नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र, भाग-दो

  • 2016-09-29 04:15:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

नेताओं का व्यक्तिगत चरित्र बनाम सार्वजनिक चरित्र, भाग-दो

यथा राजा तथा प्रजा
नेहरू जी द्वारा प्रतिपादित और प्रतिष्ठित इस मिथक के पीछे हम इतने दीवाने हुए कि हमने भारतीय समाज में युगों से बैठी उस धारणा को भी उपेक्षित कर दिया जिसके कारण यहां माना जाता रहा है कि-'यथा राजा तथा प्रजा' अर्थात जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा होगी। जब हमारे शासक विश्वविजय का सपना लेने वाले हुआ करते थे तो हम उनकी उसी भावना से आंदोलित रहा करते थे। किंतु जब शासकों की यह भावना अवरूद्घ हुई तो जनसाधारण का साहस भी ढीला पड़ गया। कालांतर में जब शासक वर्ग आपसी फूट और लूट में बह गया तो जनता का साहस भी हाथ से इसी प्रकार छूट गया।
निष्कर्ष यही है कि राजा के व्यक्तिगत गुण स्वयं उसके और राष्ट्र के जीवन को उन्नत करने में सहायक हुआ करते हैं। ये गुण व्यक्तिगत ही हुआ करते हैं। इनका विभाजन करके देखना समझदारी नही है। वेद के अनुसार हमारा राष्ट्रीय आदर्श है-
'ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण हों, धनुर्धर, शूरवीर नीरोग, महारथी क्षत्रिय हों, दुधारू गौएं हों, विजयशील, रथारोही सभ्य युवा पुत्र हों' इच्छानुसार बादल बरसें, फलवती औषधियां परिपक्व हों। सब प्रकार से हमारा योगक्षेम होता रहे।'

राष्ट्र की सर्वांगीण और सार्वत्रिक उन्नति का कितना सुंदर चित्रण है। इसमें सुंदर रंग तभी भरा जा सकता है, जब भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को दिये गये निम्नलिखित निर्देश पर हमारा शासक वर्ग ध्यान देगा-
न ही सत्यादृते किंचिद राजां वैसिद्घिकारकम्।
सत्ये ही राजा निरत: प्रत्यचेह न नंदति।।

सत्य व ईमानदारी के अतिरिक्त अन्य कोई नीति राजा को, राज्य के लिए सफलतादायक नहीं हैं। सत्य पर चलने वाला शासक यहां शासनकाल में और उसके पश्चात भी आनंद पाता है तथा प्रसन्न रहता है।

तपस्वी राजा ही आदर्श
इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए राजा को तपस्वी होना होगा। युधिष्ठिर कहते हैं-'तप: स्वकर्म-वर्तित्वमं् तप: स्वधर्म वर्तित्वम्' अर्थात स्वकर्म और स्वधर्म का पालन करना भी तप है। अत: राजा के जीवन में उसके 'कर्म' और 'धर्म' दोनों से ही उसकी तपस्विता झलकती हो। राजा के लिए प्रजाहित से बड़ा कोई 'कर्म' नही और राष्ट्रहित से बड़ा कोई धर्म नही। मानो प्रजाहित और राष्ट्रहित दोनों के संतुलन के लिए ही राजा का चयन हुआ है।

इस द्वंद्व के बीच से बड़े सधे ढंग से निकल जाना ही उसकी तपस्या है, उसके जीवन का आदर्श है, उसका उद्देश्य है। जीवन की इस उच्च और आदर्श स्थिति को पाने के लिए राजा का जीवन कितना नैतिक और उन्नत होना चाहिए? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

जब जब राजा का तप ढीला हुआ है, तब-तब ही इस राष्ट्र को नीचा देखना पड़ा है। जब-जब राजा भोग विलास में लिप्त हुआ है, भवनों के भीतर रहकर अपने गुणगान में पढ़ी गयी कविताओं को सुनकर नशे में धुत होकर वहीं गिर पड़ा है। उसके नशे में कदम डगमगाते हैं अथवा व्यभिचार और भ्रष्टाचार से उसने समझौता किया है, तब-तब ही राष्ट्र का नैतिक सैनिक, आर्थिक और धार्मिक पतन हुआ है। इसलिए राजा को इन सभी द्वंद्वों के बीच अग्निपरीक्षा देते हुए निकलना होता है।

बिना टिकट यात्रा
दुर्भाग्य से हमने इस स्थिति को स्वतंत्रता के उपरांत खुला निमंत्रण देकर अपना लिया है। आज राजा के लिए अग्निपरीक्षा की स्थिति नही है। देश के पहले राजा (नेहरूजी) ने अपने आपको चोर दरवाजे से निकाल दिया। वह आदमी बिना टिकट यात्रा कर रहा था। किंतु फिर भी राष्ट्रहित की दुहाई देकर उसे निकल जाने दिया गया। उसके पश्चात आज तक कितने ही 'राजा' इसी चोर दरवाजे से निकल गये हैं। नैतिकता की, धर्म की और उच्चादर्शों की बातें जनसाधारण के लिए अपनाने हेतु छोड़ दी गयीं, जिन्हें आज वह भी छोड़ता जा रहा है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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