कोऊ नृप होइ हमें का हानि-क्यों बनी ऐसी सोच?-भाग-3

  • 2017-06-10 03:30:33.0
  • राकेश कुमार आर्य

राष्ट्र धर्म की उपेक्षा घातक
स्वतंत्रता के उपरांत हमारा राष्ट्रधर्म था राजनीति को मूल्य आधारित बनाना, शासक को शासक के गुणों से विभूषित करना तथा राष्ट्र को दिशा देने में सक्षम बनाने वाले राजनीतिक परिवेश का निर्माण करना। हमने इसी धर्म को निशाने में चूक की। परिणामस्वरूप राजनीति बदमाशों के पल्ले पड़ गयी जो आज हमें राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ा रहे हैं। हमारे महान नेता आडवाणी जी कह रहे हैं कि 'जिन्नाह महान राष्ट्रभक्त था और वह धर्मनिरपेक्ष था' आज राजनीति को इन्हीं तत्वों के चंगुल से बचाने की आवश्यकता है।

हम देखें कि 'कोऊ नृप होई हमें का हानि' का भाव हमें आज की परिवर्तित परिस्थितियों में किधर ले जा रहा है, इससे राष्ट्र की कितनी हानि हो रही है? जनता का इन परिस्थितियों में विशेष दायित्व बन जाता है। मतदाता को क्या करना है? यह भली प्रकार समझ लेना होगा। राष्ट्रहित किसके हाथों में सुरक्षित है? वह यह भी विचार लें और यह भी विचार लें कि जो नाविक, धीर, वीर, गंभीर और विवेकशील होता है तो क्या परिणाम आते हैं? और अधीर, असंयमी और अविवेकशील नाविक के होने से नाव की क्या स्थिति होती है?

आर्यत्व और हिन्दुत्व की कसौटी
महर्षि दयानंद जी महाराज ने परंपरा से इस राष्ट्र को 'आर्यावत्र्त' और इसके निवासियों को आर्य कहा है। वीर सावरकर ने देश काल और परिस्थिति के अनुसार प्रचलित नाम हिंदू और हिंदुस्थान का प्रयोग किया है।

राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रधर्म दोनों ही इस विचारधारा की छलनी से निकलते हैं जिसे आर्यत्व या हिंदुत्व की छलनी कहा जाता है। यह छलनी हमारा ध्यान न केवल गीता की ओर अपितु संसार के उत्कृष्टतम ज्ञान के भंडार वेद की ओर भी आकर्षित करती है, जिससे यहां आर्यत्व का निर्माण हुआ।

आज इसी आर्यत्व को हम हिन्दुत्व कहते हैं, जिसकी रक्षा हमारी राजनीति का प्रथम और सर्वोपरि कत्र्तव्य होना चाहिए। यह सत्य है कि आर्यत्व से राजनीति का पतिव्रत धर्म तथा उसकी पवित्रता तो सुरक्षित रहेंगे ही साथ ही पारस्परिक बंधुता को बढ़ाने वाली भावना का भी निर्माण होगा। किंतु शर्त यह है कि पहले हम इस भावना से ऊपर उठें कि 'कोऊ नृप होई हमें का हानि' अब हम सोचें कि किस राजा के होने से हमें लाभ है और किसके होने से हानि? यह समय की आवाज है।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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