किसमें कितना है दम

  • 2017-03-08 06:30:16.0
  • राकेश कुमार आर्य

किसमें कितना है दम

पांच राज्यों के चुनावों की प्रक्रिया अब अपने अंतिम पड़ाव में है। सभी राजनीतिक दलों ने इन चुनावों में वैसे तो हर प्रांत में अपनी शक्ति का भरपूर प्रयोग किया है और जहां जिसका जितना दम है उसको दिखाने में कोई कसर नही छोड़ी है। परंतु उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जिस पर हर राजनीतिक दल ने कुछ विशेष ही ध्यान दिया है। इसका कारण यह है कि भारत के राज्यों में उत्तर प्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जिसने सबसे अधिक प्रधानमंत्री देश को दिये हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी उत्तर प्रदेश की बनारस लोकसभा सीट से चुने गये हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश से सारे विपक्ष का लगभग सफाया ही कर दिया था। सपा और कांग्रेस ने अपने-अपने परिवारों की परम्परागत सीटों को भी जैसे-तैसे ही बचाया था। जबकि मायावती की बसपा तो पूरी तरह साफ हो गयी थी।

ऐसे में उत्तर प्रदेश पर हर राजनीतिक दल की दृष्टि लगी है। सबसे पहले सपा+कांग्रेस के गठबंधन को ही लें। अखिलेश यादव अपने आप में एक गंभीर युवा राजनीतिज्ञ हैं, पर उन्होंने अंतिम समय में पिता मुलायम सिंह के साथ जो कुछ भी किया वह ठीक नहीं रहा। अब जबकि नेताजी पूर्णत: हाशिये पर चले गये हैं-तब अखिलेश के लिए यह पहला चुनाव है-जिससे उन्हें अपने आपको सिद्घ करना है। यदि वह चुनाव हारते हैं तो यह उनकी व्यक्तिगत हार मानी जाएगी और यह भी माना जाएगा कि पिता का आशीर्वाद न लेकर उन्होंने गंभीर गलती की थी। अखिलेश यादव भी इस बात को भली प्रकार समझते हैं कि यदि वह चुनाव हारते हैं तो उन्हें किस-किसके व्यंग्यबाण झेलने पड़ेंगे? उन्होंने विरासत तो ले ली है पर सियासत लेनी अभी शेष है। सियासत पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी पार्टी की पराजय ना हो, उन्होंने कांग्रेस के साथ सफलतापूर्वक गठबंधन किया। पिछला चुनाव उन्होंने और उनकी पार्टी ने अकेले लड़ा था, पर इस बार कांग्रेस को साथ लगा लेने का उनका निर्णय यह बताता है कि इस बार वह भीतर से हिले हुए थे। टूटे हुए मनोबल को बलशाली करने के लिए ही उन्होंने कांग्रेस को साथ लिया। पर अब चुनाव के अंतिम पड़ाव में आते-आते वह बार-बार कह रहे हैं कि बुआ (मायावती) चुनावों के उपरांत भाजपा को राखी बांधेंगी? इसका अभिप्राय है कि उन्हें अपना गठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है और वह चुनावोपरांत के उभरते समीकरणों को लेकर चिंतित हैं। वह मानते हैं कि गठबंधन के पिछडऩे और भाजपा के नंबर वन पार्टी बनने की स्थिति में भाजपा और बसपा प्रदेश में सरकार बना सकती है? चुनाव के अंतिम दौर में अखिलेश और उनके मित्र राहुल का आत्मविश्वास हिल सा गया है।
जहां तक राहुल गांधी की बात है तो वह भी यही चाहते हैं कि प्रदेश से भाजपा को दूर रखा जाए। इसके लिए उनके पास अपनी पार्टी की बलि चढ़ाने का सबसे बड़ा विकल्प था और उन्होंने उसे भी अपना लिया है, अर्थात कांग्रेस को सपा के सामने नतमस्तक करा दिया है। यद्यपि वह चुनाव अकेले लडक़र चुनावोपरांत की परिस्थितियों पर विचार करते हुए यदि सपा के साथ जाते तो अच्छा लगता। इससे जहां उनकी 'परिपक्वता' झलकती वहीं कांग्रेस को अपने राष्ट्रीय स्वरूप को बनाये रखने में भी सफलता मिली। अब वह भी उत्तर प्रदेश में इसीलिए अधिक समय दे रहे हैं कि यदि उत्तर प्रदेश हाथ से निकल गया तो बहुत अपमानित होना पड़ेगा। वह चिंतित हैं कि यदि यूपी हाथ से गया तो 2019 में संसद की सदस्यता भी हाथ से जा सकती है? इसलिए 'यूपी को पकड़ो और अपना अस्तित्व बचाओ'- यह मानकर राहुल गांधी यूपी में टिके हैं। उन्होंने सपा के साथ कुछ अन्य दलों के महागठबंधन को विरोध किया था। पर अब उन्हें समझ आ गयी लगती है कि ऐसा करके उन्होंने गलती की थी। उनकी चिंता 2017 से अधिक 2019 की है, वह समझ नहीं पा रहे हैं कि यदि चुनाव परिणाम उल्टे आये तो आगे चलकर 2019 में क्या होगा? यही कारण है कि वह उत्तर प्रदेश को हर स्थिति में अपना बनाये रखना चाहते हैं।
अब आते हैं बसपा पर। इसकी पार्टी सुप्रीमो बहन मायावती ने अपना पिछला कार्यकाल पत्थरों की मूत्र्तियों को बनवाने में लगाया। जिससे अबकी बार इनके प्रति जनता 'पत्थर दिल' हो गयी लगती है। लोगों ने बसपा से मुंह फेरा सा लगता है। मायावती ने 'खुरपा और बुर्का' का गठजोड़ किया है और इसी के आधार पर वह चुनावी वैतरणी को पार लगाना चाहती हैं। उन्होंने अपने पक्ष में दिल्ली के शाही इमाम से फतवा भी जारी कराया है। जिससे यूपी में मुस्लिमों को बसपा के साथ जाने को कहा गया है, पर इसका प्रभाव उल्टा हुआ है और हिंदू मतों का तेजी से भाजपा के पक्ष में धु्रवीकरण हो गया है। नोटबंदी की मार झेलती मायावती अब वोटबंदी में भी असफल रही हैं। उन्हें भी चिंता है कि यदि उत्तर प्रदेश इस बार निकल गया तो उनकी राजनीति हाशिये पर चली जाएगी। अत: वह भी पूर्ण मनोयोग से चुनावी परिणामों को अपने पक्ष में करने में लगी हैं। इस बार उनके भाषण को भी लोगों ने हल्के से लिया है। वह पढक़र बोलती हैं जबकि पी.एम. मोदी और सी.एम. अखिलेश बिना पढ़े बोलते हैं। लोगों ने मोदी और अखिलेश को अच्छे वक्ता के रूप में मान्यता दी है।
अंत में भाजपा की बारी आती है। इस पार्टी के लिए भी उत्तर प्रदेश का विशेष महत्व है। विशेषत: तब जबकि मोदी उत्तर प्रदेश के बनारस से सांसद हैं। जिन पांच प्रांतों में चुनाव हो रहे हैं उनमें से शेष चार प्रांतों की सारी सीटें भी उतनी नहीं हैं जितनी कि अकेली यूपी की सीटें हैं। इससे 'यूपी बनाम शेष चार' की तर्ज पर भाजपा इन चुनावों को लड़ रही है। यदि वह यूपी में सरकार बना पाती है तो तभी माना जाएगा कि देश का जनमानस उसके साथ है और वह 2019 में लोकसभा के चुनावों मेें भी सफलता प्राप्त कर सकती है। भाजपा उत्तर प्रदेश को हर स्थिति में अपने लिए लेना चाहती है। पी.एम. मोदी ने सारे चुनाव को राष्ट्रवाद के प्रमुख मुद्दे के रूप में बदल दिया है जिस पर उनका हर राजनीतिक विरोधी बगलें झांक रहा है। पी.एम. का विश्वास चुनावों के अंतिम चरणों में अधिक बढ़ता गया है। जिससे लगता है कि वह अपने कार्य से संतुष्ट हैं और चुनाव परिणामों को लेकर भीतर से प्रसन्न भी हैं। पर वास्तविकता की जानकारी तो 11 मार्च को ही होगी कि किसमें कितना दम है और किसने क्या किया है?