कश्मीर की कशिश के राजदार -2

  • 2016-07-28 08:30:59.0
  • राकेश कुमार आर्य

कश्मीर की कशिश के राजदार -2

कश्यप ऋषि के भगीरथ प्रयास से वितस्ता (झेलम) के आसपास नगर ग्राम बसाये गये। उनकी नाग-जाति का इन नगर ग्रामों के बसाने में विशेष योगदान रहा। इसके पश्चात उन्हीं के पुत्र नील को इस प्रदेश का प्रथम राजा होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इन्होंने बड़ी कुशलता से कश्मीर का शासन संभाला, इनकी शासन व्यवस्था और कश्मीर की संपन्नता की ख्याति ने दूर-दूर के देशों का ध्यान अपनी आकृष्ट किया।

उन्हीं के नाम से 'नीलमत पुराण

' की रचना अब से हजारों वर्ष पूर्व की गयी थी, जिसमें कश्मीर के विस्तृत इतिहास की जानकारी दी गयी है। नागपूजा मत, बौद्घमत, शैवमत जैसे मतों ने इस प्रदेश को सांस्कृतिक रूप से समृद्घ किया। वेदों की ऋचाओं का गान इस रमणीक और शांतिपूर्ण प्रदेश के कण-कण में आज तक रचा-बसा है। आज भी वैदिक ऋषियों के तप और त्याग का व्यापक प्रभाव इस प्रांत के वायुमंडल को सर्वोपयोगी, सर्वहितकारी और सबको शांति प्रदायक बनाये हुए है। यह इस भारतीय भू-भाग के सांस्कृतिक इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है जो विश्व इतिहास में अन्यत्र दुर्लभ है।

हर एक ऋषि को यहीं अपनी तपश्चर्या करने और विद्यादान करने हेतु विद्यालय, विद्यापीठ, शिक्षाकेन्द्र स्थापित करने का एक चस्का सा लग गया था। इसीलिए यहां विद्वानों पंडितों की भरमार रही। कालांतर में सभी कश्मीरियों को पंडित कहे जाने की यही स्थिति एक कारण बन गयी कि यहां का रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ही पंडित है।

राजतरंगिणी

राजतरंगिणी के लेखक कल्हण ने 'कश्मीर का इतिहास' लिखा। इस ग्रंथ में आगे आने वाले कई विद्वानों ने अपने-अपने समय में कश्मीर के विभिन्न राजाओं के कार्यों का उल्लेख किया। महाभारत के युद्घ से पूर्व कश्मीर में 'गोनंद' नामक राजा था। इसने श्रीकृष्ण के विरूद्घ जरासंध का भी साथ दिया था। इसके पश्चात इसके 'दामोदर' नामक लडक़े ने कश्मीर पर शासन किया। गोनंद को भी श्रीकृष्ण द्वारा ही मारा गया था तो इस दामोदर का विनाश भी उन्हीं के द्वारा हुआ। क्योंकि इसने उन पर उस समय हमला कर दिया था जब वह गंधार में एक विवाह संस्कार में सम्मिलित होने के लिए गये हुए थे।

इसके पश्चात श्रीकृष्ण के द्वारा दामोदर की पत्नी-रानी 'यशोमती' को कश्मीर की गद्दी पर बिठाया गया। यह रानी उस समय गर्भवती थी, जिसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसे इतिहास में गोनंद द्वितीय के नाम से जाना गया। कल्हण के अनुसार गोनंद द्वितीय के बाद

35 राजा हुए। इनमें से 23 राजा पांडव वंश के थे। मार्तण्ड तथा भव्य मंदिरों के भग्नावशेष पांडवलरी या 'पांडव भवन' कहलाते हैं।

अर्जुन का प्रपौत्र 'हरनदेव' जो कि हस्तिनापुर के राज्य के लिए अपने भाई जन्मेजय से लड़ा था, हस्तिनापुर से भागकर यहां पहाडिय़ों में आ छिपा था। यही एक दिन गोनंद की सेना में भर्ती होकर प्रधानमंत्री के पद पर पहुंच गया था। गोनंद द्वितीय के पश्चात यही प्रथम पाण्डव शासक के रूप में कश्मीर के अंदर स्थापित हुआ। यहां का शंकराचार्य मंदिर पाण्डव नरेश संदीपन की देखरेख में बनाया गया था। भीमसेन इसी वंश का एक ऐसा शासक था

, जिसके समय में कश्मीर का राज्य विस्तार होकर वह दूसरे देशों तक फैला।

इसके पश्चात इस भव्य प्रांत पर सम्राट अशोक का भी आधिपत्य रहा। उसके पश्चात कनिष्क, मिहिरकुल, मेधवाहन, दुर्लभवर्धन जैसे शासकों ने भी कश्मीर पर अपनी अच्छी बुरी छाप छोड़ी। इसके पश्चात अरब हमलावरों का मुख मोडऩे वाला महान शासक चंद्रापीड कश्मीर को मिला। इसने सन

713 में चीनी दरबार में अपना एक दूत इस आशय से भेजा था कि चीन की सहायता से वह अरब से युद्घ करे। गोपीनाथ श्रीवास्तव जी के अनुसार चीन भी इस महान शासक की महत्ता को स्वीकार करता था।

यह एक न्यायप्रिय शासक था। अरब आक्रमणों को रोकने के लिए चीन की सैनिक टुकडिय़ां कश्मीर के राजा चंद्रापीड की सहायतार्थ पहुंची। इससे पूर्व हर्षवर्धन की केन्द्रीय सत्ता के अधीन कश्मीर को रहना पड़ा था।

सम्राट ललितादित्य के समय कश्मीर के पराक्रम की दुुंदुभि देश में ही नही अपितु विदेशों में भी बजी। इस प्रतापी और पराक्रमी शासक के शासनकाल में कश्मीर का राज्य पूर्व में तिब्बत से लेकर पश्चिम में ईरान और तुर्किस्तान तक तथा उत्तर में मध्य एशिया से लेकर दक्षिण में उड़ीसा और द्वारिका के समुद्रतटों तक पहुंच गया था। इस प्रतापी शासक के समय में कश्मीर ने अपनी साख और धाक दुनिया में सफलता पूर्वक स्थापित की थी।

कश्मीर का 'मार्तण्ड मंदिर' इसी शासक के शासनकाल की देन है। जिसे सभी इतिहासकारों ने कश्मीरी हिंदू कला का एक आदर्श माना है। वस्तुत: यह काल हिंदू स्वाभिमान का काल था। जिसने शासक के सभी गुणों से युक्त कश्मीरी पुत्र ललितादित्य को विश्व इतिहास के लिए दिया था। सम्राट 'ललितादित्य' के वंश में 'जमापीड' और

'जयहिंद' नामक दो अन्य शासक भी हुए थे। इसके पश्चात प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर प्रांत इस धरती के स्वर्ग पर सम्राट 'अवन्तिवर्मन' का शासन स्थापित हुआ। इसने 28 वर्ष तक बड़ी कुशलता और सफलता के साथ कश्मीर पर शासन किया। इस शासक ने नदियों पर बांध बनाने के साथ-साथ विकास, निर्माण और जन-कल्याण के कार्यों पर भरपूर ध्यान दिया। आज इसी कश्मीर को जिसके साथ भारत के अतीत का गौरव जुड़ा है, पाकिस्तान का नवाज शरीफ हड़पने की गीदड़ धमकी देता है-तो उसकी बुद्घि पर तरस आता है। अब उसे यह पता होना चाहिए कि भारत अपना इतिहास भी जानता है और आज का भारत का युवा अपने इतिहास को बनाना भी जानता है।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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