इस्लाम का जेहाद

  • 2016-08-13 04:00:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

इस्लाम का जेहाद

इस्लाम ने संसार में अपने मानने वालों को शांति और भाईचारे का संदेश दिया। किंतु दुर्भाग्यवश इसका यह भाईचारा अपने मजहबी भाइयों तक ही सीमित है। इसने संसार को दो भागों में बांटकर देखा है। प्रथम तो वह लोग अथवा देश जो इस्लाम को स्वीकार कर चुके हैं अर्थात 'दारूल इस्लाम' और दूसरे वे लोग या देश जहां अभी इस्लामीकरण होना है अर्थात 'दारूल हरब'।

जहां इस्लामीकरण होना है वे लोग या देश इस्लाम के भाईचारे की परिभाषा से अलग हैं। इन्हें इस्लाम 'काफिर' मानता है जिनके इस्लामीकरण के लिए वहां जेहाद की आवश्यकता बताता है।

देखिये एम. मुजीब के शब्दों में-''भले ही अविश्वासियों (काफिरों) ने कोई कैसा भी आक्रमण न किया हो।'' अविश्वासियों के विरूद्घ धर्मयुद्घ जिहाद, की वैधानिकता के विषय में बुहरानुद्दीन भाष्य हिदाया के अनुसार-''जेहाद कयामत के दिन तक चलने वाला स्थायी युद्घ है।'' पूर्णत: स्पष्ट और असंदिग्ध है। इस्लाम में व्यवस्था है कि विधर्मियों को मारो, काटो, लूटो और जैसे चाहो यातनाएं दो। उन्हें बता दो कि इस मारकाट और लूट अत्याचार से वे तभी छूट सकते हैं जबकि या तो इस्लाम स्वीकार कर लोगे या मार दिये जाओगे। पैगम्बर साहब ने इस विषय में कहा है कि-''जो कोई भी अविश्वासी (काफिर) की हत्या करेगा वही संपत्ति और बहिश्त का भी अधिकारी होगा। कुरान शरीफ में अल्लाह ने कह दिया कि-'जो कुछ तुम्हें लूट (गनीमत) में मिलता है खाओ, उपभोग करो-वह सब वैध और अच्छा है। लूट में यदि स्त्रियां पल्ले पड़ती हैं जो वह भी लूटने वालों की संपत्ति ही मानी जाएगी। 'जिहाद' और जिहाद के सहारे लूट, और लूट के पश्चात मार काट। इस्लाम के इस जीवन दर्शन ने इस्लाम के भाईचारे की नींव हिलाकर रख दी। अत: मानवता को यातनापूर्ण ढंग से यहां मार दिया गया।

चूंकि जिहाद, लूट, खसोट मार-काट का खेल मानवता की सेवा में नही अपितु निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया गया। फलस्वरूप ये सारी विशेषताएं और विशेषण इस्लाम का पर्याय बन गये। यह सर्वमान्य तथ्य है कि हमारी कृति, हमारे चिंतन का और चिंतन और हमारे भावों के सूक्ष्म विग्रह का परिणाम होता है। भाव हिंसक होंगे तो चिंतन भी हिंसक होगा और यदि चिंतन हिसक है तो कृति भी हिंसक ही होगी।

इस कृति का संसार के स्थूल संबंधों पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा करता है। इस्लाम की कृति स्वार्थ पूर्ण और हिंसक रही तो ऐसा नही रहा कि वह दूसरे संप्रदायों के लोगों के प्रति ही हिंसक रहता अपितु इस्लाम स्वयं अपने लोगों के प्रति भी हिंसक ओर स्वार्थपूर्ण हो गया। यही कारण है कि इस्लाम का इतिहास खून खराबे का इतिहास बन गया है। इसके बादशाह्र नवाब और सुल्तान अधिकतर खून खराबे से ही पैदा और खून खराबे से ही मरे। भाई को मारा, बाप को मारा, बहन को मारा और अन्य संबंधियों तक को मारा गया। इससे स्वार्थ घर में आ घुसा। आज भी संसार में जहां इस्लामी देश है, सरकारें हैं, वहीं-वहीं रक्तपात, हिंसा, मार-काट और अनाचार का बोलबाला है। लोकतंत्र के स्थान पर भय और डर का पर्याय तानाशाही शासन वहां स्थापित है। जहां स्वार्थ, भय और आतंक का साया हो वहां माता-पिता के प्रति सम्मान भाव रखना पुस्तकीय ज्ञान की बात तो हो सकती है किंतु व्यवहारिक जीवन व्यवस्था और जीवन दर्श में माता-पिता भी उपेक्षा और तिरस्कार का पात्र बनकर रह गये हैं।

आंतरिक विघटन
जिस आतंक को वह बाहर विधर्मियों के लिए बिखेरता रहा वह शनै: शनै: उन्हीं के घर में बिखर गया। चूूंकि विखण्डन इस्लामिक दर्शन का एक अनिवार्य तत्व है इसीलिए उसने मजहबी आधार दुनिया को बांटने के लिए दिया, जिहाद दिया और फिरकापरस्ती को बढ़ावा दिया। इससे मानव का मानव से रिश्ता तंग हुआ एक राष्ट्र के दूसरे राष्ट्र से संबंध तनावपूर्ण बने, और अंत में मुंह लगे हुए रक्त ने निकट के संबंधों (यथा माता-पिता आदि) को भी अपनी लपेट में ले लिया।
इसके अतिरिक्त इस्लामिक जीवन व्यवस्था में आत्मा को भी पैदा हुआ माना जाता है और फिर व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही उसकी आत्मा को भी मरा हुआ समझ लिया जाता है। इसके पश्चात पुनर्जीवन अथवा आत्मा के पुनरागमन की व्यवस्था इस्लाम में नही है। इसके कारण साधारण मुस्लिम की भी यह सोच है कि जब पुन: आना ही नही है तो फिर जैसे चाहो रह लो। किसी पाप-पुण्य का फल मिलकर पुनर्जीवन तो होना नही। इसलिए हिंदू की भांति मुस्लिम परिवारों में यह सोचकर कि यदि हम माता-पिता की सेवा करेंगे तो अगले जन्मों में भी उसका लाभ हमें मिलेगा, माता-पिता की सेवा की ओर अधिक ध्यान नही दिया जा रहा। 'स्वार्थ' की अंतिम परिणति इसी रूप में हुआ करती है। दूसरों की लूट 'घर की लूट' का कारण बन गयी। अत: इस्लामिक परिवारों में भी आज माता-पिता के चेहरे पर फीकापन, रूखापन और नीरसता का भाव मौजूद है।

हिन्दू की स्थिति
हिन्दू परिवारों की भी स्थिति दयनीय है। इसकी स्थिति के होने के कारण पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण है जिस अपसंस्कृति को अपनाकर स्वयं पश्चिम का मन भर चुका हे उसे भारत अपना रहा है, यह श्लोक की बात है। जबकि हमारे यहां नीतिाकरों की मान्यता रही है कि-
अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्घोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धयन्त:आयुर्विद्या यशोबलम्।।

अर्थात बड़ों के प्रति अभिवादनशील और सेवाभावी होने वाले की आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं। बड़ों में माता-पिता तो सम्मिलित हैं ही, गुरू और संसार के अन्य वृद्घ भी उसमें सम्मिलित है। हमारी संस्कृति में ऐसे माता-पिता को लताड़ा गया है जो कि अपने बच्चों को पढ़ाते नही हैं, शिक्षित नही कराते हैं। क्योंकि वे बच्चे हंसों के मध्य बगुले की भांति सीाा में शोभित नही होते। इसलिए शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य है यथा-
माता शत्रु पिता बैरी येन बालो न: पाठित।
न शोभते सभा मध्ये, हंस मध्ये बको यथा।

अर्थात वो मां-बाप अपनी संतान के दुश्मन हैं जो उन्हें अच्छी शिक्षा नही देते, इसलिए उनकी संतान विद्वानों के बीच इस प्रकार अशोभनीय होती है जिस प्रकार हंसों की सभा में बगुला।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.