जर, जोरू और जमीन

  • 2017-02-16 06:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

जर, जोरू और जमीन

भारतीय समाज में सामान्यतया जनसाधारण को यह कहते हुए सुना जाता है कि जर, जोरू और जमीन पर तो विश्व हमेशा से लड़ता आया है। हम विचार करें कि यह कथन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संदर्भ में कितना प्रासंगिक और सार्थक है? गहराई से पड़ताल की जाए तो ज्ञात होता है कि इस जर, जोरू और जमीन पर चाहे दुनिया लड़ती रही हो या लड़ रही हो, परंतु भारत नहीं लड़ा, परंतु आज यदि कहीं लड़ रहा है या लड़ता हुआ दिखलाई दे रहा है तो किसी अन्य संस्कृति के संपर्क में आने से उसका रंग चढऩे के कारण ऐसा हो रहा है।

देखिये जर का अर्थ जरिया अथवा धन से है। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो सारा संसार भौतिकवाद में जिस प्रकार आकण्ठ डूबा हुआ है उसे देखकर यही निष्कर्ष निकलता है कि सारा संसार ही धन के लिए लड़ रहा है। नित्य प्रति के समाचार सुनते हुए कान पक चुके हैं, और आंखें थक चुकी है जिनमें धन को लेकर अपहरण, लूट, हत्या, डकैती और बलात्कार की घटनाएं सम्मिलित होती हैं। ये सारी घटनाएं स्वार्थी लोगों के संसार में हुआ करती हैं। परंतु भारतीय संस्कृति तो त्याग और परमार्थ की संस्कृति है।

श्रीराम का आदर्श
यहां राम सिंहासन त्याग देते हैं, भरत के लिए और भरत सिंहासन त्याग देते हैं बड़े भाई राम के लिए। यहां विभीषण का अधिकार मानते हुए उसकी लंका उसी को राम सौंप देते हैं।

श्रीकृष्ण का आदर्श
यही स्थिति कृष्णजी की है। वह भी उग्रसेन को राज्य सौंप देते हैं, कंस को मार कर। हस्तिनापुर को सौंप देते हैं युधिष्ठिर को, महाभारत युद्घ के पश्चात। जहां साम्राज्य को भी इस प्रकार उसी व्यक्ति को सौंप दिया जाता है, जिसका उस पर वास्तव में (विजय के पश्चात) अधिकार है, वहां उन लोगों ने भौतिक धन की लड़ाई को कितना सार्थक माना होगा? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

भर्तृहरि का त्याग
यहां कितने ही 'भर्तृहरि' हो गये जिन्होंने धन को ठुकरा दिया, ऐश्वर्य को त्याग दिया केवल आत्मतत्व की खोज के लिए। क्योंकि भारत ने और केवल भारत ने यह सच सोचकर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया है कि-
''आनंद संसार के ऐश्वर्यों में नहीं, अपितु अपने अंतर को खोजने में है।'' इसलिए जर को हेय मानकर और त्याज्य समझते हुए यहां उसकी उपेक्षा की गयी है। धन ऐश्वर्यों का स्वामी होने के लिए वेद ने हमें आदेशित किया है, किंतु इस प्रतिबंध के साथ कि हमारा धन दूसरों के कल्याण में सहायक हो। चाहे कोई दूसरे देश का रहने वाला हो चाहे दूसरे मत, पंथ, संप्रदाय को मानने वाला हो हमारे किसी भी धर्मशास्त्र में हमें किसी को लूटने और लूटकर उसकी संपत्ति का उपभोग करने के लिए प्रेरित नहीं किया गया। हमारी मान्यता रही है कि धन चाहे जितना कमाओ, खूब कमाओ पर धन कमाने के साथ-साथ साधन की पवित्रता और साधना की उच्चता अवश्य होनी चाहिए, कहीं पर भी किसी भी धर्मशास्त्र में ऐसा निर्देश नही है। धन अपवित्र साधनों से कमाओ। जिस संप्रदाय ने यह बात भारतीय समाज में प्रचलित की है कि-''जर, जोरू और जमीन पर तो दुनिया हमेशा लड़ती आयी है'' उनके (मुस्लिम संस्कृति में) यहां इसका स्पष्ट निर्देश मिलता है। इन तीनों शब्दों की उत्पत्ति भी उन्हीं की भाषा से हुई है।

इस्लामी मान्यताएं
''गैर मुस्लिमों से जो धन माल, स्त्री, गुलाम आदि प्राप्त होते हैं उनका पांचवां भाग अल्लाह के नाम पर उसके पैगंबर का और बाकी लूटने वाले आक्रांताओं का होगा।''
भारत में ही नहीं अपितु शेष संसार में भी इस मान्यता के अनुरूप कार्य करने वाले जहां-जहां गये, वहां-वहां उन्होंने लूटमार की। यह क्रम विश्व में सैकड़ों वर्षों तक अनवरत चलता रहा। भारतीय धर्म इस काल में बचाव की मुद्रा में था। अकर्मण्यता और धार्मिक पाखण्डवाद के अंधकार में उसके दीपक की ज्वाला जल तो रही थी, किंतु बहुत ही मद्घम गति से जल रही थी। अत: संसार से उसका मानवतावाद का संदेश दबे कदमों अपना आकार सिमेटता जा रहा था। फलस्वरूप संसार ने उस लूट को ही अपना धर्म मान लिया जो मजहब के रूप में लूट का तांडव मचा रहा था।

संस्कृति पर आई विकृति
भारत में सांझा संस्कृति का राग अलापने वाले ध्यान दें। यह जो लूटमार की संस्कृति है-जिसका रंग भारतीय संस्कृति पर यत्र-तत्र चढ़ता हुआ दिखलाई पड़ता है, इसकेे विषय में यही कहना पड़ेगा कि इस विकृति को यहां पर इस्लाम ने परोसा है। भारत और उसकी संस्कृति ने इसे जितने अंश तक ग्रहण किया है उतने ही अंश में उसकी संस्कृति मेें विकृति उत्पन्न हुई है। जर के लिए इस्लाम अपने जन्मकाल से आज तक लड़ रहा है, और तब तक लड़ता रहेगा जब तक उसे इसके लिए प्रेरित करने वाले अंश उनकी मजहबी किताब में विद्यमान रहेंगे।
उसकी सैकड़ों वर्षों की इस अंतहीन लड़ाई ने ही समाज में यह धारणा रूढ़ बना दी है कि जर, जोरू और जमीन पर तो दुनिया हमेशा से लड़ती आयी है।

स्त्री व्यथा
अब बात आती है जोरू की। जोरू (स्त्री) को संसार में जिन लोगों ने पुरूष की भोग्या वस्तु के रूप में माना है, उन्होंने ही समाज में उसे बाजार दिया है और उसे बाजार की वस्तु बनाया है। उसे पर्दे में, बुर्के में, अशिक्षा के अज्ञानांधकार में छिपाकर कैद किया है। यहां विचारणी बात ये है कि भारत में ऐसा कुप्रभाव का काल कब आया? तब आया जब बादशाह, नवाब, अमीर-उमराव और गांव के चौधरी तक ने अमर्यादित आचरण करते हुए दूसरों की बहू बेटियों को बलात अपने घर में रखना आरंभ कर दिया था। यह काल नि:संदेह भारत में मुस्लिम शासन में ही आया था। अन्यथा भारत में तो नारी को भोग्या नहीं अपितु पूज्या माना गया है।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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