किसानों की आत्महत्या के पीछे कहीं 'हरित क्रांति' तो नहीं?

  • 2016-11-08 08:00:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

किसानों की आत्महत्या के पीछे कहीं हरित क्रांति तो नहीं?

जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने देश में उस समय 'जय जवान-जय किसान' के नारों के जोश से बने राष्ट्रीय परिवेश को और भी गति देने का मन बनाया। गांधीजी की अहिंसावादी कांग्रेस और अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू की शांतिवादी कांग्रेस की छत्रछाया में पली बढ़ीं इंदिरा गांधी ने एक झटके में यह समझ लिया था कि अहिंसावाद और शांतिवाद की अपनी-अपनी सीमाएं क्या हैं? और उन्हें राष्ट्रीय परिवेश में राष्ट्रीय नेतृत्व को किस सीमा तक अपनाना चाहिए? यही कारण था कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने इन दोनों (गांधी-नेहरू) नेताओं को अलग रखकर 'शास्त्रीवाद' को आगे बढ़ाया। इस तथ्य को बहुत कम लोग जानते हैं कि 1947 से 1965 तक अहिंसावाद और शांतिवाद की डगर पर आगे बढ़ते भारत को शास्त्रीजी के नेतृत्व में यह समझ आ चुकी थी कि देश के लिए ये नीतियां घातक होंगी और इनसे अलग हटकर कुछ नया करने की आवश्यकता है। यही कारण रहा कि शास्त्रीजी ने 'जय जवान' (देश को सैन्य शक्ति से मजबूत करना) जय किसान (देश को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करना) की नीति का आसरा लिया। इसी को 'शास्त्रीवाद' कहा जा सकता है। अपने व्यवहार से विनम्र और दिखावट से सदा दूर रहने वाले शास्त्रीजी ने अपने नाम के साथ यद्यपि किसी 'वाद' को जोडऩे का प्रयास नही किया, और ना ही उस समय उन्होंने यह संकेत दिया कि वह इतिहास की पड़ताल कर इतिहास बदलने का निर्णय ले चुके हैं। पर उन्होंने अपनी कार्यशैली से यह सिद्घ कर दिया था कि वह इतिहास को नई दिशा दे चुके थे। यह नई दिशा इतनी स्पष्ट और प्रबल थी कि स्वयं पं. नेहरू की बेटी इंदिरा को भी यही नीति अपनानी पड़ी। यद्यपि कांग्रेसी चाटुकारों ने कांग्रेस के 'शास्त्रीवाद' के नये संस्करण का नाम भी 'नेहरूवाद' ही बनाये रखा, जिससे कि 'गांधी नेहरू परिवार' से पहली बार बाहर से बने इस महान नेता का नाम चमके नही।


श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में पहले दिन से ही देश के सैन्यीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाने आरंभ किये और जिस दिशा में शास्त्रीजी आगे बढ़े थे उसी पर बढ़ते हुए पाकिस्तान को हमारी मजबूत सेना के बल पर दो भागों में फाडक़र रख दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने देश में 'हरितक्रांति' का बिगुल फूंका। जिससे देश में उत्पादन की स्थिति बेहतर हुई और किसानों की समृद्घि में वृद्घि हुई। पर किसानों की यह आर्थिक समृद्घि अधिक देर तक स्थायी न रह सकी। लगभग 40-45 वर्ष बाद ही देश में किसानों ने आत्महत्या का रास्ता अपना लिया। ऐसा क्यों हुआ? इस पर विचार करने की आवश्यकता है। वास्तव में हमारी सरकार ने विदेशों से कम्पोस्ट खादों का आयात करना आरंभ किया और देश की धरती पर उसके प्रयोग से उत्पादन बढ़ाने का कार्य किया। उस समय तो थोड़ी सी लागत में अधिक उत्पादन आरंभ हो गया, परंतु बाद में धीरे-धीरे देश की धरती की उत्पादकता क्षीण होती चली गयी, और हमने देखा कि जो काम 5 किलो यूरिया से हो रहा था वह बढ़ते-बढ़ते 50 किलो यूरिया प्रति बीघा तक पहुंच गया। अब लागत अधिक और उत्पादन कम हो गया, या कहीं-कहीं उत्पादन इतना अधिक बढ़ा कि उसका बाजारू मूल्य लागत से भी कम मिलने लगा। जैसे कई बार सब्जियां इतनी अधिक पैंदा हो जाती हैं कि उन्हें बाजार में जब किसान लेकर जाता है तो उनकी कीमत डेढ़ दो रूपया किलो तक मिलती है और बाजार तक पहुंचाने में ही उस सब्जी के लिए किसान को किराया इतना अधिक देना पड़ जाता है जो उसकी कुल कीमत से अधिक होता है। तब वह क्या करे?

देश का विपक्ष सरकार को कोस रहा है और सरकार अधिकारियों पर शिकंजा कस रही है कि किसानों की आत्महत्या का कारण खोजो, अधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठे रहकर नीचे वालों को आदेश दे रहे हैं कि कारण खोजो। अब सबसे नीचे वाला (जिसकी योग्यता ऊपर वालों से बहुत कम है) जैसे भी लिखा पढ़ी करके भेज दे, वही ऊपर तक चली जाती है। संभवत: लोकतंत्र को इसीलिए मूर्खों का शासन कहा जाता है कि यहां योग्य व्यक्ति भी अयोग्य लोगों की लिखा पढ़ी को ही आगे पीछे बढ़ाते रखने की कदमताल करते रहते हैं।

इस लोकतंत्र में गहरी दरारें हैं। इतनी गहरी कि उन्हें पाटना कठिन है। व्यवस्था का सारा ध्यान इन दरारों को आम आदमी की नजरों से छुपाकर रखने पर ही लगा रहता है। सारी व्यवस्था छुपकर खेल खेलती रहती है, सब दर्द का मजाक तो उड़ाते हैं पर दर्द की दवा नही करते। किसान के दर्द की दवा है उसे सस्ती खेती करने के लिए जैविक खाद उपलब्ध कराना, नदियों का पानी रोककर व नहरें बनाकर खेतों की सिंचाई के लिए सस्ता जल उपलब्ध कराना, सस्ते कीटनाशक बनाकर उन्हें किसान तक पहुंचाना, अच्छे बीज उपलब्ध कराना।

हम देखते हैं कि गोबर की खाद के लिए गाय की आवश्यकता है और मांसाहारी नेताओं को मांसाहारी लोगों की राजनीति करनी होती है, इसलिए वे किसानों के लिए गाय की रक्षा न होने देने के लिए संसद में बिल पास नही होने देंगे, किसान के लिए सस्ती गोबर की खाद उपलब्ध न होने देने वाले ये नेता किसान को आत्महत्या के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उकसाते हैं इसलिए ये नेता किसान के दुश्मन नं. 1 हैं, दूसरे ये कमीशनखोर अधिकारी हैं जो कीटनाशकों या खादों के लिए विदेशों की ओर ही भारत को देखते रहने के लिए प्रेरित करते हैं, तीसरे सरकारों की और पक्ष प्रतिपक्ष की वह मूर्खता है जिसके चलते यह सब एकजुट होकर राष्ट्रीय नीति न बनाकर किसानों को लेकर केवल लड़ते-झगड़ते रहते हैं। ये नाटक करते हैं और सच को सामने नही आने देना चाहते। ऐसी नीति न बनने देना चाहते हैं जिससे सत्तारूढ़ पार्टी को कोई श्रेय मिले अर्थात समस्या को उलझाये रखना चाहते हैं। सचमुच देश के लिए 'हरित क्रांति' जी का जंजाल बन चुकी है, इसकी जड़ें सूख चुकी हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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