भारत का यज्ञ विज्ञान और पर्यावरण नीति, भाग-2

  • 2017-06-23 06:30:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत का यज्ञ विज्ञान और पर्यावरण नीति, भाग-2

कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता
विज्ञान का यह भारतीय सिद्घांत है कि कोई भी पदार्थ यथार्थ में कभी भी समाप्त नही होता, वरन उसका रूपांतरण ही होता है। संसार के अन्य लोग इस आत्मतत्व को आज तक नही समझ सके, वे लोग आज भी (जबकि विज्ञान का युग है) शरीर के अंत को ही आत्मा का नाश मान लेते हैं। जबकि भारतीय ऋषि और आज का अशिक्षित भारतीय भी इसे चोले का परिवर्तन ही मानता है।

पथिक (आत्मा) के पथ का मोड़ मानता है, यात्रा की समाप्ति नहीं। यहां तक कि आवागमन के चक्र से छूटने के लिए मुक्ति के लिए प्रयासरत साधकों के सामने भी मुक्ति से पुनरावृत्ति का यक्ष प्रश्न खड़ा रहता है। अत: परिवर्तन वहां भी है। यात्रा पूर्ण वहां भी नही होती। क्रम निरंतर जारी रहता है। पदार्थ की सत्ता (आत्मतत्व की) वहां भी बनी हुई है। इस भारतीय सिद्घांत की ईसाइयत और इस्लाम ने उपेक्षा की। इसलिए संसार में अवैज्ञानिक मान्यताओं की समस्या का जन्म हुआ। आप देखें यदि लाल मिर्च को आग की भट्टी में डाल दिया जाए तो परिणाम अत्यंत कष्टकारी आता है। जहां तक वह लाल मिर्च हवा के द्वारा सूक्ष्म रूप में प्रवाहित होती है वहां तक लोगों का जीना हराम कर देती है, इससे इससे यही सिद्घ होता है कि-''अग्नि में डाला गया पदार्थ नष्ट न होकर वह अपने सूक्ष्म अणु परमाणुओं में विभाजित हो जाता है। तब उसके गुणों में कई गुणा वृद्घि हो जाती है।''

बस! यही बात भारतीय यज्ञ-विज्ञान का आधार है। दुख की बात है कि भारतीय राजनैतिक नेतृत्व ने इस सिद्घांत को 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर रूढि़वाद मानकर उपेक्षित किया है।

यज्ञ का रहस्य
अक्षर विज्ञान पर ध्यान दिया जाए तो यज्ञ शब्द के बड़े सुंदर अर्थ हैं। यह शब्द य, ज, ञ तीन अक्षरों से मिलकर बना है। यकार का अर्थ 'पूर्ण गति' जो और भिन्न वस्तु है। जबकि जकार का अर्थ 'जन्म' और 'ञकार' का अर्थ नहीं है।

अत: दोनों में (ज और ञ से) बने हुए ज्ञकार का अर्थ अजन्मा, नित्य आदि हुआ। संसार में अजन्मा और नित्य दो ही पदार्थ हैं, एक चेतन और दूसरा जड़। एक गुण कर्म है और दूसरे का गुण ज्ञान है। इसीलिए यह 'ज्ञ' कर्म सूचित कराने के लिए 'यज्ञ' आदि शब्दों में आता है।

इस प्रकार कर्म और ज्ञान पूर्ण गति के दो आधार स्तंभ हैं या ये कहिये कि पूर्णगति (य) कर्म और ज्ञान से ही संभव है। इसलिए यज्ञशील व्यक्ति अकर्मण्य नहीं हो सकता। वह ईश्वरवादी तो होता है किंतु भाग्यवादी नहीं हो सकता। अकर्मण्यता और हमारी भाग्यवादिता ने हमें किस प्रकार पराधीन बनाया? इस विकृति को हमने इतिहास के पन्नों से अपने लिए स्वयं ही देख लिया है कि इसका परिणाम कितना घातक होता है? हमें पूर्ण की प्राप्ति करनी है तो वह ज्ञान और कर्म से ही मिलनी संभव है।

धन्यवाद का नाम है यज्ञ
हम किसी के काम आते हैं तो दूसरा व्यक्ति हमें धन्यवाद ज्ञापित करता है। यही व्यवहार हम दूसरों के प्रति स्वयं भी करते हैं। धन्यवाद का यह आदान-प्रदान कृतज्ञता का आदान प्रदान है। जैसे कोरा शब्दजाल लोकाचार ही नहीं कहा जा सकता, अपितु इसके पीछे हमारे हृदय के कोमल भाव भी छिपे होते हैं, जो हमें दूसरों के प्रति विनम्र, उदार, सहिष्णु और कृतज्ञ बनाते हैं। जिससे मानव समाज का वातावरण सहज, सरल और सरस बनाता है तथा हमारे एक दूसरे के संबंध आपस में मानवीय बनते हैं। अब थोड़ा और चिंतन करें, देखो ईश्वर ने हमें क्या-क्या दिया है? उत्तर है-सब कुछ। नदी, नाले, पहाड़, वृक्ष, झरने, हीरे, मोती, माणिक्य, सोना, चांदी, अच्छा स्वास्थ्य आदि। सब उसी की देन है और वह देन भी हमारे अपने कल्याण के लिए। उस परमपिता परमात्मा के हर कार्य से आवाज आ रही है-स्वाहा अर्थात स्व को आहूत करने की। परमार्थ की और लोककल्याण की।

(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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