भारत का यज्ञ विज्ञान और पर्यावरण नीति, भाग-10

  • 2017-07-05 03:00:46.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत का यज्ञ विज्ञान और पर्यावरण नीति, भाग-10

पांच प्रतिशत बनाम पिचानवें प्रतिशत का अनुपात हुआ करता है। किंतु इसके उपरांत भी पिचानवें प्रतिशत लोगों को रास्ता दिखाने और बताने का कार्य ये पांच प्रतिशत लोग ही किया करते हैं।


कहने का अभिप्राय है कि जमाना पिचानवें प्रतिशत लोगों से बनता है, किंतु जमाने को सही दिशा या रास्ता सिर्फ पांच प्रतिशत लोग ही दिखाया करते हैं। वे जमाने को पकडक़र खड़े हो जाते हैं, रोक लेेते हैं उसका रास्ता बनाते और बताते हैं उसे नया और सही मार्ग दिखाते हैं।
हम भारत के परिवेश में व्याप्त मौन आवाह्न को सुनने वाले लोगों की संख्या से आशान्वित हैं। आवश्यकता इस संख्या के धु्रवीकरण करने की है इसकी बिखरी हुई शक्ति जिस दिन एक हो जाएगी, उस दिन भारत भूमि पुन: क्रांतिकारियों की पावनभूमि बन जाएगी। भारत का नवयुवक जिसे नींद की गोली देकर सुला दिया गया है, वह इतना गहरा कभी नहीं सो सकता कि वह कभी भविष्य में जागेगा ही नहीं।

भारत माता वीर प्रस्विनी है, इसकी गोद न कभी खाली हुई है और न कभी खाली हो सकती है, इतिहास इस बात का साक्षी है। देखिये, उद्बोधन के रूप में हमारी युवा पीढ़ी के लिए विश्वख्याति प्राप्त राष्ट्रकवि 'त्रिपाठी कैलाश आजाद' जी की निम्न पंक्तियां कितनी प्रेरणाप्रद हैं :-
उठो, वर्तमान अभी ध्वस्त हुआ नहीं।
बढ़ो, स्वाभिमान अभी, ग्रस्त हुआ नहीं।।
तोड़ दो, दुरभिसंधियों के जला जंजाल।
जागो, दिनमान अभी अस्त हुआ नहीं।।

फिर भी रास्ता मिलेगा
भारत पुरातन और सनातन राष्ट्र है। इसका धर्म सनातन है, इसकी संस्कृति सनातन है। यह पुरातन और सनातन का मेल बड़े सौभाग्य से मिला करता है। जो राष्ट्र संसार में पुरातन तो रहे किंतु सनातन नहीं, वे रूढि़वाद के मकडज़ाल में फंसकर नष्ट हो गये। आज वे नाम शेष हैं। अथवा स्मृति शेष है, उनका सब कुछ उजड़ चुका है, किंतु भारत आज भी पुरातन और सनातन स्वरूप के कारण संसार में 'अधुनातन' बना खड़ा है।
वास्तव में भारत की पुरातनता और सनातनता (वैदिक धर्म) ही वह बात है जिसे मौलाना इकबाल ने आश्चर्य से ढूंढ़ते हुए कहा था-

'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।'

जब तक यहां वेद की वाणी का उदघोष सुनने को मिलता रहेगा, उपनिषदों से बौद्घिक मार्ग दर्शन मिलता रहेगा, आत्मिक भोजन मिलता रहेगा, गीता का कर्मयोग हमें प्रेरित करता रहेगा और ऋषियों की वाणी हमारे कानों में मिश्री घोलती रहेगी, तब तक हममें अपने भविष्य के प्रति जागरूक रहने की प्रवृत्ति तो बनेगी ही, साथ-साथ उसके प्रति निराशा के अथक चिंता के भाव भी नहीं पनपेंगे।
अत: हम मानकर चलते हैं कि अपार आपत्तियों और विपत्तियों के उपरांत भी हमें रास्ता मिलेगा। भारत चमकेगा और पुन: जगदगुरू के प्रतिष्ठित पद पर विराजमान होगा।

संसार की भूख
भारत चमके यह संसार की भूख है। इसके लिए विश्व स्तर पर घटित घटनाओं का सूक्ष्मता से अवलोकन करने की आवश्यकता है। संसार में भौतिकवाद की चकाचौंध भारतीय संस्कृति का गला घोंट रही है। अफरा तफरी, मार-काट, हिंसा, भयंकर रोग व तनाव से व्यक्ति जीता हुआ भी मरा-मरा सा है। उसके चेहरे की आभा कहीं खो गयी है, ओज ढल गया है। उसे आवश्यकता है-उचित मार्गदर्शन की। जिसे केवल 'भारतीय संस्कृति' ही दे सकती है। उसे भोग में रोग मिला है और शोक मिला है। उसे आवश्यकता है शाश्वत सुख और शांति की, जबकि उसे इनके स्थान पर कलह क्लेश मिल रहे हैं। सांसारिक ऐश्वर्यों के पीछे भागते-भागते उसके मन का मोर मूच्र्छित सा पड़ा हुआ है, इसलिए वह लौट रहा है उस पावन और महान भारतभूमि की ओर जहां उसे अध्यात्म की ज्ञान गंगा, सच्चे सुख और शांति की उपलब्धि करा सकती है। सारे पश्चिमी देशों में योग और भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक पक्ष से जुडऩे की बहती हवा इस दिशा में एक शुभ संकेत है।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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