भारत की हिन्दू संस्कृति बनाम सांझा संस्कृति, भाग-4

  • 2016-10-25 03:30:20.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की हिन्दू संस्कृति बनाम सांझा संस्कृति, भाग-4

अब यह निश्चयपूर्वक समझ लेना चाहिए कि इस देश का सच्चा राष्ट्रीय और वास्तविक भक्त हिंदू ही रहा है और हिंदू ही रहेगा। इस तथ्य के आलोक में हमारी सरकारों को कार्य करना चाहिए था। हिंदुत्व को इस देश की प्राण-शक्ति माना जाता। इसके निवासियों को हिन्दू माना जाता और इस देश का शासन हिंदू ढंग से चलाया जाता। क्योंकि हिंदुत्व में ही वह शक्ति है जो सब संप्रदायों का सम्मान करना जानता है। सब संप्रदायों का सम्मान करना ही राज्य की पंथनिरपेक्ष नीति कहलाता है और संप्रदाय विशेष का तुष्टिकरण करना ही सरकार का साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित और पोषित करना होता है। कांग्रेसी सरकारें यहां पर दुर्भाग्य से साम्प्रदायिकता के इसी खेल को खेलती रही हैं। जितना अधिक उन्होंने हिन्दुत्व को कोसा है अथवा उपेक्षित किया है उतना ही अधिक राष्ट्र में साम्प्रदायिकता का वातावरण बना है, जितना अधिक उन्होंने किसी संप्रदाय के प्रति उदारता और तुष्टिकरण का प्रदर्शन किया उतनी ही अधिक उस संप्रदाय की साम्प्रदायिकता मुखरित हुई है और राष्ट्र की मुख्य धारा का प्रवाह अवरूद्घ हुआ है।


हमारी सरकारें 'सांझा संस्कृति' की अवधारणा को पालित, पोषित और विकसित करती रहीं और साम्प्रदायिक शक्तियां राष्ट्र की हिंदू संस्कृति को विनष्ट कर उस पर अपना भवन बनाकर प्रोत्साहित होती रहीं। भारत की हिंदू संस्कृति को मिटाकर यहां सांझा संस्कृति के स्वप्नद्रष्टाओं को लताड़ते हुए संविधान सभा में 'एम.ए.आयंगर' ने कहा था-''सेक्यूलर राष्ट्र में धर्म का क्या काम? इसलिए मैं चाहता हूं कि एक स्पष्ट मूल अधिकार हो जो धर्म परिवर्तन को वर्जित करता हो। मैं सदन से अपील करता हूं कि भयंकर परिणामों को अभी समझ लें, अन्यथा यह समस्या विकराल हो जाएगी।''
आर.बी. धुलेकर जी ने कहा है-''हम नहीं चाहते कि हिन्दुओं की संख्या धीरे-धीरे कम या समाप्त हो और दस वर्षों पश्चात अन्य लोग चिल्लाएं कि हम एक नया राष्ट्र चाहते हैं। इस अलगाववादी प्रवृत्ति को कुचलना होगा।''

इमाम हुसैन साहब ने कहा था-''जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन घोर अमानवीय है। इसलिए जैसा कि सरदार पटेल ने स्वीकार किया है कि इन्हें मूल अधिकारों में नहीं रखना चाहिए। मैं उससे सहमत हूं।''
तजम्मुल हुसैन साहब ने भी कहा था कि-''यदि आपने इस देश में धर्म का प्रचार प्रारंभ कर दिया तो आप एक समस्या बन जाएंगे।'' संविधान सभा के इन सभी भविष्यदृष्टा महानपुरूषों की वाणी आज सत्य सिद्घ हो रही है। देश के कर्णधार इस राष्ट्र की पुरातन संस्कृति को हिंदू संस्कृति घोषित नहीं कर पाए। हिंदू इस देश में बहुसंख्यक होकर भी उपेक्षित कर दिया गया। उसके हितों को राष्ट्रहित नहीं माना गया।

राष्ट्र की मुख्यधारा हिंदुत्व को अलग छोडक़र उसके स्थान पर नाले और शहरों के मैले से मुख्यधारा का निर्माण करने का सपना ले लिया गया। उनसे राष्ट्र की मुख्यधारा का निर्माण न तो होना था और न हुआ। राष्ट्र का पुरूषार्थ अवश्य व्यर्थ चला गया। 'सांझा संस्कृति' के स्थान पर इस देश की संस्कृति को यदि अब भी हिंदू संस्कृति घोषित किया जाए तो अभी भी देर नहीं हुई है।
ऐसा सोचना यह राष्ट्रहित में उचित ही होगा। हमें समझना होगा कि संस्कृति कभी सांझा नहीं होती। संस्कृति का समन्वयवाद उसकी विशेषता हो सकती है। भारतीय संस्कृति समन्वयवादी संस्कृति है, इसलिए वह भी सांझा नहीं हो जाती।

हमारे सांस्कृतिक समन्वयवाद के कारण यहां विपरीत मानसिकता और सोच के लोगों को भी हमने न केवल सहन किया है अपितु आत्मसात भी किया है। यह विशेषता भारत की 'हिन्दू संस्कृति' में ही है। इसके इस समन्वयवादी स्वरूप को प्रशंसित किया जाना चाहिए था न कि इसे 'सांझावाद' का नाम दिया जाता।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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