भारत की हिन्दू संस्कृति बनाम सांझा संस्कृति, भाग-3

  • 2016-10-24 04:00:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की हिन्दू संस्कृति बनाम सांझा संस्कृति, भाग-3

हिन्दू से मुसलमान और ईसाई बने लोग भारत के आदि मूल निवासी हैं, इसलिए ये ही इस देश के वास्तविक स्वामी हैं, अन्य सब विदेशी हैं। अंग्रेज चले गये परंतु भारत पर सबसे पहले आक्रमण करने वाले आर्यों को पहले निकालना चाहिए था। अर्थात इस देश का मूल निवासी भी इसका मूल निवासी नही माना गया।

आर्यभट्ट, आर्यभाषा (संस्कृत) तथा आर्य लोग क्यों कुछ लोगों की दृष्टि में घृणा के पात्र बन गये? अथवा बने हुए हैं। कारण एक ही है कि उन्हें ये तीनों विषय वस्तु ही विदेश से आयातित बताई और समझायी गयी हैं। इसलिए कुछ समय पूर्व तमिलनाडु के एक कस्बे में श्रीराम जैसे मर्यादा पुरूषोत्तम के पुतले को भी जलाया गया। संसार के अन्य कई देशों को जैसे-जैसे यह ज्ञान हुआ कि उनकी सभ्यता और संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृति है, तो उन्होंने तनिक सी भी देर नही लगायी और अपना इतिहास गौरवपूर्ण ढंग से प्राचीनता के साथ लिखना आरंभ कर दिया।

किंतु भारत में ऐसा क्यों नही हो सका? क्योंकि छद्म धर्मनिरपेक्षियों का प्रयास रहा है कि देश के धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को यथावत बनाये रखना आवश्यक है। अत: उनमें इतना साहस नही कि वो देश के इतिहास के तथ्यों के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोक सकें। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात के इतिहास का और काल का यदि अनुशीलन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि हमें सांस्कृतिक एकता का पाठ पढ़ाया ही नही गया। यदि हमें बताया जाता कि-
हम सबकी प्राचीन भाषा संस्कृत भाषा है जो कि विश्व की सभी भाषाओं की जननी है।
हमारी संस्कृति विश्व की प्राचीन संस्कृति है।
यह राष्ट्र विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र है जिसमें कभी उत्तर दक्षिण का विवाद नही रहा, तथा सारे राष्ट्र के पुरूष पूर्वज एक ही रहे हैं।
राम संपूर्ण भारत के वंदनीय आप्त पुरूष हैं। हम सब उनकी संतानें हैं।
यहाँ पर आकर इस्लाम और ईसाइयत का प्रचार-प्रसार इन्हें मानने वाले लोगों ने इस देश के धर्म के प्राचीनतम स्वरूप और संस्कृति को धूमिल करने के लिए किया।
आज हम सब इस तथ्य को समझ गये हैं। अत: अपने धर्म परिवर्तन के उपरांत भी मुस्लिम और ईसाई लोग समझें कि हम सबका अतीत एक ही है हम सबके पूर्वज एक ही हैं, हम सबका इतिहास एक है, संस्कृति एक है, धर्म एक है और जाति एक है।

जब हमारा सब कुछ एक है तो फिर झगड़ा किस बात का? झगड़ा है हमारे झूठे अहम का, झूठी मान्यताओं का, झूठे दावों का और झूठी धारणाओं का। झगड़ा है उस चोले का जो हम धर्मपरिवर्तन करने के पश्चात पहन लेते हैं और झगड़ा है उन लोगों की सोच का जो धर्म परिवर्तन करके अपनी आस्था, निष्ठा और विश्वास को मक्का-मदीना काबा अथवा रोम से जोड़ लेते हैं। काशी से 'काबा' और राम से 'रोम' के प्रति जुड़ी यह निष्ठा ही समस्या और झगड़े का मूल कारण है। अत: धर्मांतरण के पुनीत कार्य में लगी विदेशी मिशनरियां भारत की घोर शत्रु हैं। सांझा संस्कृति के राष्ट्रवाद की कांग्रेसी और साम्यवादी सोच के कारण मिजोरम की 86 प्रतिशत जनता, नागालैंड की 90 प्रतिशत जनता और मेघालय की 70 प्रतिशत जनता प्राय: ईसाई बन चुकी है। देखिये इस प्रसंग में वीर सावरकर के शब्द हमारे लिए कितने प्रेरणास्रोत हो सकते हैं-''हिंदू जब तक हिंदू है तब तक ही वह भारत की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग कर सकता है, सर्वस्व होम कर सकता है। वह प्यारी मातृभूमि परम पवित्र पुण्यभूमि के लिए प्राण देकर स्वर्ग व मोक्ष प्राप्ति की कामना कर सकता है। किंतु यदि वह धर्म परिवर्तन करके मुसलमान या ईसाई हो गया तो फिर वह क्यों व्यर्थ ही इस मिट्टी के ढेर की रक्षा के लिए प्राण देगा?''
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)