भारत की हिन्दू संस्कृति बनाम सांझा संस्कृति, भाग-2

  • 2016-10-14 05:00:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत की हिन्दू संस्कृति बनाम सांझा संस्कृति, भाग-2

मुस्लिम शासन काल में इन बातों में और भी वृद्घि हुई। किंतु ईसाईयों के यहां आने पर स्थिति परिवर्तित हुई। तब यहां के लोगों ने कथित रूप से सभ्यता सीखी एवं सांस्कृतिक मूल्यों से उनका परिचय हुआ। अत: हमें बताया गया कि-
जो कुछ तेरे पास है सब कुछ है मोर।
मेरा मुझको सौंपते क्या लागे है तोर।
अत: अंग्रेजों ने हमसे कह दिया कि समर्पित भक्त की भांति हमारे समक्ष पूर्ण समर्पण कर दो। क्योंकि तुम्हारा अपने पास अपना कुछ भी नही है।

कृतज्ञता भारत की विशेषता
हम भारतीय हृदय से बड़े कृतज्ञ होते हैं। अत: ऐसा 'आशीष वचन' सुनकर मैकाले के मानसपुत्रों ने अपने गुरू (अंग्रेजों के समक्ष समर्पण कर दिया। तब से हम लार्ड मैकाले की भाषा में गाते चले आ रहे हैं कि 'भारत की संस्कृति सांझा संस्कृति है।' क्योंकि यहां की मूल और प्राचीन संस्कृति तो आर्यों के द्वारा नष्ट कर दी गयी थी। वर्तमान संस्कृति भी अधिक प्राचीन नही है, यह भी पिछले पांच हजार वर्षों में ही सिमटी पड़ी है।

स्वतंत्र भारत में कांग्रेस की पहली पीढ़ी के लोग सत्ता प्राप्त कर अंग्रेजों के हृदय से आभारी थे, क्योंकि उन्होंने स्वतंत्र देश की सत्ता उन कांग्रेसियों के हाथों में सौंपी थी, जो मैकाले की शिक्षा पद्घति को इस देश के लिए वरदान मानते थे। फलस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जो नेता सत्तासीन हुए उन्होंने भी अपने मानसिक गुरू अंग्रेजों के ही गुण गाने आरंभ कर दिये और उन्हीं की मान्यताओं को यहां सींचने लग गये।

अत: स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी हमें यह नही बताया गया कि हमारी संस्कृति विश्व की एक अरब सत्तानवें करोड़ और उन्तीस लाख वर्ष से भी अधिक प्राचीन संस्कृति है। यह संस्कृति प्राचीनकाल में वैदिक संस्कृति कहलाती थी और वर्तमानकाल में 'हिंदू संस्कृति' कहलाती है। इसकी प्राचीनता, उदारता, पवित्रता, मानवता और समृद्घता की सानी संसार में कोई दूसरी संस्कृति है ही नही।
अत्यंत प्राचीनकाल से ही यह पुण्य भारतभूमि हमारी पितृभूमि रही है। इसकी प्राचीनता सृष्टि के उद्गम से है न कि पश्चातवर्ती किसी घटना अथवा दुर्घटना के संयोग से जन्मी प्राचीनता है। हम इसके सुयोग अधिकारी हैं, इसकी सेवा करना ही हमारा जीवन ध्येय है। इस पितृभूमि भारत से शत्रुता रखने वाला हर व्यक्ति हमारा शत्रु है। इसकी संस्कृति और सभ्यता को मिटाने वाला अथवा उन्हें विद्रूपित करने वाला हर व्यक्ति राष्ट्रद्रोही है। इस सत्य के स्थान पर हमें कांग्रेसी तोतों और साम्यवादी परमुखापेक्षी विचारकों ने यही समझाया और बताया कि इस राष्ट्र की संस्कृति सांझा है, जिसमें हर विदेशी हमलावर की जाति या संप्रदाय या मजहब का भी विशेष और उल्लेखनीय योगदान रहा है। भारत की यह संस्कृति विभिन्न विदेशी जातियों के संपर्क में आने से बनी हुई संस्कृति है जिसे वैदिक अथवा हिंदू संस्कृति कहना राष्ट्रीय अपराध है, क्योंकि इससे 'धर्मनिरपेक्षता' को खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

इसका परिणाम क्या निकला?
इस घातक कांग्रेसी और साम्यवादी विचारधारा का परिणाम क्या निकला? इसके स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं-
1-23 फरवरी 1979 ई. द्रमुक सदस्य के लक्ष्मणन ने राज्यसभा में अंतरिक्ष में छोड़े गये प्रथम भारतीय उपग्रह 'आर्यभट्ट' के नामकरण पर आपत्ति प्रकट करते हुए मांग की कि-''भारतीय उपग्रह का नाम 'आर्यभट्ट' नही रखना चाहिए था, क्योंकि यह विदेशी नाम है।''

2-संस्कृत को लेकर 18 सितंबर सन 1977 ई. को संसद में राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य सर फ्रैंक एंथोनी ने मांग की थी कि-''भारतीय संविधान के आठवें परिशिष्ट में परिगणित भारतीय भाषाओं की सूची में से संस्कृत को निकाल देना चाहिए क्योंकि यह विदेशी आक्रांता आर्यों द्वारा लाई गयी विदेशी भाषा है।''
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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