कैसे मिले हिन्दी को सम्मान, भाग-दो

  • 2016-12-03 03:30:57.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मिले हिन्दी को सम्मान, भाग-दो

हमारा मानना है कि अपनी राष्ट्रभाषा की उन्नति के लिए देश में एक 'राजभाषा संसद' हो। इस संसद में देश के प्रत्येक राज्य से राष्ट्रभाषा के कम से कम दो प्रतिनिधि हों। इस 'राजभाषा संसद' का प्रमुख कार्य राष्ट्रभाषा को संपर्क भाषा बनाना तथा हिंदी लेखन में शुद्घ हिंदी शब्दों का प्रचलन बढ़ाना हो। देश के सभी हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं की विवेचना करना और उनमें हिंदी के नाम पर खिचड़ी भाषा का प्रयोग तो नही हो रहा है-इस पर भी ध्यान रखना इस संसद का कार्य होना चाहिए। इस संसद में देश के हिंदी के मूर्धन्य विद्वान ही पहुंच सकें, ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए। ऐसी परंपरा परिवर्तित होनी चाहिए कि देश की भाषा संसद में अपनी राष्ट्रभाषा का उपहास उड़ाने वाले या उसे ना जानने वाले या हिंदी को लेकर किसी प्रकार का पूर्वाग्रह रखने वाले लोग पहुंचने ही न पावें।

देश की 'राजभाषा संसद' में किसी भी देश की भाषा का अपने देश की अन्य भाषाओं की तुलना में संस्कृत और हिंदी की उत्कृष्टता और वैज्ञानिकता को सिद्घ व प्रमाणित करने के लिए ठोस कार्य योजना बननी चाहिए। इसमें हिंदी की उत्कृष्टता और वैज्ञानिकता पर ठोस बहस होनी चाहिए। ऐसी बहसों के निष्कर्षों को सरकारें एक नीति के रूप में अपनाएं तो देश की राष्ट्रभाषा निश्चय ही उन्नति कर सकेगी। अभी तक हम देख रहे हैं कि हिंदी में लेखन कार्य उर्दू मिश्रित भाषा में हो रहा है, जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे साहित्य के क्षेत्र में बड़े-बड़े पुरस्कार पाने में सफल हो जाते हैं। इन पुरस्कारों या पदवियों के देने में भ्रष्टाचार का भी अवलंब लिया जाता है। पुरस्कारों के लिए चयनित की जाने वाली पुस्तकों की चयन प्रक्रिया भी दोषपूर्ण है। ऐसी पुस्तकों के चयन में भी सिफारिशें चलती हैं, या फिर पैसा चलता है। पुस्तक चयन के लिए गठित समितियों के लोगों की विद्वत्ता और कार्य के प्रति निष्ठा भाव जांचना-आंकना आवश्यक है। इन लोगों को पुरस्कार के लिए चयनित पुस्तकों की समीक्षा के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। अभी तक ऐसा हो नहीं पा रहा है। अभी तक की स्थिति ये है कि हजारों पुस्तकों में से पुरस्कार के लिए चयन की जाने वाली पुस्तकों की गुणवत्ता की जांच के लिए चयन समिति के सदस्यों को 2-3 घंटे का ही समय दिया जाता है। इतने अल्प समय में हजारों पुस्तकों में से आप कैसे 2-4 पुस्तकें चयनित कर सकते हैं?
ऐसी पुस्तकों की चयन प्रक्रिया दोषपूर्ण होने के कारण उर्दू मिश्रित कविताएं या पुस्तकें भी हिंदी कविता या हिंदी पुस्तक के नाम पर पुरस्कृत हो जाती हैं। हमारा मानना है कि पुस्तकों का चयन करने के लिए हिंदी में उत्कृष्ट लेखन हिंदी शब्दावली का उचित और तर्कसंगत अर्थात युक्तियुक्त प्रयोग आवश्यक माना जाए।

हमारी 'राजभाषा संसद' में (जिसे राष्ट्रभाषा संसद भी कहा जा सकता है) संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए संस्कृत के विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए। ऐसा इसलिए आवश्यक है कि संस्कृति इस देश की संस्कृति के प्राणतत्व के रूप में कार्य करती रही है, यह अलग बात है कि हमने उसे इस रूप में मान्यता प्रदान नहीं की है। सैकड़ों वर्ष से शासन-प्रशासन ने इस भाषा की उपेक्षा की है, परंतु फिर भी वह हमारे संस्कारों की भाषा बनकर हमारे संस्कारों का परिमार्जन करती चली आ रही है। यह एक गौरवपूर्ण तथ्य है कि संस्कृत शासन-प्रशासन से पूर्णत: उपेक्षित होकर भी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। इसका कारण यही है कि संस्कृत ने इस देश को राष्ट्र की मान्यता दी है और राष्ट्रीय मूल्यों की स्थापना करने का बड़ा कार्य भी संस्कृत ने ही किया है। आज ये राष्ट्रीय मूल्य हमारे संस्कारों में बोलते हैं और हम इस देश के किसी भी कोने में रहने वाले नर नारियों को अपना भाई या बहन मानते हैं। शासन ने और राजनीति ने हमारे संस्कारों को खण्ड खण्ड करके भाषाई विविधता तक में भी विभाजित करने का प्रयास किया है, परंतु इसके उपरांत भी संस्कृत द्वारा स्थापित राष्ट्रीय मूल्य हमारा मार्गदर्शन करने में सफल रहे हैं। अत: हमारा मानना है कि ऐसी भाषा को सम्मान मिलना ही चाहिए।

संस्कृत व्याकरण को हिंदी की समृद्घि के लिए उस सीमा तक अपनाया जाना भी अपेक्षित है जिस सीमा तक वह समयानुकूल उचित हो। इस बिन्दु पर (व्याकरण, सिद्घांत और व्यवहार पृष्ठ 36) वि. कृष्णा स्वामी आयंगर का यह कथन उचित ही है-''मेरे इस कथन पर कई लोग प्रश्न करेंगे कि क्या संस्कृत का समूचा व्याकरण हिन्दी में उतारना वांछनीय है या संभव है? मेरा नम्र निवेदन है कि मैं संस्कृत व्याकरण को पूर्ण रूप में हिन्दी में उतारने की सलाह नहीं दे रहा हूं। हां मैं यह अवश्य कहना चाहता हूं कि हिंदी को सही ढंग से समझने के लिए संस्कृत व्याकरण का जितना अंश अपेक्षित है उतना हिंदी के वैयाकरणों को ग्रहण करना चाहिए अन्यथा हम हिंदी का अच्छा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।''

वैश्विक ज्ञान-विज्ञान को समेटने वाली एकमात्र भाषा संस्कृत है और उस ज्ञान-विज्ञान की सच्ची संरक्षक या संवाहिका या संस्कृत के स्थान पर उसकी स्थानापन्न भाषा यदि कोई है, तो वह हिंदी है। हमें ऐसे प्रयास करने चाहिएं कि वैश्विक स्तर पर सारे ज्ञान-विज्ञान की भाषा हिंदी को बनाने का कार्य कर देना चाहिए। हमारे युवा वर्ग मंय हिंदी के प्रति अरूचि या अलगाव इसलिए भी पनपा है कि इस भाषा को हमने ज्ञान-विज्ञान की भाषा न मानकर इसके स्थान पर अंग्रेजी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा मान लिया है। जबकि अंग्रेजी आज भी संस्कृत के ज्ञान-विज्ञान के सूर्य से आंख मिलाकर बात तक नहीं कर सकती।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हिन्दी को मानक भाषा का सम्मान हमें देना ही पड़ेगा। मानक भाषा के विषय में डा. ओमप्रकाश भारद्वाज का निम्नांकित कथन मननीय है :-''मानक भाषा किसी देश अथवा राज्य की वह प्रतिनिधि तथा आदर्श भाषा होती है जिसका प्रयोग वहां के शिक्षित वर्ग द्वारा अपने सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। उसे परिनिष्ठित और टकसाली भाषा भी कहा जाता है। उसका और वह अपने प्रदेश की संपर्क भाषा होती है। मानक भाषा के तीन विकास स्तर होते हैं। पहले यह किसी एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र की घरेलू बोलचाल होती है। उस स्थिति में इसे 'बोली' कहा जाता है। तदनंतर सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों के बल से यह अपने आसपास के क्षेत्रों तथा संस्कृति के प्रचार-प्रसार का माध्यम बन जाती है। तब एक भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर लेती है। इसके पश्चात इसके शब्दोच्चारण शब्द रूपों और वाक्य विन्यास को स्थिरता प्रदान करने के लिए इसके व्याकरण की रचना की जाती है। इसके विकास का तीसरा चरण मानक स्तर है। उस स्थिति में यह अदालती कार्यवाहियों, राज्य प्रशासन के कार्यों तथा राजनीतिक सामाजिक कार्यों का माध्यम बन जाती है। तब इसका आदर्श रूप परिष्कृत हो जाता है और इसका तकनीकी शब्द भण्डार समृद्घ होता जाता है।''

हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी मानक भाषा के इन तीनों स्तरों पर खरी उतरती है। यह भाषा देश की किसी भी अन्य भाषा (जिन्हें बोली ही कहा जा सकता है) की विरोधी नहीं है-अपितु देश की हर भाषा को राष्ट्रभाषा हिंदी ने अपने बहुत से शब्द देकर उसे समृद्घ किया है, जिससे हिन्दी अन्य भाषाओं की सहायक सिद्घ होती है। अत: इस भाषा को किसी भाषा की विरोधी न मानकर सहायक ही मानना चाहिए। इस भाव से राष्ट्रीय स्तर पर कार्य किया जाए तो हिंदी को वास्तविक सम्मान मिल सकता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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