कैसे मिले हिन्दी को सम्मान

  • 2016-12-02 05:00:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मिले हिन्दी को सम्मान

अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका एक कारण यह भी है कि हमारी राष्ट्रभाषा की व्याकरण तो हमें संस्कृत से जोड़ती है और हमारे विद्यालयों में अंग्रेजी भाषा की व्याकरण प्रचलित है। इससे हमारे अध्यापकगण और छात्र चाहे अनचाहे हिंदी को भी अंग्रेजी की व्याकरण के अनुसार पढऩे व समझने का प्रयास करने लगते हैं। यह विचार सिरे से ही अनुचित और अतार्किक है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का कहना है कि 'हिंदी व्याकरण दो समृद्घ परंपराओं के बोझ से दबा है। एक तो संस्कृत की समृद्घ परंपरा जिसे हम छोड़ नहीं सकते। सारी दुनिया हमारे व्याकरण की श्रेष्ठता को स्वीकार करती है। दूसरी ओर लैटिन ग्रामर अंग्रेजी व्याकरण के माध्यम से प्राप्त परंपरा है। एक बड़ी भारी कठिनाई यह आ गयी है कि हम पारिभाषिक शब्द तो अधिकतर संस्कृत से लेते हैं, पर उनका प्रयोग पश्चिमी व्याकरण में बताये गये अर्थ में करते हैं।''


हमारी ऐसी प्रवृत्ति से हमारी अपनी भाषा हिंदी की उपेक्षा हो रही है और इसके वैज्ञानिक और तर्क संगत शब्दों के अर्थ का अनर्थ हम करते जा रहे हैं। अपनी भाषा का व्याकरण अपनी भाषा में न समझने से हम अपने शब्दों की गरिमा पर भी ध्यान नहीं देते हैं। इतना ही नही अपने हिंदी शब्दों की उत्पत्ति से अनभिज्ञ होने के कारण भी उनके अर्थ का अनर्थ कर डालते हैं। जैसे मित शब्द है-यह जहां प्रयोग हो जाता है वहीं इसका अभिप्राय नपे तुले से है। जैसे मितभाषी=अर्थात नपा-तुला बोलने वाला, मितव्ययी-अर्थात नाप तोलकर व्यय करने वाला। हम देखते हैं कि व्यवहार में कम बोलने वाले को मितभाषी कह दिया जाता है और कम खर्च करने वाले कंजूस को मितव्ययी कह दिया जाता है। यह अपनी भाषा के वैज्ञानिक स्वरूप के साथ अन्याय है। इस अन्याय की ओर संकेत करते हुए 'हिंदी व्याकरण का इतिहास' केप्रारंभ में डा. अनंत चौधरी कहते हैं कि हिंदी व्याकरण का निर्माण कार्य सर्वप्रथम यूरोपीय विद्वानों के द्वारा किया गया था। आगे चलकर भारतीय पंडितों ने इसे अपने हाथों में लिया। यूरोपीय विद्वानों ने पाश्चात्य व्याकरणिक ढांचे में हिंदी व्याकरण को ढालने का प्रयास किया किंतु भारतीय वैयाकरणों में से अनेक ने उसे संस्कृत व्याकरण के अनुरूप बनाने की चेष्टा की। इस प्रकार हिंदी व्याकरण के निर्माण में पाश्चात्य तथा भारतीय दोनों ही व्याकरणों की शास्त्रीय परंपराओं का सम्मिलित योगदान रहा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत हिंदी को पाश्चात्य विद्वानों की उपरोक्त परंपरा से मुक्ति दिलानी अपेक्षित थी। जब तक यह परंपरा हमारे विद्यालयों में प्रचलित रहेगी तब तक हिंदी एक स्वतंत्र भाषा नहीं हो सकेगी, और जब तक किसी देश की राष्ट्रभाषा स्वतंत्र ना हो तब तक उसकी अपनी स्वतंत्रता भी संदिग्ध है।

1921 ई. में पंडित कामता प्रसाद गुरू ने हिंदी व्याकरण पर विशेष कार्य किया। उन्होंने भरपूर प्रयास किया कि हिंदी को अंग्रेजी व्याकरण की परंपरा से मुक्त किया जाए पर वह सफल नही हो पाये थे। उन्होंने अपनी हिंदी व्याकरण पुस्तक की भूमिका में स्वयं ही अपनी पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त की थी-यह व्याकरण अधिकांश में अंग्रेजी व्याकरण के ढंग पर लिखा गया है। इस प्रणाली के अनुसरण का मुख्य कार्य यह है कि हिंदी में आरंभ ही से इसी प्रणाली का उपयोग किया गया है। आज तक किसी लेखक ने संस्कृत प्रणाली का कोई पूर्ण आदर्श उपस्थित नहीं किया। वर्तमान प्रणाली के प्रचार का दूसरा कारण यह है कि इसमें स्पष्टता और सरलता विशेष रूप से पायी जाती है और सूत्र तथा भाष्य दोनों ऐसे मिले रहते हैं, कि एक ही लेखक पूरा व्याकरण विशद रूप में लिख सकता है। हिंदी भाषा के लिए वह दिन सचमुच बड़े गौरव का होना जब इसका व्याकरण अष्टाध्यायी और महाभाष्य के मिश्रित रूप में लिखा जाएगा। पर वह दिन अभी बहुत दूर दिखाई देता है। यह कार्य मेरे लिए तो अल्पज्ञता के कारण दुस्तर है पर इसका संपादन तभी संभव होगा जब संस्कृत के अद्वितीय वैयाकरण हिंदी को एक स्वतंत्र और उन्नत भाषा समझकर इसके व्याकरण का अनुशीलन करेंगे। जब तक ऐसा नहीं हुआ है तब तक इसी व्याकरण से इस विषय के अभाव की पूत्र्ति होने की अपेक्षा की जा सकती है।
पंडित कामता प्रसाद गुरू जिस पीड़ा को 1921 ई. में व्यक्त कर गये वही पीड़ा आज एक शताब्दी पश्चात भी यथावत है।

हमारा मानना है कि अपनी राष्ट्रभाषा की दुर्दशा सुधारने के लिए हर गांव की प्राथमिक पाठशाला में ही एक हिंदी रक्षक समिति का गठन किया जाए। इसमें प्राथमिक पाठशाला का मुख्याध्यापक उस समिति का अध्यक्ष हो और हिंदी का अध्यापक उसका सचिव हो जबकि संबंधित ग्राम के हिंदी प्रेमी पढ़े लिखे युवकों में से सर्वाधिक योग्य 5 लोगों को सम्मिलित किया जाए। इन सातों लोगों को हिंदी उत्थान के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। इनका कार्य अपनी राष्ट्रभाषा की विशेष जानकारी बच्चें को देना होना चाहिए , साथ ही उसकी वैज्ञानिकता पर अपने विचार सरकार तक पहुंचाने की बौद्घिक क्षमता भी इनमें होनी चाहिए। इस ग्राम्य स्तर की समिति के ऊपर ब्लाक स्तर पर एक समिति अलग से हो जिसका चयन इसी प्रकार की ग्राम्य स्तरीय समितियों के विद्वान लोगों में से किया जाना चाहिए। इनका कार्य ब्लाक स्तर पर राष्ट्रभाषा के उन्नयन के लिए विशेष कार्य योजना तैयार करना और उसका क्रियान्वयन किया जाना होना चाहिए। इसी प्रकार की समिति जिला स्तर पर प्रांतीय स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए।

आज राष्ट्रभाषा के उन्नयन के लिए जितनी भर भी समितियां कार्य कर रही हैं उनमें भारतीयता का पुट नहीं है। भारतीयता से हमारा अभिप्राय संस्कृतनिष्ठ व्याकरण के प्रति समर्पण से है जो हिंदी को उसका सही स्थान दिलाने में सहायक हो। जो लोग आज हिंदी उन्नयन के लिए सभा समितियों में बैठे हैं वे अधिकांश किसी न किसी मंत्री के, सांसद के या विधायक के या किसी अन्य बड़े व्यक्ति के सहारे वहां बैठे हैं। यह प्रचलित व्यवस्था अलोकतांत्रिक है-जिसे लोकतांत्रिक बनाने केे लिए इसका पूर्णत: भारतीयकरण किया जाना अपेक्षित है। भारतीयता की आत्मा हिंदी की उन्नति के लिए वही व्यक्ति योग्य हो सकता है जो इसकी आत्मा की आवाज को जानता हो और आत्मा से आत्मा की बात कराने में सक्षम हो।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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