हिन्दुत्व धर्म और न्यायालय

  • 2016-10-28 06:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

हिन्दुत्व धर्म और न्यायालय

धर्म के आधार पर वोट की अपील करने की मनाही के कानूनी दायरे पर विचार कर रही सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एक बार पुन: स्पष्ट कर दिया है कि वे हिंदुत्व या धर्म के मुद्दे पर विचार नही करेंगे और ना ही 1995 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी हिंदुत्व की परिभाषा में किसी प्रकार का परिवर्तन करेंगे। उल्लेखनीय है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष संविधान की धारा 123 (3) का मामला भेजा गया है। जिसमें धर्म के नाम पर वोट मांगने को चुनाव में भ्रष्टाचार का कारण मानने या न मानने पर, न्यायालय कानून की व्याख्या के दायरे पर विचार कर रहा है।

1995 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि हिंदुत्व कोई मजहब नही अपितु एक जीवनशैली है। यह वाद 90 के दशक में महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों को लेकर प्रारंभ किया गया था, जिसमें हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने को मुंबई उच्च न्यायालय ने अनुचित और असंवैधानिक माना था। जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय का निर्णय पलट दिया था और हिंदुत्व को एक जीवनशैली कहकर महिमामंडित किया था।

अब मध्य प्रदेश के सुंदरलाल पटवा का मामला कोर्ट के सामने लंबित है। जिसमें धर्म के नाम पर वोट मांगने को अनुचित और भ्रष्ट माना गया है। इस पर हस्तक्षेप याचिकाकत्र्ताओं के अधिवक्ताओं ने कोर्ट से कहा कि यदि वह हिंदुत्व के फैसले पर विचार कर रहा है तो उन्हें भी सुना जाए जिस पर माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह हिंदुत्व के विषय पर विचार नही कर रहा है। उसके सामने केवल धर्म के नाम पर वोट मांगने को अनुचित मानने या न मानने की बात विचाराधीन है।

सचमुच माननीय न्यायालय के तर्क अकाट्य हैं। जिस पर माननीय न्यायालय पूर्व में ही अपनी धारणा, मान्यता या मानसिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए निर्णय दे चुका है। उस पर पुन: सुनवाई का कोई औचित्य ही नहीं है। हिंदुत्व इस देश की ही नहीं अपितु संपूर्ण मानवता की ऐतिहासिक विरासत है जिस पर सारी मानवता को नाज होना चाहिए। क्योंकिवास्तविक जीवन जीने की कला मनुष्य को केवल हिंदुत्व ही प्रदान करता है। इसके विषय में मि. डब्ल्यू .डी. ब्राउन का कथन है कि-''यदि पूर्वाग्रह रहित होकर निष्पक्षता से विचार किया जाए तो यह बात अवश्य ही स्वीकार करनी होगी कि हिंदू सारे संसार के ब्रह्मविज्ञान संबंधी साहित्य के जनक हैं। मैक्समूलर, जकौलाइट, सर विलियम जोंस जैसे विद्वानों द्वारा संस्कृत भाषा में किये गये शोध एवं अन्वेषण के आधार पर यह पाया कि प्राचीन भारतीय साहित्य में इस बात के दृढ़ प्रमाण हैं कि यहीं से ब्रह्म विज्ञान का प्रसार हुआ और एक विचारशील विद्यार्थी को ये दृढ़ प्रमाण भी मिलेंगे कि प्राचीन भारतवासी मूर्तिपूजक नहीं थे, अज्ञानी असभ्य एवं जंगली नहीं थे, जैसा कि प्राय: उन्हें समझा गया है। अपितु वे बड़े उत्साही एवं प्रेरणादायी लोग थे। बहुत से मिथ्याभिमानी राष्ट्रों ने द्वेषवश उन पर ये व्यर्थ एवं आधारहीन असत्य आरोप लगाये हैं और मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि प्राचीन भारतीय साहित्य का अनुवाद तथाकथित आधुनिक सभ्य राष्ट्रों को हतप्रभ कर देगा और वे भारत को एक ऐसे पुष्प के रूप में देखेंगे जो शताब्दियों तक अपनी पूरी मनोहर सुगंध बिखेरता रहेगा और फिर चुपचाप अपनी शाखाओं से विदा लेकर चला जाएगा।''

हम माननीय न्यायालय का ध्यान पूरी विनम्रता से इस ओर दिलाना चाहेंगे कि भारत का धर्म ही उसकी संस्कृति का वह मूल तत्व है जिसके कारण उसे विश्व में सम्मान और गौरव मिला है और उसने संपूर्ण मानवता को शांति और प्रेम का संदेश दिया है। भारत का धर्म मानवतावाद है और संपूर्ण विश्व के संपूर्ण मानव समाज को भ्रातृत्व से देखता है। इसके धर्म की विशेषता है कि वह विश्व जनीन है, वह सबके लिए है, और सब उसके लिए है। ऐसे धर्म को चुनाव के समय प्रयोग करने की अनुमति मिलनी चाहिए जो लोगों में किसी भी प्रकार की संकीर्णता यथा साम्प्रदायिकता जैसी घृणित अमानवीय भावना का प्रतिरोध करता हो। चुनाव सदा ही अमानवीय और मानवीय के बीच किया जाता है। साम्प्रदायिकता यदि अमानवीय है तो धर्म मानवीय है। इसलिए चुनाव में साम्प्रदायिकता का प्रयोग न कर धर्म का प्रयोग तो किया ही जाना चाहिए। माननीय न्यायालय साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले 'नारों और नरों' पर प्रतिबंध लगाये जो उन नारों के माध्यम से समाज में लोगों के मतों का धु्रवीकरण कर समाज की खेमेबंदी करते हैं और वैमनस्यता को फैलाते हैं। इससे समाज का सारा ढांचा ही विकृत हो चुका है। अच्छा हो कि न्यायालय संप्रदाय अर्थात मजहब और धर्म के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा तय कर दे और बता दे कि चुनाव में धर्म का प्रयोग सदा करना चाहिए क्योंकि वह न्यायसंगत है और मजहब को चुनाव से दूर रखना चाहिए क्योंकि वह अन्याय, अत्याचार, अनाचार और दलन शोषण एवं दमन को बढ़ावा देता है। यदि माननीय न्यायालय ऐसा कर देता है तो निश्चय ही जितने 'पाप' पिछले सत्तर वर्ष में इस देश में 'मजहब' ने किये हैं। उन सब का पर्दाफाश तो होगा ही साथ ही राजनीति को भी वास्तव में पंथनिरपेक्ष बनाने में हमें सहायता मिलेगी।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.