हमारे देश की धडक़न का नाम है-हिन्दी, भाग-दो

  • 2016-12-31 05:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारे देश की धडक़न का नाम है-हिन्दी, भाग-दो

हिन्दी हमें शुचिता सिखाती है। जीवन को एक सुव्यवस्थित जीवन प्रणाली के अनुरूप ढालकर जीने योग्य बनाती है। इसी जीवन प्रणाली को हमारे विद्वानों ने वैदिक संस्कृति कहा है। आजकल इसे हम 'हिंदुत्व' के नाम से भी जानते हैं। 'हिंदुत्व' हमारे देश की जीवन पद्घति है। यह पद्घति हमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का अष्टांगयोग बताती है। जिस पर चलकर मानव उत्कृष्ट जीवन जीता है और उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिली जाती है। हम अपनी इस आदर्श व्यवस्था को केवल हिन्दी के माध्यम से ही प्राप्त कर सकते हैं।

''निर्मल मन से विमल पथ पर
बढ़ते जाओ-बढ़ते जाओ
हिन्दी हमको शिक्षा देती
प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ
जब तक जीवन आश तभी तक
नये कीत्र्तिमान गढ़ते जाओ
रूकना नहीं, कभी कहीं पर
प्यारे मित्रो! बढ़ते जाओ-बढ़ते जाओ''

जीवन का ध्येय आगे बढऩा है और आगे बढ़ते-बढ़ते मुक्ति तक पहुंचना है। हिंदी हमें हमारे उसी ध्येय तक पहुंचाती है। इसलिए वह संसार रूपी तालाब की कीचड़ में हमें एक खिलते हुए कमल की भांति जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है। कहती है :-
''संपूर्ण विश्व के आंगन में तुम
मोहक कमल खिलाओ
अपनी भारत माता की
ज्ञान सुगंधि सर्वत्र फैलाओ
आर्य भाषा संस्कृत की
तान ध्यान से सुन लेना
इसी संस्कृति को अपना कर
ज्ञान ध्यान से गुन लेना।''

जिस संस्कृति के विश्व के ज्ञानी लोगों ने विश्व के लिए उपयोगी बताया है-उसी वैदिक संस्कृति के भीतर यह विशेषता है कि वह संसार के कीचड़ भरे तालाब में अपने ज्ञान-ध्यान के ऐसे कमल खिला सकती है जिन पर इस संसार के कीचड़ का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसा निर्मल विमल जीवन ही पवित्र होता है, जो संसार की कीचड़ में रहकर भी उसके विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता है। हिन्दी के विषय में सत्य है कि-
''संध्या में रहकर हमको
वर्तमान का बोध कराती हिंदी
दुखों के भवसागर से तरने का
हमको उत्तम पाठ पढ़ाती हिन्दी''

संध्या का अभिप्राय है दिन और रात का मिलन। यह प्रात:काल और सायंकाल दिन में दो बार होता है। इस संधि में दिन और रात को वर्तमान जोड़ता है। इस प्रकार संध्या में रहने का अभिप्राय है-वर्तमान में रहना, दोनों के बीच में रहना। भूत और भविष्य के बीच जैसे वर्तमान खड़ा है-और पूर्णत: निरपेक्ष भाव अपनाये खड़ा है-वैसे ही हम भी भूत और भविष्य में न रहकर वर्तमान में रहना सीखें-सचमुच आनंद आएगा।
इस आनंद को हिंदी ही प्रदान कर सकती है। क्योंकि अन्य वैश्विक भाषाओं के पास ज्ञान के इतनी गहराई के मिलने का अभाव है। ऐसा कहने में हमारा उद्देश्य किसी भी भाषा को या भाषा के मानने वालों को अपमानित करना नहीं है, अपितु इस सत्य को उद्घाटित करना हमारा लक्ष्य है कि हिन्दी वेद ज्ञान की उत्कृष्टता और निर्मलता को अपनाने वाली सच्ची ज्ञानमयी भाषा है। इसीलिए तो यह कहना भी उपयुक्त ही है कि-
''हमारे जीवन का करती है
हिन्दी मार्ग प्रशस्त
जिसे अपनाकर हम हो जाते
लक्ष्य प्राप्ति हेतु आश्वस्त
हमारा ध्येय, हमारा ज्ञेय
और पाथेय सभी कुछ है हिन्दी
हमारा ज्ञान, हमारा ध्यान
हमारा सर्वस्व सचमुच हिन्दी।''

हिन्दी कहती है कि अरे नादान मनुष्य! तेरे चारों ओर सत्संग की गंगा बह रही है-वेदज्ञान तुझे परंपरा से अपने ऋषि पूर्वजों से मिला है, तू उस पर चल और अपने जीवन को महान बना। हिंदी अपने वैज्ञानिक स्वरूप के कारण संसार में सम्मान प्राप्त करती है, इसलिए वह मनुष्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है। कहती है कि संसार के और प्रकृति के नियमों को समझ और उनके अनुसार अपने जीवन को उन्नतिशील और वैज्ञानिक बना। यह देख कि विज्ञान की ज्ञान गंगा में कितने जीवन धुलकर स्नान करके पवित्र हो गये? तू ऐसे स्नान किये हुए पवित्र जीवन को अपने लिए आदर्श बना। क्योंकि तू अमृत पुत्र है और अमृत पुत्र को कभी भी नारकीय जीवन जीने के लिए स्वयं को अभिशप्त नहीं करना चाहिए। इसीलिए केवल हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो कहती है कि संसार में तू अमृत पुत्र होने के कारण दीप से दीप जलाने के लिए आया है। यहां तुझे चिराग बुझाने नहीं है, अपितु चिराग प्रदीप्त करने हैं। अत: हे मनुष्य तू प्रकाश का उपासक बन और अंधकार का विनाश कर। सत्य ही तो है-
''जो हिंदी की महिमा से बचता
और करे उसका अपमान।
उसे नहीं पता क्या होते हैं
हिन्दी , हिन्दू, हिन्दूस्थान।''

हिन्दी (आर्यभाषा संस्कृत) हिंदू (इस देश का मूल नागरिक आर्य) हिंदूस्थान (इस देश का मूल नाम आर्यावत्र्त का वर्तमान संदर्भों में प्रचलित नाम जो इसकी राष्ट्रीयता को बताता है) इस देश की संस्कृति और धर्म को पूर्णत: व्याख्यायित करते हैं। ये तीनों शब्द इस देश की राष्ट्रीयता के बोधक हैं। जिन्हें इसी रूप में हमें स्वीकार करना चाहिए। हमें हमारी राष्ट्रीयता से काटने में अरबी, फारसी, उर्दू, और अंग्रेजी का विशेष योगदान रहा है, क्योंकि ये भाषाएं हमारे देश के विदेशी शासकों की भाषाएं थीं, जो हमें पढ़ाते समय हमें अपने अतीत से काटती थीं या उसे हमारे सामने कुछ इस प्रकार प्रस्तुत करती थीं-जैसे कि वह हमारे लिए एक कलंक हो, परंतु हिंदी हमें इसके विपरीत हमारे आत्मगौरव से हमें भरती है, और हमारे भीतर आत्म बोध के साथ-साथ राष्ट्रबोध और इतिहास बोध का भाव भी उत्पन्न करती है। हिन्दी हमें बताती है :-
''हर क्षण में हर कण में
व्याप रहा है प्यारा ओ३म्
हर तन में हर मन में प्यारे
बसा हुआ है प्यारा ओ३म्
ओ३म् में रहती हर वस्तु
हर वस्तु में विस्तारा ओ३म्
जीवन का आधार ओ३म् है
करता जग से निस्तारा ओ३म्
हिन्दी बताती महिमा ओ३म् की
करती उसका मधुर गान
मनुष्य को बलशाली बनाती
वीर्य का करती उत्थान
ओ३म् का बना उपासक
मानव को बनाती भक्त महान
ओ३म् में हिंदी-हिन्दी में ओ३म्
ओ३म् का सर्वत्र बखान।''

ऐसी प्यारी हिंदी ही है जो हमें संस्कृत के इस सनातन संदेश को हृदयंगम करने के लिए प्रेरित करती है-स्वाध्यायान्मा प्रमद: (तैत्तिरीयोपनिषद 1/111) अर्थात स्वाध्याय करने में कभी प्रमाद न करना।
स्वाध्याय का अभिप्राय केवल सद् ग्रंथों का अध्ययन ही नहीं है, अपितु स्वाध्याय का अभिप्राय अपने आपको पढऩा भी है। इसलिए स्वाध्याय में प्रमाद न करने की बात कहकर उपनिषद्कार यही कह रहा है कि अपने आपको पढऩे में, अपना अंतरावलोकन करने में या अपने दोष ढंूंढने और उन्हें स्वीकार करने में कभी प्रमाद न करना। ऐसी सुंदर शिक्षा विश्व की और भला कौन सी भाषा देती है? जिस भाषा के पास ऐसी शिक्षा होती है-वह व्यक्ति को विश्व का सबसे सुंदर व्यक्ति बनाने के लिए जन्मती है और उसी के लिए संघर्ष करती है। हिंदी हमारी ऐसी ही भाषा है। सचमुच अपनी ऐसी भाषा को बोलने पर हमें गर्व होना चाहिए, जो हमारा निर्माण करने के प्रति वैसे ही सावधान रहती है जैसे एक मां अपने बच्चे का निर्माण करने के लिए सावधान रहती है।