हमारे देश की धडक़न का नाम है-हिन्दी

  • 2016-12-30 03:45:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारे देश की धडक़न का नाम है-हिन्दी

हिन्दी हमारे देश की धडक़न का नाम है। हिन्दी के उद्बोधन और संबोधन से इस देश को एक परिभाषा मिलती है। हिन्दी का प्रवचन इस देश के लिए एक संदेश बनाता है, एक उपदेश देता है, एक आदेश पारित करता है और एक निर्देश देता है कि बढ़ते चलो और अपने लक्ष्य से पहले रूकना नहीं, क्योंकि रूकना मृत्यु का नाम है और निरंतर बढ़ते रहना ही जीवन है। इस प्रकार हिंदी हमारे ऋषि पूर्वजों के सत्संकल्पों से भरे हुए उत्कृष्टतम जीवन को हमारे मन मस्तिष्क में रचा-बसाकर हमें भारतीयता के प्रति समर्पित करने वाली भाषा है-

''जिस देश की भाषा अपनी हो,
जिस देश की भूषा अपनी हो,
वह देश ही उन्नति करता है
जिस देश की परिभाषा अपनी हो।''

हिन्दी वह भाषा है जो इस देश को परिभाषा देती है। जब हिन्दी की बात की जाती है तो आर्यावत्र्तकालीन संस्कृत और तत्कालीन संस्कृति का सारा स्वरूप हमारे अंतर्मन में प्रकट होने लगता है। हम जुड़ जाते हैं अपने अतीत से, अपने गौरव से, अपने ऋषि पूर्वजों के महान विचारों से और भारत की उस महानतम संस्कृति से जो इस देश को विश्व का सर्वाधिक विचारशील और बौद्घिक संपदा से युक्त देश बनाने की क्षमता रखती है-
''आत्म गौरव की पर्याय है हिंदी
राष्ट्रभक्ति का अध्याय है हिंदी
मानवता को विकसित करने वाली
संपूर्ण वसुधा का न्याय है हिंदी।''

वृहत्तर भारत की परिकल्पना हमारे वीर योद्घाओं ने कभी जब इस भूमंडल पर साकार करके दिखाई थी, तब चाहे हिन्दी नही थी, पर हिंदी की भावना अर्थात भारतीयता को विस्तार देना और भारतीय संस्कृति के अनुसार संपूर्ण वसुधा पर मानवता को विकसित कर उसे ऊंचाई और उन्नति की ओर प्रेरित करना-अवश्य थी। कदाचित इसी भावना के कारण भारत ने वृहत्तर भारत का अपना सपना साकार किया। उस सपने को उस समय संस्कृत ने विस्तार दिया था, पर उस संस्कृत के इस महान कार्य पर सच्चे हृदय से उत्सव मनाने वाली यदि आज विश्व की कोई एकमात्र भाषा है तो वह हिंदी है।
''हिन्दी देश-धर्म की परिभाषा का विस्तार है,
हिंदी निज संस्कृति का सुंंदर सा आकार है,
इसका हर तार करता भारतीयता का विस्तार है
और आकार का विस्तार ही इसकी झंकार है।''

यहां तार का अभिप्राय है कि हिंदी को बोलने वाला व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ता है। इसका कारण यह है कि हिन्दी संस्कृत के और भारत के उस धर्म की संवाहक भाषा है जो विश्व में सच्चे मानवतावाद को लाकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को अपनाती है और उसे अपनाकर लोगों को उसके प्रति समर्पित करती है। हमारी ऐसी पवित्र भाषा है जो विश्व ऐसे भाव को लेकर चलने वाली एकमात्र भाषा है। सचमुच हमें अपनी ऐसी भाषा पर गर्व होना चाहिए-
''विषमता की दीवारों को ढहाकर
हिंदी समताभाव बढ़ाती है,
ऊंच-नीच की दीवारों को तोडक़र
सब में भ्रातृत्व भाव बढ़ाती है,
जहां दानवता देती हो दिखाई
वहीं मानवता भाव बढ़ाती है,
वसुधा को कुटुम्ब कहकर हिंदी
भारतीयता का भाव बढ़ाती है।''

ऐसी हिंदी को अपने तन-मन में बसाकर चलना हर भारतीय का प्रथम कत्र्तव्य है। इस प्रथम कत्र्तव्य के निर्वाह से हमारे भीतर राष्ट्रबोध का भाव जागृत होता है, और हम अपने राष्ट्र के प्रति समर्पणभाव से जीने का संकल्प ले लेते हैं। यह सर्वमान्य सत्य है कि जिस देश की वर्तमान पीढ़ी अपने देश के प्रति जीने मरने का संकल्प ले लेती है और पूर्ण समर्पण भाव से कार्य करने लगती है वह देश विश्व में ऊंचा उठता है, और विश्वनायक बनकर गौरवबोध से भर उठता है-

''मेरे तन में हिंदी, मन में हिंदी
हिंदी का मैं गायक हूं,
मेरे रोम-रोम में बसती हिंदी
हिंदी का ही मैं विधायक हूं,
दूर-दूर तक फैले हिंदी
बस, ंिहन्दी का ध्वजवाहक हूं
मेरी हिंदी, तेरी हिंदी सबकी हिंदी
जग की हिन्दी बनाने वाला नायक हूं।''

यह हिन्दी की महानता है कि वह हमें गायक, विधायक, ध्वजवाहक और नायक के विभिन्न दायित्वों को निभाने का अवसर प्रदान करती है। जिसके पास गायक, विधायक, ध्वजवाहक और नायक की चतुरंगिणी सेना आ जाती है, वह इस भूमंडल का राजा होता है। भारत की भाषा ने भारत के लोगों को देव पद प्रदान कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसलिए हमारा दायित्व है -
''पग बढ़ें हिंदी की ओर,
जग बढ़े हिन्दी की ओर
मेरे मन में हो हिन्दी की भोर
छा जाए हिन्दी सब ओर।''

हिन्दी के प्रति हमारा समर्पण ऐसा हो कि हमारे संकल्प में, हमारे विकल्प में, हमारे कल्प और प्रकल्प में सर्वत्र हिंदी का भान हो, हिंदी की अनुभूति हो और हिंदी का सौंदर्य हो-
''संकल्प में हिन्दी विकल्प में हिन्दी
कल्प में हिन्दी प्रकल्प में हिन्दी,
दान में हिन्दी ज्ञान में हिन्दी
बोध में हिन्दी, शोध में हिन्दी
हिन्द में हिन्दी, सरहिन्द में हिन्दी
हो विश्व के हर छोर में हिन्दी।''

देश को आपत्तियों के काल से उभारने वाली और फिर देश को स्वतंत्रता की सुगंधि से सुगंधित करने वाली हिंदी के बारे में ऐसा भी कहा जा सकता है-
''तूफानों की सूनामी से टक्कर
लेने वाली हमारी भाषा हिन्दी
कल के भारत के यश की
हमारी सर्वोत्तम आशा हिंदी
भारत के स्व को जगाकर
उसे देती है परिभाषा हिन्दी।''

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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