बीच के बिचौलिये बंद करे सरकार

  • 2016-12-14 05:00:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

बीच के बिचौलिये बंद करे सरकार

हमारे देश की अर्थव्यवस्था यूं तो समाजवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था है। जिसे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इस देश के लिए यह कहकर लागू कराया था कि इससे देश के साधारण से साधारण और निर्धन से निर्धन व्यक्ति का भला हो सकेगा। यदि व्यवहार में हमारी यह व्यवस्था गरीबी उन्मूलन का काम करती और उत्पादन का समान विवरण कराने में सफल रहती तो माना जाता कि अपने देश की अर्थव्यवस्था का जो सपना पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने हमें दिखाया था-वह सफल और सुफल हो पाया है। परंतु हमने देखा कि ऐसा हुआ नहीं और इस देश में अपनायी गयी अर्थव्यवस्था के जो परिणाम आये वे गरीबी को मिटाने वाले न होकर गरीब को मिटाने वाले आये। इस स्थिति के कई कारण रहे। जिनमें से एक प्रमुख कारण देश में हर क्षेत्र में कुछ निकम्मे और मुफ्त का खाने वाले लोगों का उत्पादन के हर क्षेत्र में बिचौलिया बनकर उभरना था।

देश ने जिस राजनीतिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया था उसमें 'वोटों का खेल' चलता है। ये वोट कब और कैसे सत्ता की अदला बदली कर दें, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। जब इस देश में पहली बार वोट डालने का शुभारंभ हुआ तो 'बिचौलियों' की पहली पीढ़ी के लोगों ने वहीं से अपना खेल आरंभ किया।
उस समय देश के 'राजे रजवाड़ों' नवाबों और उनके मंत्रियों, वजीरों और राव उमरावों की ऐसी मजबूत स्थिति देश के समाज में थी कि वे जिधर को चाहते थे उधर को अपनी प्रजा से कहकर मत डलवा देते थे। इससे लोकतंत्र के नये नवाबों (विधायकों व सांसदों) ने अपने पूर्ववर्ती राजाओं/नवाबों को शीश झुकाना आरंभ कर दिया। देश का लोकतंत्र एक प्रकार से पुराने राजतंत्र के दरवाजे पर जाकर शीश झुकाने लगा। नये परिवेश और नई परिस्थितियों में ये पुराने नवाब और राजाओं की स्थिति बिचौलियों की बनी और चाहे उनके कितने ही 'पंख कैच' करने की कोशिश हमारी सरकारों ने की पर सच यह था कि इन बिचौलियों ने अपनी पूरी कीमत वसूलने का पूरा प्रबंध कर लिया था। यही कारण रहा कि आजादी के बाद के कई लोकसभा/विधानसभा चुनावों में पूर्व के राजा, महाराजाओं, नवाबों, राव-उमरावों की भूमिका बड़ी प्रभावशाली बनी रही। बाद में यह भूमिका इस देश के लोकतंत्र का एक संस्कार बनकर इसकी नस नस में रच-बस गयी। परिणामस्वरूप प्रभावशाली लोगों ने देश के लोकतंत्र को अपनी मुट्ठी में बंद करने का हरसंभव प्रयास किया। देश के नेताओं ने प्रभावशाली लोगों को 'वोटों' का सौदागर' का सम्मान देकर उन्हें उचित सुविधाएं देने का काम प्रारंभ कर दिया।

इस सारे खेल से लोकतंत्र की गरिमा का हनन हुआ और देश में बड़ी तेजी से लोकतंत्र में राजतंत्र के विषाणु रचते-बसते चले गये। कृषि क्षेत्र में किसान का उत्पादन हो चाहे देश की सुरक्षार्थ हथियारों का सौदा हो, हर स्थान पर एक 'बिचौलिया' खड़ा हो गया। इस बिचौलिया का काम रहा है बीच में कमीशन लेना और कमीशन को बाद में 'नेताजी' और संबंधित अधिकारी के साथ मिल बैठकर बांट लेना। कुछ देर तक तो इस खेल में लगे बिचौलियों को 'नेताजी का आदमी' कहकर सम्मानित किया जाता था, परंतु अब तो स्थिति ये है कि बिचौलिया के लोग नेताजी को ही अपने 'आका का आदमी' कहते हैं। कहने का अभिप्राय है कि अब यह रोग इतना फैल गया है कि आपराधिक लोगों को नेताजी संरक्षण देते से नहीं लगते और ना ही आपराधिक लोग नेताजी के लिए काम करते दिखाई देते हैं, अपितु नेताजी ही इन लोगों के लिए काम करते से जान पड़ते हैं। इससे लोकतंत्र का लोकतांत्रिक ढंग से आपराधीकरण हो गया है। सारी व्यवस्था दूषित होकर रह गयी है।

ऐसे बिके हुए लोकतंत्र के विषय में अब पता चला है कि खाद्य प्रबंधन के कुप्रबंधन के चलते खेत से खलिहान और यहां से उपभोक्ताओं तक पहुंचने के पहले ही लगभग एक लाख करोड़ रूपये के मूल्य के फल-सब्जियां और अन्य खाद्य वस्तुएं हर वर्ष नष्ट हो जाती हैं। देश में इस स्थिति पर आईसीएआर की रिपोर्ट के अनुसार देश को प्रतिवर्ष एक लाख करोड़ की क्षति उठानी पड़ रही है और देश का जनसाधारण या निर्धन व्यक्ति भी इस प्रकार के फल या सब्जियों से वंचित रह जाते हैं। खाद्य वस्तुओं के रखरखाव के लिए देश में कोल्ड स्टोर की संख्या अपेक्षा से कम होने के कारण इस समस्या का जन्म होना माना गया है। इस संबंध में कृषि और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के सहयोग से कोल्ड चेन बनाने की योजना को स्वीकृति मिली है, परंतु व्यापक परियोजना नहीं बन पाने के कारण पूरी तरह सफल नहीं हो पा रही है। किसान के खेत से उपज को सीधे खाद्य प्रसंस्करण उद्योग इकाइयों तक पहुंचाना और उसके बने उत्पादों को बाजार तक ले जाने की समग्र व्यवस्था का अभाव है। देश में इस समय 5367 कोल्ड स्टोर हैं, जो आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है।

हमारा मानना है कि देश में फल सब्जी के उत्पादक किसानों और उपभोक्ता के मध्य खड़ा हुआ बिचौलिया वर्ग ही इस समस्या के लिए उत्तरदायी है। थोड़ा सा समझने की आवश्यकता है। हो ये रहा है कि देश के फल व सब्जी उत्पादक किसान को बहुत कम मूल्य अपने उत्पादन का मिल रहा है। आलू और गाजर का मूल्य यदि किसान को 5 रूपया प्रति किलो मिलता है तो वह थोक विक्रेता से आगे फुटकर विक्रेता को 10 रूपये किलो में मिलता हैै और फुटकर विक्रेता उसे फिर 15 रूपये किलो में उपभोक्ता को बेचता है।
आप देखें कि एक किसान को तो उसका लागत मूल्य ही ले देकर पल्ले पड़ता है परंतु बिचौलिया के रूप में बीच में आया थोक विक्रेता बीच में रहकर 'मोटा मुनाफा' काट गया, रही सही कमी फुटकर विक्रेता ने पूरी कर दी, यदि सरकार बिचौलियों को हटाकर किसानों से सीधे फल-सब्जी खरीदकर उन्हें उपभोक्ता तक पहुंचाये तो किसान को जहां अपनी उपज का उचित मूल्य मिल जाएगा-वहीं सस्ती सब्जी व सस्ते फल होने के कारण धनी निर्धन भी उसे खरीद लेंगे और इससे फल सब्जी को कोल्ड स्टोर में रखने या उसके लिए कोल्ड स्टोर बनाने की समस्या ही नहीं रहेगी। फल सब्जी के लिए कोल्ड स्टोर होने ही नहीं चाहिएं अपितु होना ये चाहिए कि ये पैदा होते ही बाजार में आ जाएं और गरीब की थाली तक पहुंचा दिया जाए। कोल्ड स्टोर में जाकर तो ये महंगे और विषैले होते हैं जिन्हें गरीब व्यक्ति खरीद नहीं पाता।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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