अखिलेश सरकार का सही फैसला

  • 2016-09-02 04:00:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

अखिलेश सरकार का सही फैसला

उत्तर प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री व मंत्रियों के वेतन बढ़ाने के पश्चात अब अपने विधायकों के भी वेतन में वृद्घि की है। अभी विधायकों को 10,000 वेतन, 30,000 क्षेत्र भत्ता, 20,000 चिकित्सा भत्ता के रूप में तथा 15,000 सचिव के लिए मिलते थे, जो कुल मिलाकर 75,000 होते थे। अब ये राशि वेतन के रूप में 25,000 क्षेत्र भत्ता के रूप में 50,000, चिकित्सा भत्ता के रूप में 30,000, सचिव के लिए 20,000 कुल 1,25,000 की जा रही है। अभी तक पूर्व विधायकों को 10,000 पेंशन के रूप में राशि मिलती थी जो कि अब 25,000 रूपया कर दी गयी है।

कुछ लोगों ने और राजनीतिक दलों ने सपा सरकार के इस निर्णय की आलोचना की है। परंतु हमें नही लगता कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस निर्णय में आलोचना की कोई गुंजाइश है। हमारा मानना है कि विधायकों या हमारे जनप्रतिनिधियों के लिए जितना वेतन बढ़ाया गया है, वह भी पर्याप्त नही है। कारण कि उत्तर प्रदेश में एक विधायक के लोगों द्वारा खर्चे ही इतने करा दिये जाते हैं कि उसकी पूत्र्ति ढाई लाख में भी नही हो सकती। हर व्यक्ति अपने घर में छोटे-मोटे समारोह से लेकर ब्याह-शादी के बड़े-बड़े समारोहों तक में विधायक या सांसद या मंत्री को बुलाता है और लोग अपने जनप्रतिनिधि के आने न आने से ही समाज में अपनी हैसियत को कम या अधिक आंकते हैं। यदि जनप्रतिनिधि या विधायक नही पहुंचते हैं तो उसे लोग याद रखते हैं, और उसे समय आने पर 'उचित पुरस्कार' देते हैं। इस उचित पुरस्कार से बचने के लिए हर विधायक का या राजनीति करने वाले हर व्यक्ति को ऐसे समारोहों में पहुंचना आवश्यक हो गया है। इससे जनप्रतिनिधि को एक लाभ भी हो जाता है कि उसे ऐसे स्थलों पर बनी-बनायी भीड़ मिल जाती है, मंचों से सुनने तो अब इन्हें कोई आता नही, तो ऐसे समारोहों से ही सही-जनसंपर्क कर लिया जाता है। इन समारोहों में लोग अपने विधायक जी की केवल उपस्थिति ही नही चाहते, अपितु आशीर्वाद के रूप में कुछ 'दक्षिणा' या उपहार भी चाहते हैं और यह दक्षिणा कम से कम 500 रूपये होती है। अब यदि एक विधायक एक दिन में 20 समारोहों में शिरकत करे तो उसका मूलवेतन तो एक दिन के इन समारोहों में उसकी ओर से दी जाने वाली 'उपहार राशि' में ही समाप्त हो जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो विधायकों और जनप्रतिनिधि को एक एक दिन में 25-30 विवाह समारोह तक में जाना पड़ता है। जिससे सारी राजनीति इन समारोहों में ही सिमटकर रह गयी है।

अच्छा हो कि हम अपने प्रतिनिधियों को अधिक से अधिक समय राजनीति और जनसमस्याओं के समाधान के लिए दें, पर हम ऐसा नही करते हैं, हम उन्हें बेकार की बातों में उलझाये रखते हैं। इतना ही नही हर विधायक के चारों ओर उसके चाटुकारों का ऐसा घेरा सा बनता है जो उसे हर समय घेरे रखता है, उसी के फोन से फोन करना या किसी के काम के लिए कराना इन्हें अच्छा लगता है। 'लैंड लाइन' नंबर तो मानो सबका होता है, सब उसे यूं ही प्रयोग करते हैं जिससे कि अगले वाले पर एक प्रभाव पड़े कि साहब विधायक जी के फोन से फोन कर रहे हैं। ये चाटुकारों का घेरा मंत्री जी रोजाना चाय पानी पर कम से कम दो हजार रूपया सुबह से शाम तक भी खर्च कराये तो 60,000 रूपया महीना इसी में उड़ जाता है। इसके अतिरिक्त विधायक जी जब किसी समारोह के लिए प्रस्थान करते हैं तो उसमें भी उनके साथ कई गाडिय़ां होती हैं। इन गाडिय़ों का खर्चा भी अलग से होता है।

पब्लिक के लोग यदि अपने विधायक से मिलने आते हैं तो उनकी संतुष्टि भी अपने काम करा लेने मात्र से ही नही होती है, अपितु वे भी चाहते हैं कि कुछ न कुछ चाय पानी के नाम पर आना चाहिए। मुंह मीठा हो जाए तो वो मानते हैं कि तेरा भी सम्मान किया गया, इस सारे बखेड़े पर भी विधायक जी को व्यय करना पड़ता है। जबकि अपना घर और बाल बच्चे अलग रहे। इस सारे खर्चे को चलाने के लिए हर विधायक को यदि 5 लाख भी दिये जाएं तो भी कम हैं। हमारे कहने का अभिप्राय विधायकों को 5 लाख वेतन देने की सिफारिश करना कदापि नही है। हम चाहते हैं कि देश से भ्रष्टाचार को खत्म कराने की कसमें खाने वाले कभी यह भी सोचते हैं कि ये भ्रष्टाचार फैलता क्यों है? केवल इसलिए कि जिस व्यक्ति को दस हजार मिलते हैं उससे हम जबरन 5 लाख महीना खर्च कराते हैं और उससे अपेक्षा करते हैं कि तू ईमानदार बन। क्या ही अच्छा हो कि हर व्यक्ति जनप्रतिनिधि के यहां खाना-पीना छोड़ दें, उसे अधिक से अधिक विकास कार्यों पर समय देने के लिए समय दें। अभी तब तक हम नही सुधरते हैं तब तक तो यही कहा जाएगा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विधायकों के वेतन भत्ते बढ़ाकर उचित ही किया है। यदि पब्लिक के व्यक्ति के लिए दस हजार रूपये आजकल कम हैं तो हमारे जनप्रतिनिधि के लिए इनसे क्या होने वाला है? उम्मीद की जाती है कि बढ़े वेतन के दृष्टिगत अब हमारे विधायक 'ऊपर की कमाई' की ओर कम ध्यान देंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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