जर्मनी के अन्य संस्कृत प्रेमी विद्वान एल्ब्रेख्ट वेबर

  • 2016-12-22 06:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

जर्मनी के अन्य संस्कृत प्रेमी विद्वान एल्ब्रेख्ट वेबर

एल्ब्रेख्ट वेबर
एल्ब्रेख्ट वेबर का जन्म जर्मनी के ब्रेसलाऊ नगर में 17 फरवरी 1825 को हुआ था। इनकी रूचि भारतीय भाषा संस्कृत में प्रारंभ से ही थी। इन्होंने ब्रेसलाऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लेते ही संस्कृत को अपने प्रिय विषय के रूप में चुना। उसने 'वाजसनेयी संहिता' का नवां अध्याय तथा उस पर लिखे गये महीधरभाष्य को अध्ययन के लिए चुना। उसने इंग्लैंड तथा फ्रांस में जाकर 'शुक्ल यजुर्वेद' के विभिन्न पाठों का तुलनात्मक अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त 'शतपथ ब्राह्मण' कात्यायन- श्रोतसूत्र का संपादित संस्करण निकाला। यजुर्वेद की कण्व संहिताओं पर 'महीधर भाष्य' का संपादन किया उसकी रूचि वैदिक आख्यानों के अध्ययन में विशेष थी। उसने पुरूषमेध, राज्याभिषेक, वाजपेय याग तथा वैदिक यज्ञ पर भी विशेष रूप से लिखा। उसने भारत में यूनानी नामक एक शोध निबंध लिखा। कालिदास के 'मालविकानिमित्र' नामक नाटक का अनुवाद भी वेबर ने किया। इस प्रकार के वेबर के महान कार्यों ने जर्मनी में संस्कृत को सम्मान दिलाया।

मार्टिन हाग
मार्टिन हाग ने ईरानी भाषा पहल्वी के साथ-साथ संस्कृत को भी अपने अध्ययन का मुख्य विषय बनाया। उसका जन्म 30 जनवरी 1827 को हुआ था। वह भारत में आया भी था और यहां रहकर उसने हिंदू धर्म पर विशेष अध्ययन भी किया था। 1859 में उसे भारत के पूना कालेज में संस्कृत का प्राध्यापक बनाया गया। 1868 में उसे म्युइनचेन में 'संस्कृत तथा तुलनात्मक भाषा विज्ञान' के प्रोफेसर पद पर नियुक्ति मिली। उसने दो खण्डों में 'ऐतरेय ब्राह्मण' का संपादन और अनुवाद किया था।

अर्नेस्ट-ट्रम्प
अर्नेस्ट-ट्रम्प का जन्म 13 मार्च 1828 को उत्तर वर्टेमबर्ग प्रांत में हुआ था। इसकी भी भारत की देवभाषा संस्कृत में विशेष रूचि थी। उसे लंदन में ईस्ट इंडिया हाउस में सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष के पद पर नियुक्ति भी मिली। उसने भारतीय भाषाओं के अध्ययन हेतु भारत प्रवास भी किया था। उसने सिखों के आदि ग्रंथ पर भी विशेष शोध किया। उसने इस ग्रंथ का अनुवाद भी प्रकाशित कराया था।

अल्फ्रेड लुडविग
अल्फ्रेड लुडविग का जन्म अक्टूबर 1832 को वियाना में हुआ था। इन्होंने ग्रीक, लैटिन, स्लावोनिक जैसी प्राचीन भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत का अध्ययन करना भी अपना जीवन व्रत बनाया। बर्लिन विश्वविद्यालय में इनकी भेंट वेबर से हुई जो कि उस समय के प्रसिद्घ संस्कृतज्ञ थे। उन्हीं से लुडविग ने संस्कृत का विशेष ज्ञानार्जित किया। प्राग विश्वविद्यालय में लुडविग ने तुलनात्मक भाषाशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। यहीं रहते हुए उसने रामायण और महाभारत की तुलनात्मक विवेचना करते हुए 1894 में इस क्षेत्र में विशेष शोधपत्र तैयार किया। उसने महाभारत के ऐतिहासिक उल्लेखों व पौराणिक वृत्तांतों पर भी लिखा और ऋग्वेद पर जर्मन अनुवाद भी किया।

ज्योर्ज ब्यूलर
19 जुलाई 1837 को जन्मे ज्योर्ज ब्यूलर बहुभाषाविद् थे। उसे संस्कृत का विशेष ज्ञान बेन्फे के सान्निध्य में प्राप्त हुआ था। उसने महारानी विक्टोरिया के पुस्तकालय सहायक के रूप में भी कार्य किया था। वह भारत में मुंबई के एलफिन्स्टन कालेज में प्राच्य विद्याओं का प्रोफेसर भी रहा। जहां संस्कृत पर उसने और भी अधिक अधिकार प्राप्त किया। वह निरंतर अभ्यास से संस्कृत भाषा का अच्छा वक्ता बन गया था। उसने 'भारतीय साहित्य का इतिहास' लिखा। ब्यूलर ने 'पंचतंत्र' तथा 'दशकुमार चरित' के कई अंकों का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त जैन साहित्य पर भी ब्यूलर ने प्रशंसनीय कार्य किया था। उसे हिन्दू विधि जानने में भी रूचि थी। उसने मनुस्मृति पर अच्छी आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं, साथ ही 'इण्डो-आर्यनविश्वकोश' के संपादन में भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया था।

रूडोल्फ हार्नले
19 अक्टूबर 1841 को आगरा के समीप सिकंदरा नामक नगर में आगस्ट फ्रैडरिक रूडोल्फ हार्नले का जन्म हुआ। संस्कृत पढऩे के लिए वह लंदन गया। उसने 1880 में प्राकृत व्याकरण पर निबंध लिखा। उसने 'उत्तर भारत की भाषाओं का तुलनात्मक व्याकरण' लिखा। 'प्राचीन भारत में चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन' उसकी महत्वपूर्ण कृति है।

जूलियस एगलिंग
एगलिंग का जन्म 12 जुलाई 1842 को जर्मनी के हेकलिन जेन में हुआ था। उसने लंदन में रहकर भारतीय पाण्डुलिपियों पर शोध कार्य किया था। अपने जीवनकाल में वह रॉयल एशियाटिक सोसाइटी का सचिव और पुस्तकालयाध्यक्ष भी रहा था। उसने एडिनबरा में रहकर वहां के विश्वविद्यालय में 'संस्कृत और तुलनात्मक भाषा विज्ञान' के प्रोफेसर पद को सुशोभित किया था। उसने 'शतपथ ब्राह्मण' का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। यह ग्रंथ 5 खण्डों में प्रकाशित हुआ था। लंदन के इंडिया ऑफिस के पुस्तकालय में सुरक्षित हस्तलिखित संस्कृत ग्रंथों का विस्तृत सूचीपत्र भी तैयार किया। यह सूचीपत्र 7 भागों में पूर्ण हुआ था। इससे एगलिंग को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ था। अपने इन दोनों कार्यों को पूर्ण करने में एगलिंग को बीस वर्ष का समय लगा था।

अवेस्ट विंडिश
विंडिश का जन्म 14 सितंबर 1844 को डै्रसडन नगर में हुआ था। उसने अपने जीवन काल में भारोपीय भाषाओं में पाये जाने वाले संबंधवाचक सर्वनामों पर शोध प्रबंध तैयार किया था। एक वर्ष तक विंडिश ने लंदन के इंडिया हाउस की लाइब्रेरी में रहकर वहां पर रखी सुरक्षित संस्कृत पाण्डुलिपियों की सूची बनाने का कार्य भी किया। उसने लंदन में रहकर भी वैदिक और बौद्घ साहित्य तथा संस्कृत नाटकों पर निरंतर कार्य किया। 1883 में उसने ऋग्वेद के बारह सूक्तों को संपादित किया। इसके अतिरिक्त 'कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद' पर शोध पत्र तैयार किया। 'पालि भाषा की संस्कृति' नामक ग्रंथ की रचना की, 'कामदेव तथा भगवान बुद्घ' शीर्षक से एक शोध रचना 1895 में प्रकाशित हुई। विंडिश का अंतिम ग्रंथ 'संस्कृत भाषा विज्ञान तथा प्राचीन संस्कृत' रहा। इससे यूरोप में संस्कृत के प्रति बहुत से लोगों का आकर्षण बढ़ा।

अन्य विद्वान
जर्मनी के अन्य संस्कृत विद्वानों में पॉल डयूसन रिचर्ड पिशेल, जूलियस जॉली, हर्मन जैकोबी लियोपोल्ड फान श्रोडर कार्ल गोल्डनर एल्फ्रेड हिलब्रांट जैकब वाकरनागल हर्मन ओल्डन बर्ग, रिचर्ड फॉन गार्बे, मोरिज विंटर निट्ज, जोहग्नेस हर्टल ऑटोश्राडर का नाम भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इन सभी विद्वानों ने भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत की सेवा करके और उसके प्रति यूरोप में लोगों का ध्यान आकर्षित करके हिंदी की ही अनुपम सेवा की थी। उन्होंने संस्कृत की महत्ता और उसके वैज्ञानिक स्वरूप को जिस प्रकार अपने ग्रंथों और शोध प्रबंधों या किसी भी प्रकार की रचना के माध्यम से उदघाटित किया उसके लिए संपूर्ण हिंदी जगत उनके प्रति कृतज्ञ है, और सदा ही ऋणी रहेगा। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अनुकूलताओं में किसी नाव का नाविक होना एक अलग बात है जबकि प्रतिकूलताओं में किसी नाव का नाविक होना सर्वथा अलग बात है। जर्मनी के इन विद्वानों ने यूरोप और अपने देश में संस्कृत की संस्कृति का उस समय गुणगान किया था जिस समय 'मैकाले की फौज' भारत में संस्कृत की संस्कृति को मिटाने की या तो तैयारी कर रही थी या फिर उसे क्रूरतापूर्वक मिटाती चली जा रही थी। इन विद्वानों को चाहे कहीं अपने कार्यों में अंग्रेजों से भी सहयोग मिला, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण ये है कि उन्होंने ऐसा सहयोग लेने में सफलता प्राप्त की। क्योंकि अंग्रेजों का उद्देश्य उस समय भारत को बढ़ाना नहीं मिटाना था और इसके लिए उन्होंने भारतीयता को मिटाना आरंभ किया। निस्संदेह भारतीयता का अर्थ उनकी दृष्टि में संस्कृत की संस्कृति को मिटाना ही था। हमें अपनी संस्कृत भाषा के प्रति विदेशियों के इस श्रमसाध्य कार्य का अभिनंदन करना चाहिए और अपनी वर्तमान पीढ़ी को इनके कार्यों से परिचित कराकर संस्कृत की संस्कृति की रक्षा का अपना पुनीत कार्य पूरी श्रद्घा, लगन, परिश्रम और निष्ठा से पूर्ण करना चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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