विदेशी आक्रांताओं के विरूद्घ युद्घ करने वाले सम्राट मिहिर भोज

  • 2016-08-08 04:30:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

विदेशी आक्रांताओं के विरूद्घ युद्घ करने वाले सम्राट मिहिर भोज

आर्यावत्र्त की सीमाओं का सर्वाधिक प्रामाणिक और प्राचीन प्रमाण हमें मनुस्मृति से मिलता है। जिसे विद्वानों ने भूमध्यसागर और कैस्पियनसागर तक विस्तृत माना है। विद्वानों की यह भी मान्यता है कि इस आर्यावत्र्त के अंतर्गत स्थित जम्बूद्वीप आज का एशिया और यूरोप था। जबकि भरतखण्ड (हिमालय के दक्षिण में स्थित विस्तृत भूखण्ड) वर्तमान भारत है।

जिन लोगों ने हमें अपने गौरवपूर्ण अतीत से काटने का अभियान चलाया,

उन्होंने सर्वप्रथम हमें हमारी संस्कृत भाषा से काटा। एक सुनियोजित षडय़ंत्र के अंतर्गत संस्कृत को मृतभाषा घोषित किया गया और ऐसे प्रयास किये गये जिससे संस्कृत पिछड़े हुए लोगों की रूढि़वादी भाषा जान पड़े। इस सर्वाधिक सुसंस्कृत और वैज्ञानिक भाषा के स्थान पर हमें अन्य भाषाओं को प्रगतिशील और वैज्ञानिक कहकर अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। धीरे-धीरे विदेशी अपने षडय़ंत्र में इस सीमा तक तो सफल हो ही गये कि उन्होंने अपने समर्थन में यहां के कुछ
'साहित्यिक जयचंदों' को खरीद लिया। इन 'जयचंदों' ने अपने छलछंदों का ऐसा जाल फैलाया कि हर देशभक्त देशवासी की आत्मा चीत्कार कर उठी।

इस राष्ट्रघाती मनोवृत्ति का परिणाम यह हुआ कि संस्कृत हमारे किन्हीं विशेष अवसरों या विवाहादि संस्कारों पर बोली व सुनी जाने वाली पंडितों की भाषा बनकर रह गयी। एक समय होता था जब संस्कृत में बड़े सूक्ष्म विषयों पर गंभीर शास्त्रार्थ हुआ करते थे। तब लोग संस्कृत की व्याकरण को पढऩा भी अनिवार्य मानते थे और यदि कोई गलत उच्चारण करता था तो उसे भी पकड़ लिया करते थे। आज जैसी स्थिति नही थी कि जब अपने आप को विद्वान मानने वाले लोग भी खिचड़ी

'हिन्दुस्थानी' या 'हिंग्लिश' का प्रयोग करते हैं और व्याकरण का कोई ध्यान नही रखते हैं।

इस स्थिति में संस्कृत के पंडितों ने भी संस्कृत के श्लोकों को केवल बोलने के लिए रटना आरंभ कर दिया और आज हम देखते हैं कि पंडितजी जब हमारे घरों में संकल्प कराते हैं तो उस संकल्प मंत्र में

'आर्यावर्त' 'जम्बूद्वीप' 'भरतखण्ड' का उच्चारण तो करते हैं पर कभी उनके विषय में किसी को समझाते नही हैं कि ये आर्यावर्त, जम्बूद्वीप और भरतखण्ड हैं क्या? वह बोलते जाते हैं और हम सुनते जाते हैं। इसी को अंध परंपरा कहते हैं। इस अंध परम्परा ने हमको अपने मूल से काट दिया है। इसी के चलते हमारे कुछ तथाकथित विद्वानों और लेखकों को अपनी विद्घत्ता का प्रदर्शन करते हुए भारत की जड़ें विदेशों में खोजने का अवसर मिल गया। क्या ही अच्छा होता कि भारत के विषय में जानने समझने वालों के लिए या उस पर शोध करने वालों के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक किया जाता। यदि ऐसा हो जाता या अब भी हो जाए तो कितने ही तथाकथित और स्वयंभू विद्वान मैदान छोडक़र स्वयं ही भाग जाएंगे अथवा कितनों की ही अवैज्ञानिक
, अतार्किक और अप्रमाणिक धारणायें स्वयं ही धूलि धूसरित हो जाएंगी।

ऐसी स्थिति में इतिहास को बड़ी राहत मिलेगी। क्योंकि कथित विद्वानों ने इस विषय के साथ बड़े अत्याचार किये हैं। यदि संस्कृत का ज्ञान इतिहास पर शोध करने वालों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए तो भारत अपनी भाषा में बोलने लगेगा और स्वयं ही कह देगा कि-मेरा मूल सर्वाधिक प्राचीन है।

जिन लोगों ने गुर्जरों को विदेशी सिद्घ करने का राष्ट्रघाती प्रयास किया है उनकी मान्यताएं तब स्वयं ही धूलि धूसरित हो जाएंगी-जब वे हमारे पंडितों के संकल्प मंत्र के भावार्थ को समझ लेंगे। तब उन्हें किसी भी विदेशी साहित्यकार के कथनों या उद्घरणों के भ्रमजाल में फंसने की आवश्यकता नही रहेगी। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे आर्यावर्त की मनुस्मृति में उल्लेखित सीमाओं को खोजें

, फिर जम्बूद्वीप की सीमाओं का ज्ञान लें और तत्पश्चात भरतखण्ड का चित्र बनायें। इन लोगों से गलती ही यह होती है कि ये आज के भरतखण्ड अर्थात भारतवर्ष को ही संपूर्ण भारत या कभी का आर्यावर्त मान लेते हैं। जबकि आज का भारतवर्ष तो कभी के आर्यावर्त का एक टुकड़ा (भरतखण्ड=खण्ड का तात्पर्य एक टुकड़ा ही तो है) है। इनकी भ्रामक अवधारणा का निराकरण होते ही हमारे तथाकथित इतिहास लेखक स्वयं ही समझ जाएंगे कि उनका परिश्रम कितना निरर्थक और कितना अनुपयोगी रहा है
?

अब गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की ओर आइये। आगामी 4 सितंबर को इनकी जयंती को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े जोर शोर से मनाया जा रहा है। गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के पश्चात

915-16 ई. में बगदाद का निवासी अलमसूदी गुजरात आया था। वह कहता है कि गुर्जर (जुज्र) साम्राज्य में 1,80,000 गांव नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे। अलमसूदी से हमें पता चलता है कि गुर्जरों का साम्राज्य उस समय दो हजार किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। यह साम्राज्य तुर्क और मुगल शासकों के सुल्तानों या बादशाहों के साम्राज्य से बहुत बड़ा था। पर देखिये लेखनी का धर्म बेचने वालों का चमत्कार कि उन्होंने इस साम्राज्य के आधे या चौथाई भाग पर राज्य करने वाले तुर्क या मुगल शासकों के तो गुण गाये
, पर अपने राजाओं के गुण गाने में उनकी लेखनी की स्याही सूख गयी और उनके मस्तिष्क को पक्षाघात हो गया। इस देश में अपनों को भूल जाना ही धर्मनिरपेक्षता है। गुर्जर प्रतिहार शासकों के लिए यह भी विचारणीय है कि उन्हें अपनी जनता का समर्थन प्राप्त था। इसलिए कहीं पर भी कोई असंतोष या विद्रोह की भावना जनता के मध्य नही थी। यदि ये गुर्जर सम्राट विदेशी होते तो उन्हें यहां की जनता का भारी असंतोष झेलना पड़ता। क्योंकि भारत की जनता स्वभावत: स्वतंत्रता प्रेमी रही है और इतिहास बताता है कि इसने ऐसे राजाओं या विदेशी शासकों के शासन के विरूद्घ विद्रोह का झण्डा उठाये रखा जो कि विदेशी था और विदेशी होकर अपने विचारों को भारत पर थोपना चाहता था।

भारत के लोगों ने गुर्जर सम्राटों को न केवल इसलिए अपना समर्थन दिया कि वे देशी थे और यहां शांति व्यवस्था बनाये रखकर राज करना चाहते थे

, अपितु इसलिए भी अपना समर्थन दिया कि ये गुर्जर सम्राट अपने देश की सीमाओं से विदेशी धर्म व विदेशी शासक दोनों को ही भगाने और मिटाने के लिए कृतसंकल्प थे। अपने इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के पास विशाल सेना थी। अल मसूदी से ही हमें पता चलता है कि राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर मिहिर भोज मुस्लिम शासकों के विरूद्घ दीर्घकाल तक संघर्ष करते रहे थे।

अब यह तथ्य भी विचारणीय है कि गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का मुस्लिम विदेशी शासकों से यह संग्राम क्या केवल राजनीतिक कारणों से था या इसके कुछ और भी कारण थे? बात स्पष्ट है कि जिस समय मिहिर भोज विदेशी आततायियों को या आक्रांताओं को देश की सीमाओं से खदेडऩे का कार्य कर रहे थे उस समय धर्मरक्षा और देश रक्षा सबसे बड़ा धर्म था। हमारे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के मध्य होने वाले युद्घ फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के मध्य होने वाले युद्घ नही थे। जिनका एकमात्र उद्देश्य इस देश पर अपना अवैध नियंत्रण स्थापित करना था। जो लोग ऐसा मानते हैं कि गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनके समकालीन मुस्लिमों का संघर्ष भारत पर कब्जा करना था-वे नितांत मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं। उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि जब फ्रांसीसी और अंग्रेज इस देश पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए लड़ रहे थे

, उस समय उनमें से किसी को भी इस देश की चेतनाशक्ति या जनसाधारण का समर्थन प्राप्त नही था और उन दोनों में से कोई सा भी इस देश की संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष नही कर रहा था। देश की जनता जानती थी कि ये दोनों ही हमारे लिए घातक होंगे। जबकि गुर्जर सम्राट इस देश की चेतनाशक्ति को बलवती करने के लिए
, उसकी सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनके संघर्ष का उद्देश्य राजनीतिक उद्देश्य से अलग हटकर सांस्कृतिक और धार्मिक अधिक था जो उन्हें इस राष्ट्र की मूल चेतना से जोड़ता था। उसके साथ एकाकार करता था। यदि इन गुर्जर सम्राटों के मुस्लिम आक्रांताओं के साथ संघर्ष के केवल राजनीतिक कारण ही होते तो ये लोग तीन सौ वर्ष तक लगातार देश की रक्षा का भार नही संभालते। दूसरे तब वह भी इस देश को मुस्लिमों की तरह लूटते और अपना खजाना भरते। जबकि इन शासकों ने तो देश की पश्चिमी सीमा की ओर से होने वाले अरब आक्रमणों को रोकने के लिए एक अलमहफूज नामक नगर ही बसा दिया था। जहां से यह लोग देश की रक्षा करते रहे और हर विदेशी आक्रामकों को उससे परे ही रोके रहे। ऐसे स्वर्णिम इतिहास के महानायक गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की जयंती के अवसर पर उन्हें कोटिश: नमन।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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